Garbha Sanskar - 16 in Hindi Women Focused by Praveen Kumrawat books and stories PDF | गर्भ संस्कार - भाग 16 - ऐक्टिविटीज़–15

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गर्भ संस्कार - भाग 16 - ऐक्टिविटीज़–15

प्रार्थना:
माँ सरस्वती वरदान दो, 
मुझको नवल उत्थान दो। 
यह विश्व ही परिवार हो, 
सब के लिए सम प्यार हो । 
आदर्श, लक्ष्य महान हो । माँ सरस्वती..........

मन, बुद्धि, हृदय पवित्र हो, 
मेरा महान चरित्र हो। 
विद्या विनय वरदान दो। माँ सरस्वती.... 

माँ शारदे हँसासिनी, 
वागीश वीणा वादिनी। 
मुझको अगम स्वर ज्ञान दो। 
माँ सरस्वती, वरदान दो। 
मुझको नवल उत्थान दो।
उत्थान दो। उत्थान दो...।

मंत्र:
सर्वे देवी रत्नमयीं पूजयन्ति मातरं। 
आशीर्वादे सुख, ऐश्वर्यं प्राप्तिम्।

अर्थः सभी देवी-माताएँ रत्नमयी होती हैं और उनका पूजन करने से सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। माँ की कृपा से जीवन में सभी प्रकार की समृद्धि आती है।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! ईश्वर की उपासना से न केवल आत्मिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन में समृद्धि भी आती है। जब तुम सच्चे मन से ईश्वर की पूजा करते हो, तो वह तुम्हें न केवल भौतिक, बल्कि मानसिक और आत्मिक समृद्धि भी प्रदान करते हैं। जीवन में किसी भी प्रकार की कमी या कठिनाई आने पर ईश्वर की उपासना और भक्ति तुम्हारे लिए मार्गदर्शक बनती है। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा ईश्वर से जुड़ने का प्रयास करो, क्योंकि वह तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति हैं।”

पहेली:
एक गाँव में आग लगी, 
दूसरे गाँव में धुँआ, 
चलो मित्र चलकर देखें, 
उठा भूमि का कुआँ।

कहानी: विवेकानंद के साधारण विचार
स्वामी विवेकानंद, भारतीय समाज के महान संत और समाज सुधारक जिनके विचार आज भी हमारे जीवन को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उनका जीवन साधारण था, लेकिन उनके विचार अत्यंत गहरे और प्रभावशाली थे। उन्होंने अपनी सरलता और दृढ़ निष्ठा से न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व में लोगों को प्रेरित किया। स्वामी विवेकानंद ने जीवन को एक उद्देश्य के रूप में देखा और इसके हर पहलू को सही दिशा में मोड़ने की कोशिश की। उनके विचार केवल ज्ञान की बातें नहीं थे, बल्कि वे जीवन के व्यवहारिक पहलुओं से भी जुड़े थे।

स्वामी विवेकानंद के विचार हमेशा सादगी और शुद्धता से ओत-प्रोत होते थे। उनका मानना था कि जीवन में सफलता और शांति पाने के लिए सबसे पहले हमें अपने भीतर की शक्ति को पहचानना होगा। उन्होंने अपनी शिक्षाओं में यह संदेश दिया कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अपार क्षमता छिपी होती है, जिसे अगर सही दिशा में मोड़ा जाए तो वह समाज की भलाई के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है।

एक बार स्वामी विवेकानंद अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के पास बैठे और उनके साथ जीवन के गहरे प्रश्नों पर चर्चा कर रहे थे। स्वामी विवेकानंद ने कहा, “गुरुजी, क्या यह सत्य नहीं है कि हमारे जीवन का उद्देश्य केवल आत्मज्ञान और परमात्मा का साक्षात्कार करना है?”

गुरु रामकृष्ण ने उत्तर दिया, “तुम सही कह रहे हो, लेकिन आत्मज्ञान प्राप्ति का रास्ता केवल ध्यान और साधना के माध्यम से ही नहीं है। तुम्हें अपनी बाहरी दुनिया के साथ सामंजस्य भी बनाए रखना होगा।”

स्वामी विवेकानंद को यह समझ में आ गया कि जीवन का उद्देश्य केवल आत्मज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान का समाज के कल्याण के लिए उपयोग करना भी है। वे हमेशा यह मानते थे कि जीवन का असली उद्देश्य दूसरों की सेवा करना और समाज की भलाई के लिए काम करना है।

स्वामी विवेकानंद के एक अन्य प्रसिद्ध विचार को लेकर चर्चा हुई जब उन्होंने अपने भाषणों में कहा, “उठो, जागो और तब तक नहीं रुकना जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” यह विचार उनके जीवन का मूल मंत्र बन गया। उनका यह संदेश न केवल युवाओं के लिए था, बल्कि यह हर व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य को पहचानने और उस पर काम करने के लिए प्रेरित करता था। स्वामी विवेकानंद का यह विचार आज भी हमें अपने सपनों को पूरा करने की प्रेरणा देता है।

