A place of memories - Ranjan Kumar Desai (47) in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 47)

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 47)


                    : : प्रकरण - 47 : :

          दिवाली के धमाकेदार फटाखे से  सुंदर की आँखों को बड़ा झटका लगा था. उस की आँखे टेढी हो गईं थी. वह तो ओपरेशन से ठीक हो गईं थी. लेकिन उस की आँखों की नस तंग हो गईं थी. ललिता पवार के पूर्वजों पर अभिशाप था, कोई कुदरती प्रकोप था. जिस की वजह से ना जाने कभी ना देखी, ना सुनी बीमारी. घर में किसी ना किसी भरख लेती थी.

      अंधापन इस परिवार के लिये एक उपहार बन गया था, जो बेटी के बेटे को अपनी लपेट में ले लेता था. यह बीमारी ने पहले पहल ललिता पवार के बेटे को अपनी पकड़ में ले लिया था जो एक पारिवारिक बीमारी का रूप धारण कर चुकी थी.. जो आगे जाकर उस की बेटी आरती विरासत में मिली थी. ललिता पवार की बहन को भी यह बीमारी विरासत में मिली थी. उस का बेटा भी उस का शिकार हो गया था. उस की बेटी के बेटे को भी यह बीमारी लग गईं थी.

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        गीता बहन का खुद का तो कोई बच्चा नहीं था. लेकिन उन्हो ने मेरे बच्चों को मुझ से पढ़कर संभाला था, उन्हें प्यार दिया था.

        लेकिन उन की जिंदगी की अवधि ज्यादा लंबी नहीं थी. हमारी शादी के बाद दोनों पोते पोती को छोड़कर वह अनंत यात्रा को निकल पड़े थे.

        बच्चों को भी दादी मा से बड़ा लगाव था. वह एक पल भी दादी मा को छोड़ते नहीं थे.

       मेरे दो बच्चों को देखकर मौसे मौसी को जलन होती थी. 

       मौसे के कारनामो की फेहरिष्ट काफ़ी लंबी थी. जो मुझे कभी भी याद आ जाती थी. और मुझे तंग करती थी.

        मौसे ने अपने छोटे भाई की निर्मम हत्या की थी और ' दूसरा चेहरा ' पहन कर छोटे भाई की जगह लेकर काफ़ी समय उस की बीवी का यौन शोषण किया था.

         इस बात का मुझे पता लग गया था. उन की कामवाली ने सारा भांडा फोडा था.

          इस बात पर मैंने कहानी लिखी थी जिसे मैंने उन के उस लडके को भेजा था जिस ने मेरे लेखक होने पर मेरा क्रूर उपहास किया था.

          मैंने उस तरह सारी बात पेश की थी, जिस पर कोई भी मौसे की ओर उंगली उठाने पर विवश हो जाये. उस लडके ने मुझे बहुत कुछ कहने की कोशिश की थी. तब मैंने उस को साफ शब्दों में सुनाया था. 

          " अब पता चला मैं कैसा लेखक हूं. अब ज्यादा चर्बी मत दिखाना वर्ना मैं तुम्हारी भी सारी पोल खोल दूंगा. "

        तब से वह कभी मेरे सामने नहीं आया था.  उस के वही लडके ने मेरा अनादर करने पर अपने पिता की ओर से मेरी मांफी मांगी थी.

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        मौसे के शाहूकार बेटों ने एक बार टिप्पणी की थी.

        नानी मा कैसी व्यवस्था की है. सौतेली बेटी के सगे बेटे को और सगी बेटी के सौतेले बेटों को कुछ ना मिले. यह सरासर झूठ था हमें बेवकूफ बनाने की कोशिश की थी.

        उस के बाद हमारा मौसे मौसी और उस के परिवार से कोई संबंध नहीं था.

         नई नानी मा की मौत हुई तब रात को दो बजे मैं चलकर भूलेश्वर से तारदेव गया था.. और उन्हें नानी मा के मौत की खबर पहुंचाई थी. उस वक़्त मेरी उम्र 10-11 साल की ही थी. 

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      क्षिप्रा  खुद क्या थी? वह भूल गईं थी. मेरा स्नेहा से मिलना जुलना वह उस बात से पहले नाराज थी. उस ने स्नेहा का घर की बहू की तरह स्वीकार कर लिया था.

