samarpan se aange - 5 in Hindi Love Stories by vikram kori books and stories PDF | समर्पण से आंगे - 5

Featured Books
Categories
Share

समर्पण से आंगे - 5


‎भाग – 5
‎माँ के फैसले के बाद सब कुछ बाहर से सामान्य दिख रहा था,
‎लेकिन अंदर ही अंदर हर रिश्ता किसी कच्ची दीवार की तरह दरकने लगा था।
‎मंदिर के बाहर सृष्टि फिर से फूल बेचने लगी थी,
‎लेकिन अब उसकी हर हरकत पर नज़र थी।
‎वह जानती थी—अब वह सिर्फ़ “सृष्टि” नहीं रही,
‎अब वह “वही विधवा” बन चुकी थी,
‎जिसका नाम फुसफुसाहटों में लिया जाता है।
‎ लोग तरह तरह की बातें करने लगे 
‎“आजकल बहुत हँसने लगी है…”
‎“किसके भरोसे?”
‎“शहर वाले लड़के का असर है…”
‎ये बातें सीधे कानों तक नहीं आती थीं,
‎लेकिन हवा में तैरती हुई दिल तक पहुँच जाती थीं।
‎अंकित ने दूरी बना ली थी—
‎ पर नज़र से नहीं,
‎ बस कदमों से ।
‎वह जानता था—
‎एक गलत क़दम सृष्टि को पूरी तरह तोड़ सकता है।
‎लेकिन समाज कहाँ रुकता है?
‎एक दोपहर,
‎ मंदिर की समिति के दो लोग सृष्टि के पास आए।
‎“तुम्हें यहाँ दुकान लगाने की इजाज़त किसने दी?”
‎उनमें से एक ने सख़्त लहजे में पूछा।
‎सृष्टि घबरा गई।
‎“मैं… मैं तो रोज़ की तरह—”
‎“रोज़ की तरह?”
‎दूसरे ने बीच में टोका,
‎“रोज़ की तरह इज़्ज़त उछालने लगी हो क्या?”
‎सृष्टि का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
‎“मैंने कुछ गलत नहीं किया,”
‎उसकी आवाज़ काँप रही थी।
‎“गलत?”
‎पहला आदमी हँसा,
‎“विधवा होकर मर्दों से बातें करना गलत नहीं?”
‎यह शब्द
‎भीड़ के बीच आग की तरह फैल गया।
‎लोग रुक गए।
‎देखने लगे।
‎सुनने लगे।
‎सृष्टि को लगा
‎जैसे ज़मीन उसे निगल ले।
‎उसी समय अंकित वहाँ पहुँचा।
‎उसने भीड़ देखी,
‎सृष्टि की हालत देखी,
‎और बात समझने में देर नहीं लगी।
‎वह आगे बढ़ा।
‎“अगर कोई बात है,”
‎“तो मुझसे कहिए।”
‎समिति वाले चौंक गए।
‎“तो तुम ही हो वो?”
‎एक ने तिरछी नज़र से देखा।
‎“हाँ,”
‎अंकित ने बिना झिझक कहा,
‎“अगर इंसानियत गुनाह है,
‎तो वो गुनाह मैंने किया है।”
‎भीड़ में खुसर-पुसर बढ़ गई।
‎“देखा!”
‎“खुद मान रहा है!”
‎“अब सब साफ़ है!”
‎सृष्टि की आँखों से आँसू बहने लगे।
‎“आप चले जाइए,”
‎उसने अंकित से फुसफुसाकर कहा,
‎“मेरे लिए अपनी ज़िंदगी खराब मत कीजिए।”
‎अंकित ने उसकी तरफ़ देखा—
‎और पहली बार उसे लगा
‎कि पीछे हटना अब सबसे बड़ी कायरता होगी।
‎“नहीं,”
‎उसने साफ़ कहा,
‎“अब नहीं।”
‎उस शाम बात माँ तक पहुँची।
‎माँ चुपचाप बैठी रहीं।
‎उनकी चुप्पी इस बार कमज़ोरी नहीं,
‎डर थी।
‎“अब यह शहर की बात नहीं रही,”
‎उन्होंने कहा,
‎“यह गाँव तक पहुँचेगी।”
‎अंकित जानता था—
‎इसका मतलब क्या है।
‎उधर सृष्टि का हाल और बुरा था।
‎दुकान बंद करवा दी गई।
‎मंदिर के बाहर बैठने से मना कर दिया गया।
‎किसी ने साफ़ कह दिया।
‎“अब तुम यहाँ नहीं बैठोगी,”
‎उस रात सृष्टि अपने कमरे में बैठी रही—
‎अंधेरे में,
‎खाली दीवारों के सामने।
‎वह खुद से पूछती रही,
‎“मैंने क्या माँगा था?”
‎“बस इंसान की तरह जीना…”
‎अगली सुबह उसने एक फैसला किया।
‎वह अंकित के पास आई।
‎उसने  कहा।“मैं यहाँ से चली जाऊँगी,”
‎अंकित चौंक गया।
‎“कहाँ?”
‎सृष्टि बोली,
‎“कहीं भी,”
‎“जहाँ मेरी वजह से
‎किसी की ज़िंदगी मुश्किल न हो।”
‎अंकित ने पूछा।
‎“और तुम्हारी ज़िंदगी?”
‎सृष्टि हल्की-सी मुस्कुराई—
‎“उसकी आदत हो गई है।”
‎अंकित का दिल भर आया।
‎“अगर तुम चली गईं,”
‎उसने कहा,
‎“तो यह समाज जीत जाएगा।”
‎सृष्टि बोली,
‎“और अगर मैं रुक गई,”
‎“तो तुम हार जाओगे।”
‎यह रिश्ता अब
‎त्याग और संघर्ष के बीच फँस चुका था।
‎माँ ने यह सुना
‎तो पहली बार उनका दिल फट सा गया।
‎उन्होंने खुद से पूछा।
‎“हर बार औरत ही क्यों जाती है?”
‎उस रात माँ ने फैसला बदल दिया—
‎या शायद पहली बार अपना फैसला लिया।
‎उन्होंने अंकित से कहा,
‎“कल सृष्टि को लेकर आओ।”
‎अंकित हैरान रह गया।
‎माँ ने कहा,
‎“अब भागने का वक़्त नहीं,”
‎“अब सच का सामना करेंगे।”
‎लेकिन सच का सामना
‎अक्सर सबसे ज़्यादा डरावना होता है।
‎भाग–6 
‎में कहानी उस बिंदु पर पहुँचेगी
‎जहाँ माँ, सृष्टि और समाज
‎एक ही जगह आमने-सामने होंगे।
‎इस भाग में सामने आएगा—
‎माँ का बदला हुआ रूप
‎सृष्टि का सबसे बड़ा डर
‎और वह सवाल
‎क्या एक माँ
‎समाज के खिलाफ
‎अपने बेटे और एक विधवा औरत के साथ खड़ी हो पाएगी?
‎भाग–6 कहानी को निर्णायक दिशा देगा।
‎ आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए।

          BY ...................Vikram kori..