स्वामी विवेकानंद की सादगी का एक उदाहरण उनकी एक यात्रा के दौरान देखने को मिला। एक बार वे अमेरिका में शिकागो विश्व धर्म महासभा में भारतीय संस्कृति और धर्म का प्रचार करने के लिए गए थे। वहां एक बड़ा शाही स्वागत हुआ, लेकिन स्वामी विवेकानंद ने बहुत ही साधारण और बिना किसी भव्यता के साथ समारोह में भाग लिया। वे अपनी सादगी में ही पूरी दुनिया को संदेश दे रहे थे कि सत्य और ज्ञान का कोई दिखावा नहीं होता, वह केवल व्यक्ति के आंतरिक गुणों पर निर्भर करता है। 

स्वामी विवेकानंद ने हमेशा यह माना कि किसी भी व्यक्ति की असली पहचान उसके आंतरिक गुणों, उसके चरित्र और उसके कार्यों से होती है, न कि उसके बाहरी आभूषणों या धन-दौलत से। यही कारण था कि उन्होंने हमेशा सादगी और ईमानदारी को जीवन का मूलमंत्र बताया।

उनके विचारों में यह भी था कि जीवन में संघर्ष और कठिनाइयां जरूरी हैं। उन्होंने कहा था, “संसार में हर एक को समस्याओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन वही व्यक्ति सफलता की ओर बढ़ता है, जो इन समस्याओं से डरता नहीं है।” स्वामी विवेकानंद ने जीवन को एक चुनौती के रूप में देखा और उसे स्वीकार किया। उनका मानना था कि अगर किसी व्यक्ति को अपनी मंजिल तक पहुंचना है, तो उसे समस्याओं का सामना करते हुए उन्हें हल करने का तरीका सीखना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद ने अपनी युवा अवस्था से ही यह महसूस किया था कि भारत की प्रगति का रास्ता केवल शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। वे हमेशा यह कहते थे कि “भारत को जागरूक करने के लिए हमें पहले अपनी शिक्षा प्रणाली को मजबूत करना होगा।” उनका विचार था कि यदि युवा शक्ति को सही दिशा में प्रेरित किया जाए तो वह देश के भविष्य को संवारने में मदद कर सकते है। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने इसे जीवन के हर पहलू से जोड़ा। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जन नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक विकास और समाज की सेवा करना होना चाहिए।

एक बार स्वामी विवेकानंद ने युवाओं से कहा, "तुम वह शक्ति हो जो इस देश को एक नई दिशा दे सकती हैं। तुम ही हो जो इस समाज को बदल सकते हो। तुम्हारे अंदर वह शक्ति है, जो दुनिया को बदल सकती है।" यह विचार न केवल भारत के युवाओं के लिए प्रेरणादायक था, बल्कि पूरे दुनिया के युवाओं के लिए एक मार्गदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया।

स्वामी विवेकानंद का सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली भाषण 1893 में शिकागो विश्व धर्म महासभा में था। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत इस शब्दों से की थी: "आपका भारत, भले ही गरीबी और कष्टों से जूझ रहा हो, लेकिन वह मानवता का असली मापदंड है।" उनका यह भाषण न केवल भारत के लिए गर्व का क्षण था, बल्कि यह पूरी दुनिया में धर्म, समाज और मानवता के बारे में नए दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने का अवसर था। स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को यह सिखाया कि सभी धर्मों का उद्देश्य केवल एक ही है — मानवता की सेवा। 

शिक्षा:
स्वामी विवेकानंद के विचारों से हमें यह सिखने को मिलता है कि जीवन में सफलता केवल बाहरी वस्तुओं से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता, कार्यों की ईमानदारी और समाज की भलाई के लिए किए गए प्रयासों से मिलती है। उनका यह संदेश कि हर व्यक्ति के भीतर अपार शक्ति है, हमें अपनी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें समाज के लिए उपयोग में लाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि सच्ची शिक्षा वह है जो जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने में मदद करती है, न कि केवल किताबों तक सीमित ज्ञान।

स्वामी विवेकानंद की शिक्षा आज भी हमारे लिए मार्गदर्शन है, क्योंकि उन्होंने हमेशा हमें यह याद दिलाया कि संघर्ष और कठिनाइयां जीवन का हिस्सा हैं, और यही हमें मजबूत बनाती हैं। उनका यह विचार कि युवा शक्ति देश और समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, आज भी हमारे राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पहेली का उत्तर : हुक्का
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प्रार्थना:
हे ईश्वर आप ही इस धरती और इस ब्रह्मांड के निर्माणकर्ता हो। आप सभी के जीवन के कर्ता-धर्ता है, आप ही सभी प्राणियों के सुख-दुख को हरने वाले हो। हे ईश्वर हमें सुख-शांति का रास्ता दिखाने का उपकार करें। हे श्रृष्टि के रचियता! हे परमपिता परमेश्वर! हमारी आपसे यही विनती है कि आप मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें और हमारे जीवन को उज्जवल बनाए।

