भाग -3
बारिश के बाद की सुबह कुछ ज़्यादा ही खामोश थी।
मंदिर के सामने वही जगह, वही फूलों की खुशबू—
लेकिन आज हवा में कुछ और भी घुला हुआ था।
सृष्टि जैसे ही अपनी टोकरी सजाने लगी, उसे आसपास की नज़रें महसूस होने लगीं।
कुछ नज़रें जिज्ञासा से भरी थीं,
कुछ तिरछी,
और कुछ ऐसी—जिनमें सवाल नहीं, फ़ैसले छुपे होते हैं।
लोग उसे देख कर तरह तरह की बातें करते ।
“कल देखा था ना…”
“छाता शेयर कर रही थी…”
“विधवा होकर भी…”
शब्द पूरे नहीं बोले जा रहे थे,
लेकिन अर्थ साफ़ था।
सृष्टि का हाथ काँप गया।
उसने फूल ठीक किए, लेकिन मन बिखरता चला गया।
उसी समय अंकित दूर से आता दिखाई दिया।
उसे देखते ही सृष्टि का दिल तेज़ धड़कने लगा—
डर से, —वह खुद नहीं जानती थी।
अंकित ने माहौल महसूस कर लिया था।
लोगों की आँखें अब उसे भी पढ़ रही थीं।
वह सृष्टि के पास रुका नहीं।
बस थोड़ी दूरी पर खड़ा रहा।
यह दूरी जानबूझकर थी—
क्योंकि अब हर कदम सोच-समझकर रखना ज़रूरी था।
कुछ देर बाद मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी एक बूढ़ी उम्र की औरत ने ऊँची आवाज़ में कहा,
“आजकल जमाना ही खराब हो गया है।
किसी को शर्म-लिहाज़ नहीं रहा।”
सृष्टि ने सिर झुका लिया।
अंकित के अंदर कुछ टूट सा गया।
वह आगे बढ़ा।
और बोला
“अगर किसी को कोई बात मुझसे पूछनी है,”
“तो सामने आकर पूछे।”
सब चुप हो गए।
क्योंकि समाज अक्सर सवाल करता है,
जवाब सुनने की हिम्मत नहीं रखता।
अंकित ने किसी की तरफ उंगली नहीं उठाई।
बस इतना कहा—
“इंसान का इंसान के लिए खड़ा होना अगर गलत है,
तो शायद हमें अपने सही-गलत की परिभाषा बदलनी चाहिए।”
सृष्टि की आँखें भर आईं।
उसे पहली बार लगा—
कोई उसके लिए सिर्फ़ महसूस नहीं कर रहा,
बल्कि बोल भी रहा है।
लेकिन हर आवाज़ की एक कीमत होती है।
उस शाम अंकित के गाँव से माँ का फोन आया।
“अंकित,”
माँ की आवाज़ में चिंता थी,
“गाँव में बातें चल रही हैं।”
अंकित चुप हो गया।
माँ ने हिचकते हुए कहा,
“कहते हैं तू शहर में किसी औरत के चक्कर में है,”
“वो भी विधवा है…”
यह शब्द—विधवा—
जैसे किसी ने ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर दिया हो।
“माँ,”
अंकित ने संयम से कहा,
“वो औरत नहीं, इंसान है।”
माँ ने लंबी साँस ली।
“बेटा, मैं समझती हूँ।
लेकिन समाज नहीं समझेगा।
तेरी बहन की शादी…
तेरा घर…”
अंकित जानता था—
माँ गलत नहीं है।
समाज का डर झूठा नहीं होता।
फोन कट गया।
रात भर अंकित सो नहीं पाया।
एक तरफ़ परिवार की ज़िम्मेदारी,
दूसरी तरफ़ सृष्टि की वो आँखें—
जिनमें अब उम्मीद जाग चुकी थी।
अगले दिन सृष्टि ने दुकान नहीं लगाई।
अंकित बेचैन हो उठा।
तीसरे दिन भी नहीं थी।
चौथे दिन वह खुद को रोक नहीं पाया।
उसने सृष्टि के कमरे का पता किसी से पूछा —
एक तंग सी गली, टूटी सी सीढ़ियाँ,
और एक छोटा सा कमरा।
उसने दरवाज़ा खटखटाया।
अंदर से धीमी आवाज़ आई,
“कौन?”
“अंकित।”
कुछ पल के लिए थोड़ा चुप रहा।
फिर दरवाज़ा खुला।
सृष्टि का चेहरा पीला और
आँखों में डर था
उसने घबराकर पूछा।
“आप यहाँ क्यों आए?”
अंकित ने कहा,
“क्योंकि आप गायब हो गई थीं,”
“और अब मुझे फर्क पड़ता है।
तुम्हारे वहां न होने से ।
सृष्टि की आँखों से आँसू बह निकले।
वह रोते हुए बोली,
“आप नहीं समझते,”
“मेरे पास खोने को कुछ नहीं है।
लेकिन आपके पास है—परिवार, इज़्ज़त, भविष्य।”
अंकित ने पहली बार साफ़-साफ़ कहा,
“और आपके पास क्या है?”
सृष्टि चुप हो गई।
अंकित बोला,
“आपके पास भी ज़िंदगी है,”
“और उसे अकेले जीने की सज़ा आपको किसी ने नहीं दी।”
सृष्टि ने सिर झुका लिया।
“समाज ने दी है।”
अंकित ने धीमे से कहा,
“तो शायद अब समाज से लड़ने का वक़्त आ गया है।”
यह सुनकर सृष्टि डर गई।
“मैं लड़ नहीं सकती,”
उसने कहा,
“मैं थक चुकी हूँ।”
अंकित ने पहली बार उसका हाथ थामा—
बहुत हल्के से।
“तो मैं लड़ूँगा,”
फैसला आपका होगा।”
उस पल सृष्टि को एहसास हुआ—
यह रिश्ता अब सिर्फ़ सहारा नहीं रहा।
यह एक इम्तिहान बन चुका था।
और हर इम्तिहान
किसी न किसी को बदल देता है।
भाग–4 में कहानी सबसे कठिन मोड़ पर पहुँचेगी, जहाँ
अंकित को परिवार और समाज के सामने खड़ा होना पड़ेगा,
और सृष्टि को यह तय करना होगा कि
वह डर के साथ जिएगी या संघर्ष के साथ।
इस भाग में सामने आएगा—
गाँव में उठता विरोध
अंकित की माँ और सृष्टि का आमना-सामना
और वह फैसला, जो इस रिश्ते को
नाम देगा… या तोड़ देगा।
आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहे ।
By............. Vikram kori..