A companion of memories - Ranjan Kumar Desai - (37) in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (37)

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (37)


                 : : प्रकरण - 37 : :

        मैं खुद एक लेखक था.

        अपने मित्र के अनुभव को याद कर के मैंने एक कहानी लिखी थी.

        उस की रिस्ट वोच गाड़ी में यात्रा करते समय किसी ने खिंच ली थी. 

        उस को ना जाने क्या सूझा था. हिरो की तरह घडी वाला हाथ खिड़की पर ऱख कर बैठा था, जिस ने चोर का काम आसान कर दिया था. स्प्रिंग वाला पट्टा था जो जरा खिंचने से टूट गया था. और घड़ी उस के हाथो में चली गई थी. 

        और वह मूंह देखता ऱह गया था.

         उस ने मुझे अपनी कहानी सुनाई थी.

         जिसे सुनकर मुझे कहानी लिखने का आईडिया आया था.

         मैंने कहानी में किरदारों की फेर बदल की थी. मित्र की जगह एक लड़की को रख दिया था.

         पंद्रह अगस्त का दिन था. उस की स्कूल में कार्यक्रम था. साथ में उस का जन्म दिन भी था. उस मौके पर पिताने उसे हाथ घड़ी का उपहार दिया था. जिस से उसे दुगुनी खुशी हो रही थी.

         वह नई घड़ी पहनकर कार्यक्रम के लिये तेजपाल ऑडिटोरियम में गई थी. वह अपनी नई घड़ी सब को दिखाने बेताब हो रही थी.

         बाहर दरवाजे पर उस की कुछ सहेलिया ख़डी थी. उसे अपनी घड़ी दिखाने के लिये हाथ को तरह तरह हिलाकर अपनी घड़ी को दिखाने का प्रयास किया था.

        कार्यक्रम पूर्ण होने के बाद वह अपनी दो सहेलियों के साथ ग्रांट रोड स्टेशन पहुंची थी. वह लोग चर्नी रोड जाने वाली थी, इस लिये अलग हो गई थी और अँधेरी जाती गाड़ी के महिला डिपार्टमेंट में सवार हो गई थी. छुट्टी का दिन था तो गाड़ी खाली थी और लड़की को खिड़की की बाजु में बैठने को मिल गया था.

       वह भी मेरे उस मित्र की तरह घड़ी वाला हाथ खिड़की पर रखकर बैठ गई थी.

       गाड़ी चल पड़ी थी. मुंबई सेंट्रल के बाद महालक्ष्मी स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी. वह लड़की घड़ी वाला हाथ ऊपर करके बैठी थी. उसे नींद आ रही थी. उसी वक़्त गाड़ी चलने लगी थी और किसी ने उस की घड़ी छिन ली थी. ऐसा होने से उस ने आंखे खोली थी. देखा तो घड़ी गायब थी.. यह देखकर वह चिल्लाने लगी., रोने  लगी. गाड़ी शुरू हो गई थी. इस स्थिति में कोई उस की मदद नहीं कर पाया था.

       मा बाप क्या कहेंगे, उस डर से वह परेशान थी. और लोअर परेल उतर गई थी. और टिकिट बारी के पास ख़डी आंसू बहा रही थी.

      उस समय बड़ी उम्र का शख्स उस के पास आया था. उस ने बडे प्यार से उस के कंधो को सहलाते हुए सवाल किया था.

      " क्या हो गया बेटी? "

       उस का सवाल सुनकर लड़की को कुछ लगा था. वह अपनी घड़ी वापस चाहती थी. इस लिये वह उस शख्स की बात में आ गई थी. उस ने साब कुछ बता दिया था.

       उस पर शख्स ने कहां था.

