: : प्रकरण -40 : :
मेरी बहन की लड़की की शादी में मैं बड़ोदा गया था तब मेरी मुलाक़ात सुख लाल से हुई थी. वह छोटे बच्चों को अपनी रेकड़ी में बिठाकर उन्हें जहाँ जाना होता था वहाँ पहुंचाता था.
भाविका की लड़की की शादी खतम होने के बाद कोई साधन नहीं मिला था तो सुखलाल ने बिना कहे सब को रेकड़ी में बिठाकर अपने मुकाम पहुंचाया था, उस के लिये उस ने कोई पैसा नहीं लिया था.
सुख लाल का किरदार एक मिशाल था. उस का जीवन मंत्र बहुत हीं फायदेमंद था. उसे अपनाने की मुझे प्रेरणा मिली थी.
उस का गीत मुझे बारबार याद आता था.
मेरी पिताजी की उम्र हो गई थी. वह छोटी छोटी बातों में डर जाते थे.
एक बार वह बहन भाविका के घर आम रस खाकर आये थे, उन को खाने की मंजूरी नहीं थी. फिर भी उन्होंने खाया था जिस की वज़ह से एसीडीटी हो गई थी जिस से उन की छाती में तीव्र दर्द हो रहा हो मानो दिल का दौरा पड़ा हो.
उन्होंने ने मुझे कहां था. " मुझे कुछ हो गया हैं. मैं जी नहीं पाउँगा. "
उन्होंने सारा घर सर पर उठा लिया था. सब को डरा दिया था. रात को दो बज गये थे. वह डोक्टर के पास जाने की जिद पकडकर बैठ गये थे. इतनी रात को उन्हें डोक्टर के पास ले जाना संभावित नहीं था.
यह कुछ था वह मानसिक था. उन्होंने मन पर ले लिया था.
मैंने उन्हें ढाढ़स दिलाया था.
" आप को कुछ नहीं हुआ हैं."
उन्हें घरेलू दवा पिलाई थी और पांच मिनिट में वह ठीक हो गये थे.
बुढ़ापे में उन का स्वभाव विचित्र हो गया था.
वह हर चीज में घर में सब लोगो पर खीज निकालते थे. मैं तो उन्हें बर्दास्त कर जाता था. लेकिन आरती और बच्चें उन को बर्दास्त नहीं कर पाते थे. इस वजह से घर में नाहक तंगदिली का माहौल खड़ा होता था.
वैसे तो वह सदैव भगवान पर विश्वास होने का दावा करते थे. उन्हें कृष्ण भगवान पर पूर्ण भरोसा था. वह हमेशा एक हीं बात कहते थे.
" चित्त तु क्यों चिंता करता हैं तेरे साथ कृष्ण भगवान तो हैं. "
गीता बहन बीमारी की लपेट में आ गये थे. उन्हें टी बी हो गया हैं. उन्हें उपचार के लिये घाटकोपर स्थित सर्वोदय अस्पताल में रखा गया था.
पिताजी का वहाँ तक रोज जाना नामुमकिन था. इस लिये बाजु में एक गेस्ट हाउस में रहते थे. और मैं हर शनिवार को दोपहर 2 बजे ओफिस छूटने के बाद उन्हें मिलने जाता था.
मुझे देखकर वह बडे खुश होते थे.. उन्होंने सही मायने में मेरी मा की भूमिका निभाई थी. लेकिन नानी मा की बात ने हमें यह बात मानने को रोका था.
" सौतेली मा कभी भी सगी मा नहीं बन सकती. "
यह बात को मैंने झूठलाया था.
फ़िल्म ' औरत ' की कहानी ने मेरा असलियत से परिचय करवाया था.
फ़िल्म में बेटा पत्नी मार जाने से दूसरा ब्याह करता हैं. घर में पांच संतान होते हैं. साथ में उस की मा भी होती हैं.
बेटा दूसरी शादी रचाता हैं. घर में नई बहू आती है.
दादी मा अपना स्थान क़ायम करने के लिये बच्चों के कानो में विष घोलती है :
सौतेली मा हमेशा दुःख देती है.
दादीमा की बात सुनकर बच्चों के दिल में एक भय घर कर जाता है.
नई मा घर में दाखिल होती है यह देखकर सारे बच्चे इधर उधर छिप जाता है, लेकिन सब से छोटा लड़का जो एक साल का भी नहीं था वह घुटनो के बल घर में चलने की कोशिश कर रहा था.
यह देखकर नई मा उसे उठाकर सीने से लगा देती है और चुम्बनो की बारिश कर देती है.
यह देखकर छिपे हुए बच्चों को ताजुब होता है और सब के सब नई मा के सामने आ जाते है. और वह सब को प्यार करती हैं, सब लोग उस का मा के रूप में स्वीकार करता हैं लेकिन सब से बड़ा लड़का उसे नहीं स्वीकारता हैं क्यों की वह ज्यादा समय दादी मा के पास रहा था. आखिर में वह भी उसे मा के रूप में अपना लेता हैं. मैंने यह कहानी गीता बहन को सुनाई थी और नानी मा ने हमें क्या कहां था वह भी बताया था.
उन की हयाति में मेरी दो संतान थी. गीता बहन दोनों को साथ में उठाकर फिरते थे.
यह देखकर मुझे प्रसन्नता का एहसास होता था.
मैं उस वक़्त सायकल एक्सपोर्टर का जोब छोड़कर दूसरी जगह काम लगा था.
पहले दिन काम कर के शाम को मैं. पार्ट टाइम जोब पर गया था और रात को दस बजे घर पहुंचा था. उस दिन भाविका का जन्म दिन था. वह घर आई हुई थी. वह गीता बहन को संपूर्ण रूप से मा स्वीकार नहीं पाई थी. फिर भी उन्होंने ने बेटी के खास खाना पकाने की जहमत की थी. उसी वक़्त वह बेहोश होकर गिर पड़े थे. पिताजी ने डोक्टर को बुलाया था. वह गीता बहन की बोटल चढ़ा रहे थे.
उस वक़्त मैं घर में दाखिल होता था. उन की हालत देखकर भयभीत हो गया था.
उन की हालत देखकर डोक्टर ने अस्पताल में दाखिल करने की राय दी थी. उन्हें तुरंत अस्पताल में दाखिल किया गया था. डोक्टर ने आगाह कर दिया था.
अगले 36 घंटे बहुत क्रिटिकल हैं.
और 33 घंटे में हीं उन का देहांत हो गया था.
उन की मौत से मुझे बड़ा सदमा लगा था.
उन्होंने आरती को बहू नहीं बल्कि बेटी की तरह संभाला था. सास और बहू का अनोखा रिश्ता क़ायम किया था.
गरिमा साथ में राखी लाई थी, फिर नहीं उस ने मुझे राखी नहीं बांधी थी.. इस बात का मुझे दुःख हुआ था. तब उन्ही ने मुझे समझाया था.
" बेटा! तुमने तो बिना राखी सही काम कर दिया था, उस में राखी का कोई अवकाश हीं नहीं बचा था. "
मुझे उन की बातों में तथ्य लगा था.
कुछ भी हो गरिमा को मुझ पर विश्वास था. वह मेरे घर आई थी, वह मेरे लिये सब से बड़ी बात थी.. मैंने उस के सिर पर हाथ रखकर सौगंध लिये थे.. इतना काफ़ी था. उसे अन्य कोई सबूत की आवश्यकता नहीं थी.
बस इसी लिये वह राखी को बाहर कठघरे पर छोड़कर चली गई थी.
0000000000000 ( क्रमशः)