मंत्र:
मातृभूमिः सौम्या, पितृभूमिः शान्तिवर्धिनी। 
व्रज पत्यं प्राप्य सुखं मातरं प्रणम्यहम्।

अर्थ: माँ का स्थान सौम्यता और शांति से भरपूर होता है । पितृभूमि भी शांति को बढ़ावा देती है। हम उनका हमेशा सम्मान और प्रणाम करते हैं, ताकि सुख की प्राप्ति हो।

गर्भ संवाद:
“मेरे प्यारे बच्चे! श्रद्धा और विश्वास से जीवन में हर समस्या का समाधान हो जाता है। जब तुम भगवान में विश्वास रखते हो और श्रद्धा से उनके मार्ग पर चलते हो, तो जीवन की हर समस्या आसान हो जाती है। भगवान कभी भी अपने भक्त को अकेला नहीं छोड़ते, उनका हाथ हमेशा तुम्हारे साथ होता है। जीवन में जितना अधिक तुम भगवान पर विश्वास करोगे, उतना ही तुम्हारा मन शांत और स्थिर रहेगा। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा श्रद्धा और विश्वास से जीवन में आगे बढ़ो।”

पहेली:
दुनिया भर की करता सैर, धरती पर ना रखता पैर, दिन मे सोता रात मे जगता, रात अँधेरी मेरे बगैर, अब बताओ मेरा नाम ?

कहानी:सच्चाई की ताकत
सत्यमपुर नामक एक छोटे से गाँव में रमेश नाम का एक किसान रहता था। रमेश अपनी ईमानदारी और मेहनत के लिए पूरे गाँव में प्रसिद्ध था। वह अपने छोटे से खेत में दिन-रात काम करता और अपनी पत्नी सुनीता और दो बच्चों, गोपाल और मीनू के साथ खुशहाल जीवन बिताता। उसका मानना था कि सच्चाई और मेहनत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।

एक दिन गाँव के मुखिया हरिराम ने घोषणा की कि उसके खेत से अनाज की चोरी हो गई है। मुखिया ने गाँव की सभा बुलाकर रमेश पर आरोप लगाया कि यह चोरी उसने की है। रमेश स्तब्ध रह गया। उसने अपने ऊपर लगे आरोप को पूरी सभा के सामने नकारते हुए कहा, “मुखिया जी, मैंने कोई चोरी नहीं की है। मैं अपने खेत में मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालता हूँ।” लेकिन मुखिया ने रमेश की एक न सुनी और उसे दंड देने की माँग की।

गाँव के लोग भी दुविधा में पड़ गए। रमेश की ईमानदारी पर किसी को शक नहीं था, लेकिन मुखिया का प्रभाव इतना था कि कोई भी उसके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था। रमेश ने ठान लिया कि वह अपनी सच्चाई साबित करेगा। उसने गाँव के कुछ बुजुर्गों और अपने दोस्तों से मदद मांगी। उन्होंने उसे हिम्मत दी और कहा कि सच्चाई की ताकत को कोई हरा नहीं सकता।

रमेश ने अपनी जांच शुरू की। उसने गाँव के हर कोने में जाकर चोरी के बारे में पता लगाने की कोशिश की। धीरे-धीरे उसे मुखिया के चरित्र और उसकी योजनाओं के बारे में कुछ चौंकाने वाले तथ्य पता चले। रमेश को पता चला कि मुखिया ने खुद अपने ही गोदाम में चोरी का अनाज छिपा रखा है ताकि वह गाँव वालों को डरा सके और अपनी पकड़ मजबूत कर सके। रमेश ने इस सच्चाई के सबूत जुटाए और गाँव के लोगों को इकट्ठा करके पूरी बात बताई।

गाँववालों ने जब मुखिया के गोदाम की तलाशी ली तो वहाँ चोरी का अनाज मिल गया। मुखिया की सच्चाई सबके सामने आ गई। उसकी धूर्तता देखकर सभी गाँव वाले क्रोधित हो गए और उसे तुरंत मुखिया पद से हटाने का निर्णय लिया। उन्होंने रमेश की ईमानदारी और साहस की सराहना की और उसे गाँव का नया मुखिया बनाने का प्रस्ताव दिया। रमेश ने विनम्रता से यह जिम्मेदारी स्वीकार की और वादा किया कि वह हमेशा न्याय और सच्चाई के रास्ते पर चलेगा।

