Yaado ki Sahelgaah - 18 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (18)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (18)


                     : : प्रकरण : : 18

        एक महिने में दोनों की शादी हुई थी.. डोना केथोलिक बिरादरी से थी.. तो उन की शादी चर्च में हुई थी.. मैं अकेला शादी में उपस्थित था.

       शाम को होल में सत्कार समारोह आयोजित किया गया था. दोनों ने हमे अलग से आमंत्रण पत्रिका दी थी, हमने भी दोनों को अलग से गिफ्ट दिया था.. उसे देखकर ओफिस का स्टाफ चकित सा ऱह गया था

      शादी के बाद हम दोनों का आने जाने का रास्ता एक हो गया था.

      एक दिन उस ने मुझे खुश खबरी सुनाई थी.

      " आई एम कैर्रीईंग. "

      और साथ में मुझे गुजारिश की थी

       " आप हर दिन मेरा स्टेशन से ओफिस और ओफिस से स्टेशन तक मेरा साथ दोंगे? "

       उस की तबियत भी ठीक नहीं रहती थी. इस हालत में मना करने का कोई सवाल नहीं था. और साथ आने जाने का सिलसिला जारी हो गया था.

      रक्षाबंधन का त्यौहार आ रहा था. उस के दो दिन पहले मैंने प्यून के जरिये चिट्ठी भेजकर अनुरोध किया था.

      " तुम मुझे राखी बांधना!, "

      उस ने खुशी खुशी मेरा प्रस्ताव स्वीकार भी लिया था.

       रक्षाबंधन को ओफिस में छुट्टी थी.. उस ने मुझे कहां था.

      " पहली बार राखी बंधवाने मेरे घर आना होगा. "

       मैंने उस की बात का स्वीकार किया था और रक्षाबंधन के दिन उस के घर पहुंच गया था.

       लेकिन दरवाजे पर ताला लटक रहा था.

       इस बात से मायूस हो गया था.

       पडोशी ने मुझे बताया था उस की तबियत ठीक नहीं थी तो उस का पति उसे मायके ले गया हैं. यह सुनकर मैं उस के मायके पहुंच गया था.

       हम दोनों उस की शादी में मिले थे तो उस की मा ने मुझे पहचान लिया था.

      " वह तो मेरी बहन के घर माटूंगा गई हैं.. आप को क्या काम था? "

       मैंने उन्हें सच्चाई बयान कर दी थी.

       " आज रक्षाबंधन का त्यौहार हैं. वह मुझे राखी बांधने वाली थी. "

      " हां यह ठीक नहीं हुआ. उस की तबियत यकायक ख़राब हो गई और ऐसा हो गया. "

       " कोई बात नहीं राखी तो कभी भी बांधी जा सकती हैं. ठीक हैं आंटी मैं चलता हूं. "

       " ऐसे कैसे जा सकते हो? चाय कोफ़ी कुछ भी पीकर जाना पड़ेगा. "

        और मैं चाय पीकर वहाँ से निकल रहा था. उन्होंने खुद सामने से अपनी बहन का पता दिया.. और राखी बंधवाने के लिये मैं उधर पहुंच गया. वहाँ भी मुझे निराशा प्राप्त हुई. 

       उस दिन बुधवार था, और वह नोविना के लिये चर्च गई थी.

      मैं बिल्डिंग की सीढ़िया उतर रहा था तो ओफिस का न्यूज़ पेपर रायजी मुझे मिल गया..

      उस ने मुझे अपने घर बुलाया. लेकिन मैं उस के मुंह लगना नहीं चाहता था तो बहाना बनाकर  निकल गया था.

      दूसरे दिन शाम को मैं राखी बंधवाने फ्लोरा के घर गया था. वह तो ओफिस नहीं आई थी. लेकिन उस ने मुझे राखी बंधवाने घर बुलाया था. मैंने उस से राखी बंधवाने की धुन में नाहक में भगादौड़ी की थी उस पर दोनों ने मेरी माफ़ी मांगी थी और मुझे टोका भी था.

        फ्लोरा ने मुझे राखी बांधी थी.. उस वक़्त टी वी पर रक्षाबंधन का गीत चल रहा था.