       " बेटी मेरी खुद की घड़ी की दुकान हैं, वहाँ तुम्हारे जैसी कई घड़िया हैं तुझे एक घड़ी दे दूंगा जो तुम्हे मात पिता के गुस्से थे बचा लेंगा. "

        " क्या आप मुझे अपनी शोप ले जाओंगे? "

        " वह तो मुमकिन नहीं क्यों की मैं उसे लंच के लिये बंध कर के आया हूं. लेकिन तुम फ़िक्र मत करो. मेरे घर में गोडाउन हैं. वहाँ तुम्हारे जैसी कई घड़िया मौजूद हैं. तुम मेरी घर चलो और जो चाहे वह ले लो. "

         और लड़की उस की बातों में आ गई थी. और उस शख्स के साथ चल पड़ी थी.

         घर में पहुंच कर उस ने लड़की को पानी पिलाया था. फिर उस की खातिरदारी का नाटक कर के कुछ पिलाया था. और एक गहने से भी अधिक इज्जत लुंट ली थी. और उसे टेक्सी में बिठाया था. उस शख्स ने टैक्सी का बिल दिया था और स्टेशन पहुंच गई थी. उस वक़्त वह भान में आ गई थी.

       उस वक़्त स्टेशन पर एक पुलिस हवालदार मौजूद था. उस ने सब कुछ बताया था. और वह उसे घर छोड़ जाता हैं.

       उस के मात पिता भी अपनी बेटी दो किंमती चीज खो आई थी. उस बात से संतप्त थे, दुखी थे लेकिन विवश, मजबूर थे लड़की कुछ भी करने की स्थिति में नहीं थी.

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       फिल्मों में काम करने वाला, फ़िल्म बनाने वाला हर शख्स कामयाब नहीं होता था. उस में एक नाम था गुरुदत्त जिस ने कई सारी फिल्मे बनाई थी लेकिन उन्हें जश नहीं मिला था.

        उन्होंने कई फिल्मे बनाई थी जिस में ' सी आई डी ' ' प्यासा ' कागज के फूल ' ' चौदहवी का चांद' ' साहिब बीबी और गुलाम ' 

        उन्ही की खोज थी : वहिदा रहमान,  जिस को उन्होंने ने अपनी फ़िल्म,  सी आई डी में एक रोल दिया था. बाद में उन की हर कोई फ़िल्म में वहिदा जी ने मुख्य भूमिका निभाई थी. ऐसा कहां जाता था  की उन के वैवाहिक जीवन में समस्या ख़डी हुई थी.

       दूसरी और उन की दूसरी फ़िल्म ' कागज के फूल ' जो टिकिट बारी पर संपूर्ण तौर पर फ्लोप हो गई थी. यह बात वह बर्दास्त नहीं कर पाये थे.

        उन्होंने गीता दत्त से शादी की थी जो उस जमाने की नामी प्ले बेक सिंगर थी. उस ने पति की फिल्मोंमें सभी गीत गये थे.. उन के परिवार पर कोई कुदरती प्रकोप था. कागज के फूल ने उन्हें पूर्ण रूप से तोड़ दिया था. जिस की वजह से उन्होंने खुदकुशी का रास्ता अख्तयार किया था. 

        जो यहीं नहीं रुका था. कुछ समय के बाद गीता दत्त ने भी पति की राह चलकर ख़ुदकुशी थी.. बात यहाँ भी नहीं अटकी थी. उन के बेटे तरुण दत्त ने भी वही मार्ग ग्रहण किया था.

        गुरु दत्त के जाने के बाद उस के छोटे भाई आत्मा राम ने भाई के बैनर तले दो तीन फिल्मे बनाई थी.

        उस के अलावा गुरु दत्त ने दूसरे निर्माता की फ़िल्म - भरोसा और सुहागन  में भी काम किया था.

       '  प्यासा ' उन की सब से बड़ी फ़िल्म थी. उस में फ़िल्म के एक गीत के जरिये अपनी सारी भड़ास निकाली थी.

          जला दो जला दो उसे फूंक डालो ये दुनिया

          मेरी सामने से हटा लो ये दुनिया

          तुम्हारी हैं तुम्ही संभालो ये दुनिया

          ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या हैं?

       फ़िल्म में उन्होंने वेश्या की जिंदगी के बारे में बहुत कुछ बताया था. 

                    000000000000   ( क्रमशः)