इस घटना ने पूरे गाँव को यह सिखाया कि सच्चाई की ताकत सबसे बड़ी होती है। कठिनाइयाँ चाहे जितनी भी हों, अगर हमारा मन साफ और इरादे मजबूत हों, तो अंत में जीत सच्चाई की ही होती है। रमेश की कहानी सच्चाई और ईमानदारी का एक जीता-जागता उदाहरण बन गई।

पहेली का उत्तर : चांद 
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प्रार्थना
1. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा का किंचित्मात्र भी अहम् न दुभे (दुःखे), न दुभाया (दुःखाया) जाए या दुभाने (दुःखाने) के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।

मुझे किसी भी देहधारी जीवात्मा का किंचित्मात्र भी अहम् न दुभे, ऐसी स्याद्वाद वाणी, स्याद्वाद वर्तन और स्याद्वाद मनन करने की परम शक्ति दीजिए ।

2. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी धर्म का किंचितमात्र भी प्रमाण न दुभे, न दुभाया जाए या दुभाने के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।

मुझे किसी भी धर्म का किंचित्मात्र भी प्रमाण न दुभाया जाए ऐसी स्याद्वाद वाणी, स्याद्वाद वर्तन और स्याद्वाद मनन करने की परम शक्ति दीजिए।

3. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी देहधारी उपदेशक साधु, साध्वी या आचार्य का अवर्णवाद, अपराध, अविनय न करने की परम शक्ति दीजिए।

4. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा के प्रति किंचित्मात्र भी अभाव, तिरस्कार कभी भी न किया जाए, न करवाया जाए या कर्ता के प्रति न अनुमोदित किया जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।

5. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा के साथ कभी भी कठोर भाषा, तंतीली भाषा न बोली जाए, न बुलवाई जाए या बोलने के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।

कोई कठोर भाषा, तंतीली भाषा बोले तो मुझे, मृदु-ऋजु भाषा बोलने की शक्ति दीजिए।

6. हे भगवान! मुझे, किसी भी देहधारी के प्रति स्त्री, पुरुष या नपुंसक, कोई भी लिंगधारी हो, तो उसके संबंध में किंचितमात्र भी विषय-विकार संबंधी दोष, इच्छाएँ, चेष्टाएँ या विचार संबंधी दोष न किए जाएँ, न करवाए जाएँ या कर्ता के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।

मुझे, निरंतर निर्विकार रहने की परम शक्ति दीजिए।

7. हे भगवान! मुझे, किसी भी रस में लुब्धता न हो ऐसी शक्ति दीजिए।

समरसी आहार लेने की परम शक्ति दीजिए।

8. हे भगवान! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, जीवित अथवा मृत, किसी का किंचितमात्र भी अवर्णवाद, अपराध, अविनय न किया जाए, न करवाया जाए या कर्ता के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।

9. हे भगवान ! मुझे, जगत् कल्याण करने का निमित्त बनने की परम शक्ति दीजिए, शक्ति दीजिए, शक्ति दीजिए।

मंत्र:
सर्वज्ञा देवी मातरं धृतिमत्यं च आत्मनं। 
शांतिदायिनी सर्वकार्यप्रदा सुखप्रदा च।

अर्थः माँ का रूप सर्वज्ञ और सबको मार्गदर्शन देने वाला होता है। वह शांति और सुख की दायिनी होती हैं, जिनके आशीर्वाद से जीवन में सभी कार्य सिद्ध होते हैं।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! ईश्वर की उपासना से न केवल आत्मिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन में समृद्धि भी आती है। जब तुम सच्चे मन से ईश्वर की पूजा करते हो, तो वह तुम्हें न केवल भौतिक, बल्कि मानसिक और आत्मिक समृद्धि भी प्रदान करते हैं। जीवन में किसी भी प्रकार की कमी या कठिनाई आने पर ईश्वर की उपासना और भक्ति तुम्हारे लिए मार्गदर्शक बनती है। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा ईश्वर से जुड़ने का प्रयास करो, क्योंकि वह तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति हैं।”

पहेली:
बिना कान के सुनने वाला, 
नीचे गोरा ऊपर काला।

कहानी: सपनों का झरना
यह कहानी एक छोटे से गाँव की है, जहाँ एक खूबसूरत झरना था। गाँव वाले उसे "सपनों का झरना" कहते थे क्योंकि उनका मानना था कि यह झरना किसी के भी गहरे सपने को साकार कर सकता है। लेकिन यह सिर्फ एक अफवाह नहीं थी, गाँव के बुजुर्गों का कहना था कि जो भी यहाँ अपनी असल इच्छा लेकर आता है, उसकी इच्छा पूरी होती है, लेकिन उसके लिए उसे खुद में बदलाव लाना पड़ता है।