        ये राखी बंधन हैं ऐसा, ये राखी बंधन हैं ऐसा

        जैसे चंदा और किरन का

        जैसे बद्री और पवन का

.       जैसे धरती और गगन का

       उस ने मुझे राखी बांधी तो विरपसली की रस्म निभाते हुए कुछ राशि उस के हाथों में थमाने की कोशिश की थी.उस ने मना किया तो मैंने जबरन पैसे.उस को दे दिये..

        बाद में चाय नास्ता कर के उन के घर से निकल आया था.

         उस ने मुझे राखी बांधी थी. उस से टेलीफ़ोन ऑपरेटर को मिर्ची लगी थी  उस ने हमारा रिश्ता मानने से इन्कार कर दिया और छिछोरे पन पर उतर आई थी.

          " दिन को सिस्टर, रात को बिस्तर "

           उस को देखकर किशन ने भी भद्दी कमेन्ट्स पास की थी.

           " दिन को दीदी और रात को बीवी. "

       मैंने टेलीफ़ोन ओपरेटर से पेन मांगी तो उस ने मुझे कहां था.

       " पेन क्या बहन भी मिलेगी! "

       उस का भला कोई क्या मतलब? 

        वह बहन को रात की बीवी मानती थी.

        अब वह खुद बहन बनना चाहती थी उस का मतलब वह रात की बीवी बनना तैयार की थी. क्या उस ने अनजाने में ऐसी बात की थी? या खुद सच में मेरी बीवी बनना चाहती थी.

        हम लोग सदा साथ आते जाते थे यह देखकर किशन ने भी सवाल किया था.

       " आप दोनों साथ में आते जाते हो तो आप की बीवी को उस का पता हैं? "

       उस को कुछ जवाब देना मैंने मुनासिब नहीं समझा था, इस लिये मैंने चुप्पी साध ली थी.

       फ्लोरा और जूनियर पार्टनर का आपस में बिल्कुल नहीं बनता था. दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा था.

       फ्लोरा बिल्कुल आउट स्पोकन- स्पष्ट वक्ता थी.. किसी भी गलत व्यवहार करने वाले को मुंह पर सुनाने का सामर्थ्य रखती थी.

        वह प्रेग्नेंट थी. उस के लिये छुट्टी मांगेगी.. और उसे पगार के साथ छुट्टी देनी पड़ेगी. यह बात कंजूस मारवाड़ी राजन से हजम नहीं होती थी. वह कुछ भी कर के उस को जोब से ख़ारिज करना चाहता था. लेकिन उस के साथ खड़ा था तो उस की हिमत नहीं थी. उसे फ़ौल्ट में लाने के लिये किशन को जासूस बनाया था  

       उस ने फ्लोरा के लिये कुछ भड्डी कमेंट्स की थी. इस वजह से दोनों के बीच बात चीत का व्यवहार भी नहीं बचा था.

      30 मार्च का दिन था. अगले दिन इम्पोर्ट एक्सपोर्ट पोलिसी जाहिर होने वाली थी.. कुछ जानकारी के मुताबिक उन को नई आने वाली पोलिसी से काफ़ी नुकसान होने वाला था. उस से बचने के पहले 31मार्च की तारीख में कुछ डमी फाइल्स लाइसेंन्सिंग डिपार्टमेंट में जमा करने की जरूरत थी. उस के लिये अगले दिन सब को जल्दी आना आवश्यक था. जूनियर ने सब को जल्दी आने की सूचना दी थी. सब लोग तैयार हो गये थे, लेकिन फ्लोरा तैयार नहीं थी क्यों की उस को सुबह में अपने पति के टिफिन तैयार करना पड़ता था.

 .     उस ने मना किया तो जूनियर ने हमारी दोस्ती. का फायदा उठाकर. मुझे उसे समझाने के लिये बीच में डाला था. मेरे कहने से वह आने को तैयार हो गई थी.

        और मैंने सारी फ़ाइल तैयार करवाली थी. लाइसेंस डिपार्टमेंट में जमा कर दी थी. बाद में मैं फ्लोरा और रश्मि को खाना खाने के लिये होटल में गया था. और उस का खर्चा वाउचर बनाकर वसूल कर लिया था.

                     0000000000     ( क्रमशः)




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