      बहुत साल बाद दोनों हमारे घर आये थे. इस बात से हमें आश्चर्य हुआ था.

       उन के बेटे की शादी होने वाली थी. इस लिये दोनों न्योता देने आये थे. उस ने स्नेहा को एक बहू की तरह सन्मान किया था और आग्रह किया था.

        " तुम्हे सुशील की भाभी बनकर सारी रस्मे निभानी हैं.."

         " मौसी यह कुछ कहने की बात हुई.. एक भाभी के नाते सारी रस्मे निभाना मेरा अधिकार नहीं मेरी फ़र्ज हैं. "

         और हम उस के लडके की शादी में शामिल होने घर से निकले थे.

         उस दिन मेरी जिन्दगी में नई लड़की दाखिल हुई थी, जो क्षिप्रा के लडके की दोस्त थी, जो उस के साथ दफ्तर में काम करती थी. 

         उस का नाम बिभूति था. वह अगले दिन से हीं एक रिश्तेदार की तरह शादी में हाजिर हो गई थी. मेरे कहने पर उस ने मेरी, स्नेहा की ओर खुद की सेल्फी ली थी.

        स्नेहा ने एक भाभी के नाते सारी रस्म अदा की थी. क्षिप्रा ने उस की कदर करते हुए एक महेंगी शादी उसे भेंट की थी.

         हम दोनों के बीच काफी सारी बातें हुई थी.

         एक घंटे की बातचीत से मुझे ऐसा एहसास हुआ था मानो हमारी काफ़ी पुरानी पहचान थी. वह अकेली आई थी और ठाणे में अपनी मौसी के घर में रहती थी और वही से वह जोब पर जाती थी.

         रात का समय था. उस समय मैं स्नेहा को वहाँ बिठाकर उसे रिक्शा पकड़ कर दी थी. उस ने मेरा तहेदिल से आभार माना था. हम दोनों ने आपस में एक दूसरों का मोबाइल नंबर शेयर किया था.

       दूसरे हीं दिन मैंने वॉट्सअप पर मेसेज कर के पूछा था.

        " ठीक हैं घर पहुंच गई थी. "

        "  हा संभव जी! "

        उस के बात करने के तरीके से मैं बहुत प्रभावित हो गया था. मैं इस रिश्ते को निभाना चाहता था. उसे कोई नाम देना चाहता था.

        दो दिन के बाद मैंने केबीसी  स्टाइल में चार सवाल किये थे.

         " एक दोस्त? "

         " एक भाई?."

         " एक अंकल?"

         " एक बड़े पापा? "

         इन चारो में तुम मुझे क्या कहना चाहोगी? 

         " उस में पूछने का क्या सवाल हैं? बडे पापा से बढ़कर और कौन सा सम्बोधन फिट हो सकता हैं."

         और फिर हम लोग वॉट्सअप पर बात करते थे.. उस ने हमारे रिश्ते को ऊंचाई बक्षी थी. वह मुझे अपनी सारी बातें करती थी.

        उस ने ख़ुश होकर मुझे कहां था.

        " बडे पापा! मैं बड़ी खुश किस्मत हूं. मुझे दो पिता का प्यार उपलब्ध हुआ है. "

        यह मेरे लिये सर्व श्रेष्ठ उपहार था.

        बिना मिले भी रिश्ते निभाये जाते हैं.

        यह उस का बेनमुन नमूना था.

        कम से कम दी महिने हमारा वॉट्सअप पर वार्तालाप जारी था. 

        फिर एक दिन उस ने मुझे बताया था.

         " बडे पापा! मैं गौहाटी वापस जा रही हूं. "

         " क्या हो गया? "

          " मेरे मात पिता मुझे वापस बुला रहे हैं. मेरी शादी की उम्र भी हो गई हैं. वह मेरे लिये लड़का ढूंढ रहे हैं. "

          " यह तो अच्छी बात हैं. एक बेटी का सही घर तो उस का ससुराल  होता हैं. "

          " कब जा रही हो? "

          " इस इतवार को दोपहर को कुर्ला टर्मिनस से गाड़ी हैं. "

          " कोई बात नहीं मैं तुम्हे छोड़ने आऊंगा. "

          और वॉट्सअप पर यहीं बात रुक गई थी.

                         00000000000   ( क्रमशः)