गाँव में एक लड़का था, जिसका नाम मोहन था। मोहन गरीब था, लेकिन उसका सपना बहुत बड़ा था। वह चाहता था कि उसकी शिक्षा पूरी हो और वह बड़ा आदमी बने, ताकि वह अपने परिवार की मदद कर सके। वह जानता था कि इसके लिए उसे बहुत संघर्ष करना होगा, लेकिन उसे यह यकीन था कि सपने सच हो सकते हैं। एक दिन, उसने सोचा कि वह सपनों के झरने की ओर जाएगा और अपनी इच्छा वहाँ प्रकट करेगा।

मोहन ने झरने के पास जाकर अपनी आँखें बंद की और पूरी ईमानदारी से अपनी इच्छा प्रकट की, "हे झरने मेरी एक ही इच्छा है — मैं अपनी शिक्षा पूरी करूँ और एक दिन बड़ा आदमी बनूँ। मुझे अपनी मेहनत का फल चाहिए।"

झरने से धीमी आवाज में एक उत्तर आया, "मोहन, तुम्हारी इच्छा बहुत प्यारी है लेकिन तुम्हें यह याद रखना होगा कि सपने सच तब होते हैं, जब हम अपने कर्मों में विश्वास रखते हैं। अगर तुम अपने सपने के पीछे पूरी मेहनत और संघर्ष से काम करोगे, तो मैं तुम्हारी मदद करूंगा।"

मोहन को यह समझ में आ गया कि सिर्फ झरना उसके सपने को पूरा नहीं कर सकता, बल्कि उसे खुद भी इस दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। उसने गाँव लौटने के बाद अपना पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगा दिया। वह दिन-रात कड़ी मेहनत करता, ताकि वह अपने सपने को साकार कर सके।

समय के साथ, मोहन ने कड़ी मेहनत और संघर्ष से अपनी पढ़ाई पूरी की और एक अच्छी नौकरी पा ली। वह बड़ा आदमी बना, लेकिन उसने कभी नहीं भुलाया कि यह सब संभव हुआ क्योंकि उसने अपने कर्मों को सही दिशा में लगाया था।

शिक्षा:
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि सपने सच तब होते हैं, जब हम उन्हें साकार करने के लिए खुद मेहनत और संघर्ष करते हैं। सपनों के लिए केवल इच्छाएं काफी नहीं होतीं, बल्कि सही दिशा में प्रयास और मेहनत करनी होती है।

पहेली का उत्तर : साँप
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प्रार्थना:
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये॥

अर्थ: जिनकी गति, मन के समान तथा वेग वायु के समान है, जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, पवन के पुत्र एवं वानरों की सेना के मुखिया हैं तथा श्री रामचन्द्र के दूत हैं। ऐसे हनुमान जी की मै शरण लेता हूँ और उन्हें प्रणाम करता हूँ।

मंत्र:
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:॥

अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते है— जिससे किसी को कष्ट नहीं पहुँचता तथा जो अन्य किसी के द्वारा विचलित नहीं होता, जो सुख-दुख में, भय तथा चिन्ता में समभाव रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

गर्भ संवाद
"मेरे बच्चे! तुम जब भी जीवन के किसी कार्य को शुरू करो, तो भगवान का नाम लो। भगवान का नाम हमें हर कार्य में शक्ति और शांति देता है। जैसे एक नाविक अपने जहाज को चलाने के लिए दिशा के निशान का पालन करता है, वैसे ही भगवान का नाम हमें सही मार्ग पर चलने के लिए दिशा दिखाता है। मैं चाहती हूं कि तुम हर कदम पर भगवान को अपने साथ महसूस करो, ताकि तुम्हारी राह हमेशा सही दिशा में हो।"

पहेली:
सिर पर उसके देखा मटका, 
मटके को घर लाकर पटका, 
कुछ को खाया कुछ को फेंका, 
मटके का पानी भी गटका ।

कहानी: परिश्रम का फल
गाँव हरिपुर में मोहन नाम का एक किसान रहता था। मोहन गरीब जरूर था, लेकिन मेहनती और ईमानदार था। उसके पास खेती के लिए एक छोटा सा खेत था, जिसमें वह कड़ी मेहनत करता और अपनी पत्नी और बच्चों का पालन-पोषण करता।

गाँव के बाकी किसान बड़े खेतों और आधुनिक साधनों के कारण अधिक फसल उगाते थे, जबकि मोहन के पास केवल अपनी मेहनत और लगन थी। लोग अक्सर उसे ताना मारते और कहते, “तू इतनी मेहनत करता है, फिर भी तेरी फसल इतनी कम क्यों होती है? अगर हमारे जैसे साधन हों, तो फिर देख तेरी हालत।” लेकिन मोहन ने कभी हार नहीं मानी और अपना काम पूरी निष्ठा से करता रहा।

एक बार गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। बड़े किसानों की फसलें पानी की कमी के कारण खराब होने लगीं। उन्होंने अपने महंगे उपकरण और साधनों का इस्तेमाल किया, लेकिन सूखे के सामने सब बेकार साबित हुआ। वहीं, मोहन ने अपनी समझदारी और परिश्रम से खेत में पानी के संरक्षण के उपाय किए। उसने खेत में तालाब बनाया और पानी की बर्बादी रोकी।

