भाग – 7
जब बदनामी ने दरवाज़ा खटखटाया
समाज जब हारने लगता है,
तो वह सच से नहीं,
बदनामी से हमला करता है।
अगली सुबह शहर कुछ बदला-बदला सा था।
लोग पहले की तरह बात नहीं कर रहे थे—
अब वे देख रहे थे,
तोल रहे थे,
और फैसला सुना चुके थे।
अंकित दफ़्तर पहुँचा तो माहौल अजीब लगा।
कुछ सहकर्मी नज़रें चुरा रहे थे,
कुछ ज़रूरत से ज़्यादा घूर रहे थे।
दोपहर में उसे मैनेजर के केबिन में बुलाया गया।
“अंकित,”
मैनेजर ने कुर्सी से टिकते हुए कहा,
“तुम एक अच्छे कर्मचारी हो…
लेकिन कंपनी की एक इमेज होती है।”
अंकित समझ गया।
“आपको भी शिकायत मिली है?”
उसने सीधे पूछा।
मैनेजर ने फ़ाइल बंद की।
“यह निजी मामला है,”
वह बोला,
“लेकिन जब निजी बात
कंपनी तक पहुँच जाए,
तो वह सार्वजनिक हो जाती है।”
अंकित चुप रहा।
मैनेजर ने कहा,
“तुम्हें कुछ समय के लिए
छुट्टी लेनी होगी,”
और बिना कोई सेलरी लिए ।
यह सज़ा थी—
बिना अपराध साबित हुए।
अंकित ने सिर हिला दिया।
वह जानता था—
नौकरी गई तो
पूरा परिवार डगमगा जाएगा।
उधर सृष्टि पर भी हमला शुरू हो चुका था।
मंदिर समिति ने पुलिस में शिकायत दी—
“धार्मिक स्थल पर अशांति फैलाने” की।
जब पुलिस वाला उसके कमरे पर आया,
तो सृष्टि की साँस रुक गई।
“आप सृष्टि हैं?”
“जी…”
“आपको थाने चलना होगा,”
उसने कहा,
“बस पूछताछ है।”
पूछताछ—
लेकिन समाज जानता था
इस शब्द का मतलब।
अंकित थाने पहुँचा
तो सृष्टि को बेंच पर बैठा पाया—
सिर झुका हुआ,
आँखों में अपमान।
“इन्होंने क्या किया है?”
अंकित ने सख़्ती से पूछा।
“कुछ नहीं,”
पुलिस वाला बोला,
“बस लोगों की भावना आहत हो गई है।”
भावनाएँ—
हमेशा कमज़ोरों पर ही क्यों आहत होती हैं?
माँ जब थाने पहुँचीं
तो पहली बार उनकी टाँगें काँप गईं।
उन्होंने सृष्टि को देखा—
और उस पल उन्हें अपनी बेटी याद आ गई।
“यह लड़की कोई अपराधी नहीं है,”
माँ ने थरथराती लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा।
पुलिस ने चेतावनी देकर
सृष्टि को छोड़ दिया,
लेकिन यह साफ़ था—
अब मामला रुकने वाला नहीं।
शाम को माँ ने अंकित को अलग बुलाया।
“बेटा,”
उन्होंने कहा,
“अब बात हाथ से निकल रही है।”
अंकित चुप रहा।
“तेरी नौकरी…”
माँ की आवाज़ टूट गई।
“माँ,”
अंकित ने कहा,
“अगर आज मैं पीछे हट गया,
तो सारी ज़िंदगी
खुद की नज़रों में गिर जाऊँगा।”
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
उसी रात सृष्टि ने फिर वही बात कही—
“मैं चली जाऊँगी।”
लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में डर नहीं,
थकान थी।
“अब यह सिर्फ़ समाज नहीं,”
वह बोली,
“कानून, नौकरी,
सब दाँव पर लग गया है।”
अंकित ने उसका हाथ थामा।
“अगर तुम गईं,”
उसने कहा,
“तो वे साबित कर देंगे
कि तुम गलत थीं।”
“और अगर मैं रुक गई?”
सृष्टि ने पूछा।
“तो हमें लड़ना होगा,”
अंकित बोला,
“सब कुछ खोने के लिए तैयार होकर।”
माँ दूर खड़ी यह सब सुन रही थीं।
उन्हें समझ आ गया—
अब आधे फैसले नहीं चलेंगे।
रात को माँ ने अपनी बहन को फोन किया—
जो शहर से दूर,
एक छोटे से कस्बे में रहती थीं।
“क्या सृष्टि कुछ समय
तुम्हारे पास रह सकती है?”
माँ ने पूछा।
फोन कटते ही
माँ रो पड़ीं।
यह रोना कमजोरी का नहीं था—
यह एक माँ का दिल था
जो दो ज़िंदगियों को बचाना चाह रहा था।
सुबह माँ ने सृष्टि से कहा—
“तुम कुछ दिन यहाँ से दूर चली जाओ।”
सृष्टि चुप रही।
“यह हार नहीं है,”
माँ बोलीं,
“यह साँस लेने की जगह है।”
अंकित समझ गया—
यह फैसला सृष्टि को बचाने के लिए है,
पर उसे तोड़ भी सकता है।
सृष्टि ने हाँ कर दी।
जाते वक्त
उसने अंकित से बस इतना कहा—
“अगर लौटूँ…
तो क्या तुम अब भी
मेरे साथ खड़े रहोगे?”
अंकित की आँखें भर आईं।
“मैं खड़ा नहीं रहूँगा,”
उसने कहा,
“मैं चलूँगा—
तुम्हारे साथ।”
बस रवाना हो गई।
और पहली बार
अंकित को लगा—
दूरी कभी-कभी
सबसे बड़ी परीक्षा होती है।
भाग–8 में कहानी अलगाव के दौर में प्रवेश करेगी, जहाँ
दूरी, अफ़वाहें और अकेलापन
इस रिश्ते की असली ताक़त की परीक्षा लेंगे।
इस भाग में सामने आएगा—
सृष्टि का नया शहर, नई पहचान
अंकित का अकेले समाज से सामना
और वह सच, जो दूरी के बीच
दोनों के दिलों को
और क़रीब या पूरी तरह अलग
कर सकता है।
. BY................ Vikram kori..