जब फसल कटाई का समय आया, तो मोहन की फसल लहलहा रही थी, जबकि बाकी किसानों की जमीनें सूखी पड़ी थीं।

यह देखकर गाँव के लोग हैरान रह गए। वे मोहन के पास आए और उससे पूछा, “तुमने यह कैसे किया?” मोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने कभी परिश्रम करना नहीं छोड़ा। चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर हम मेहनत करते रहें और अपनी बुद्धि का सही इस्तेमाल करें, तो सफलता जरूर मिलती है।”

गाँव वालों ने मोहन से सीख लेकर अपने खेतों में भी पानी के संरक्षण के उपाय शुरू किए। मोहन की मेहनत और समझदारी ने उन्हें यह सिखाया कि बड़े साधनों से ज्यादा जरूरी है परिश्रम और सही दृष्टिकोण।

शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि कठिन परिश्रम और लगन से हर समस्या का समाधान संभव है। साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन अगर इंसान में मेहनत और सच्चाई हो, तो वह असंभव को भी संभव बना सकता है। परिश्रम का फल मीठा होता है, और यह हमें सम्मान और सफलता दोनों दिलाता है।

पहेली का उत्तर : नारियल
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प्रार्थना:
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी, 
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए, 
राम सीता का दर्शन कराके मुझे, 
मेरे सपने को साकार कर दीजिए ॥

दुख देते है मुझे मेरे ही पाप, 
मेरे मन में है क्या, जानते आप हैं, 
आप हर रूप है इसलिए कर कृपा, 
मेरे हर एक संकट को हर लीजिए, 
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी, 
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,

मैं भावुक तो हूं पर नहीं भक्त हूं, 
इसी कारण तो विषयों में आसक्त हूं 
वासना मुक्त कर मेरे मन को प्रभु 
राम सीता की भक्ति से भर दीजिए, 
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी, 
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,

तन निरोगी रहे, धन भी भरपुर हो, 
मन भजन में रहे, द्वंद्व दुख दूर हो, 
कर्ज भी ना रहे, मर्ज भी ना रहे, 
फर्ज निभाते रहे ऐसा वर दीजिए, 
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी, 
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,

मैं कथा भी कहूं सियाराम की, 
मैं भक्ति भी करूं तो सिया राम की, 
मेरे हर एक संकट को हर लीजिये ,
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी, 
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,

मंत्र:
ॐ एकदन्ताय विद्महे 
वक्रतुंडाय धीमहि 
तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात॥

अर्थ: हम भगवान गणपति, जिनके हाथी के दांत हैं और जो सर्वव्यापी है, उनको नमन करते हैं। हम भगवान गणेश जी से प्रार्थना करते हैं कि हमें अधिक बुद्धि प्रदान करें और हमारे जीवन को ज्ञान से रोशन कर दें। हम आपके सामने नतमस्तक होते हैं। 

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! जब हम भगवान की उपासना करते हैं, तो हमारी आत्मा को शांति मिलती है। यह शांति हमें अपने मन और दिल से सभी डर और चिंता को निकालने का अवसर देती है। भगवान की उपासना से हमें आंतरिक संतोष मिलता है, और यह हमें हर परिस्थिति में सुकून से जीने की ताकत देती है। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा अपने दिल में भगवान की उपासना करो, ताकि तुम्हारी आत्मा हमेशा शांत और संतुष्ट रहे।”

पहेली:
सर के नीचे दबी रहे, 
लेकिन चू तक न करती है, 
बच्चों, बोलो कौन है वो 
जो साथ तुम्हारे सोती है।

कहानी: सकारात्मकता का चमत्कार
एक छोटे से गाँव में एक लड़का था जिसका नाम था दीपक। दीपक का जीवन बहुत साधारण था, लेकिन उसमें एक विशेष गुण था – वह हमेशा सकारात्मक सोचता था। गाँव में सभी लोग उसे उसकी मुस्कान और उसकी सकारात्मक ऊर्जा के लिए जानते थे। लेकिन एक दिन दीपक के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती आई। गाँव में सूखा पड़ गया, फसलें मुरझाने लगीं, और पानी की कमी हो गई। सभी लोग चिंतित थे और मानने लगे थे कि गाँव का भविष्य अंधकारमय है।

दीपक ने सोचा कि यह संकट केवल बाहरी परिस्थितियों का परिणाम नहीं है, बल्कि हमारे भीतर की सोच पर भी निर्भर करता है। उसने अपने दोस्तों और परिवार से कहा, "हम सभी को अब अपनी सोच बदलनी होगी। हमें यह मानकर चलना होगा कि हमारे पास शक्ति है, और हम सकारात्मक सोच के माध्यम से इस संकट से उबर सकते हैं। अगर हम विश्वास और उम्मीद नहीं खोते, तो भगवान भी हमारी मदद करेंगे।"

लेकिन गाँव के लोग दीपक की बातों को नकारात्मक मानते थे। वे सोचते थे कि यह केवल समय की बात है, और कोई चमत्कार नहीं हो सकता। दीपक ने हार नहीं मानी और लगातार सकारात्मक रहने की कोशिश की। वह हर सुबह अपने दोस्तों को उत्साहित करता और उन्हें बताता कि हर कठिनाई के बाद राहत मिलती है और हमें उसका सामना धैर्य और साहस से करना चाहिए।

दीपक की सकारात्मकता ने धीरे-धीरे गाँव में एक नई लहर पैदा की। लोग अब उम्मीद से जीवन जीने लगे थे। सभी ने मिलकर पानी बचाने के उपाय किए और बारिश के लिए प्रार्थना शुरू की। कुछ ही दिनों बाद, अचानक बारिश होने लगी और गाँव की ज़मीन फिर से हरी-भरी हो गई। दीपक का विश्वास और सकारात्मकता ही थी जिसने गाँव को संकट से उबारने में मदद की थी।

शिक्षा:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सकारात्मक सोच एक चमत्कार की तरह काम करती है। जब हम जीवन में आशा और विश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं, तो हमारे सामने आने वाली कठिनाइयाँ भी हल हो जाती हैं। सकारात्मकता से हम अपने जीवन की दिशा बदल सकते हैं और खुद को और दूसरों को प्रेरित कर सकते हैं। 

पहेली का उत्तर : तकिया
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प्रार्थना:
हे ईश्वर आप ही इस धरती और इस ब्रह्मांड के निर्माणकर्ता हो। आप सभी के जीवन के कर्ता-धर्ता है, आप ही सभी प्राणियों के सुख-दुख को हरने वाले हो। हे ईश्वर हमें सुख-शांति का रास्ता दिखाने का उपकार करें। हे श्रृष्टि के रचियता! हे परमपिता परमेश्वर! हमारी आपसे यही विनती है कि आप मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें और हमारे जीवन को उज्जवल बनाए।

मंत्र:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थः भगवान श्री कृष्ण कहते हैं– तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फलों में कभी नहीं। कर्म को फल की इच्छा से न करो और न ही आलस्यपूर्वक कर्म से विमुख होओं।

गर्भ संवाद:
“मेरे प्यारे बच्चे! जब जीवन में संघर्ष आए, तो भगवान से मार्गदर्शन प्राप्त करो। भगवान हमें हमारे रास्ते पर चलने की ताकत देते हैं और हमें हर मुश्किल से पार करने की शक्ति प्रदान करते हैं। चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ हों, भगवान का मार्गदर्शन हमेशा हमारे साथ होता है। मैं चाहती हूं कि तुम जीवन के किसी भी संघर्ष का सामना करते हुए भगवान से मार्गदर्शन प्राप्त करो, क्योंकि उनके आशीर्वाद से तुम हर कठिनाई को पार कर सकोगे।”

पहेली:
सात गाँठ की रस्सी, 
गाँठ-गाँठ में रस, 
इसका उत्तर जो बताये, 
नाक भैया देंगे रुपए दस।

कहानी: बंदर और मगरमच्छ
बहुत समय पहले, एक घने जंगल के बीच से एक बड़ी नदी बहा करती थी। इस नदी के किनारे एक विशाल पेड़ खड़ा था, जो मीठे और रसीले फलों से लदा रहता था। इस पेड़ पर एक बुद्धिमान और चतुर बंदर रहता था। वह अकेला था लेकिन इस पेड़ के फल खाकर खुश रहता था और अपनी जिंदगी शांति से बिताता था।

उसी नदी में एक मगरमच्छ और उसकी पत्नी भी रहते थे। मगरमच्छ दिनभर नदी में मछलियां पकड़ता और अपने लिए भोजन लाता था। एक दिन, मगरमच्छ नदी के किनारे आराम कर रहा था, तभी उसकी नजर उस पेड़ पर पड़ी। उसने देखा कि बंदर पेड़ पर बैठकर मीठे फल खा रहा था। मगरमच्छ को फलों का स्वाद चखने की इच्छा हुई। उसने बंदर से कहा, “अरे दोस्त, क्या तुम मुझे कुछ फल दोगे? ये फल देखने में बहुत स्वादिष्ट लग रहे हैं।”

बंदर बड़ा उदार था। उसने तुरंत कुछ फल तोड़े और मगरमच्छ को दिए। मगरमच्छ ने उन फलों का स्वाद चखा और बहुत खुश हुआ। उसने बंदर का धन्यवाद किया और कहा, “तुम सचमुच बहुत अच्छे हो। मैं अब हर दिन तुम्हारे पास आऊंगा और तुमसे फल लिया करूंगा।”

इसके बाद, मगरमच्छ हर दिन बंदर के पास आता, फल खाता, और दोनों में गहरी दोस्ती हो गई। मगरमच्छ अपनी पत्नी को भी इन फलों के बारे में बताता था। एक दिन मगरमच्छ की पत्नी ने उससे कहा, “अगर इन फलों का स्वाद इतना मीठा है, तो सोचो उस बंदर का दिल कितना मीठा होगा। मुझे उस बंदर का दिल खाने का बहुत मन है।”

मगरमच्छ को यह सुनकर बहुत अजीब लगा। उसने अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश की, “बंदर मेरा दोस्त है। मैं उसका दिल कैसे ला सकता हूं? यह बहुत गलत होगा।” लेकिन उसकी पत्नी ने जिद पकड़ ली और मगरमच्छ को बाध्य कर दिया। उसने कहा, “अगर तुम मेरे लिए उसका दिल नहीं लाओगे, तो मैं खाना-पीना छोड़ दूंगी।”

मगरमच्छ अपनी पत्नी की बातों से मजबूर हो गया। उसने योजना बनाई कि वह बंदर को किसी तरह नदी के बीच बुलाएगा और उसे धोखा देगा। अगले दिन मगरमच्छ बंदर के पास गया और उससे कहा, “अरे दोस्त! मेरी पत्नी ने तुम्हारे फलों की बहुत तारीफ सुनी है। वह तुम्हारा धन्यवाद करना चाहती है। क्या तुम हमारे घर चलोगे?”

बंदर पहले थोड़ा झिझका, लेकिन फिर उसने सोचा कि मगरमच्छ उसका अच्छा दोस्त है और उसे उस पर भरोसा करना चाहिए। बंदर मगरमच्छ की पीठ पर बैठ गया और मगरमच्छ उसे नदी के बीच ले गया। तभी मगरमच्छ ने अपना असली इरादा बताया। उसने कहा, “दोस्त, मेरी पत्नी तुम्हारा दिल खाना चाहती है। इसलिए मैं तुम्हें यहां लाया हूं।”

बंदर यह सुनकर चौंक गया, लेकिन उसने तुरंत अपने दिमाग से काम लिया। उसने कहा, “अरे दोस्त, तुमने पहले क्यों नहीं बताया? मैं अपना दिल तो पेड़ पर ही छोड़ आया हूं। अगर तुम्हें मेरा दिल चाहिए, तो हमें वापस पेड़ पर जाना होगा।”

मगरमच्छ को बंदर की बात पर भरोसा हो गया, और वह बंदर को वापस पेड़ की ओर ले गया। जैसे ही वे पेड़ के पास पहुंचे, बंदर फुर्ती से पेड़ पर चढ़ गया। उसने ऊपर से मगरमच्छ को देखा और कहा, “मूर्ख! मेरा दिल मेरे शरीर के अंदर है। तुमने मुझे धोखा देने की कोशिश की, लेकिन मैं तुम्हारी चालाकी से ज्यादा चतुर हूं। अब जाओ और अपनी पत्नी से कहो कि मैं तुम्हारे जैसे धोखेबाज दोस्त के साथ अपनी दोस्ती खत्म कर रहा हूं।”

मगरमच्छ को अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। वह शर्मिंदा होकर वापस नदी में चला गया। बंदर ने सीखा कि किसी पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए, और मगरमच्छ ने सीखा कि दोस्ती में ईमानदारी और विश्वास सबसे महत्वपूर्ण हैं।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कभी भी अपने दोस्तों को धोखा नहीं देना चाहिए। सच्ची दोस्ती में विश्वास और ईमानदारी सबसे जरूरी होती हैं। साथ ही, मुश्किल समय में हमें अपनी बुद्धिमानी का उपयोग करके समस्याओं से बाहर निकलना चाहिए।

पहेली का उत्तर : जलेबी
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प्रार्थना
अंतर्यामी परमात्मा को नमन,
शक्ति हमेशा मिलती रहे आपसे; 
ऐसी कृपा कर दो, अज्ञान दूर हो, आतम ज्ञान पाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन

सद्बुद्धि प्राप्त हो, व्यवहार आदर्श हो, सेवामय जीवन रहे। 
अंतर्यामी परमात्मा को नमन

मात-पिता का उपकार ना भूलें, हरदम गुरु के विनय में रहें, दोस्तों से स्पर्धा ना करेंगे, एकाग्र चित्त से पढ़ेंगे हम; 
अंतर्यामी परमात्मा को नमन 

आलस्य को टालो, विकारों को दूर कर दो, व्यसनों से हम मुक्त रहें, ऐसे कुसंगों से बचा लो हमें।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन

मन-वचन और काया से, दुःख किसी को हम ना दें।
चाहे ना कुछ भी किसी का, प्योरिटी ऐसी रखेंगे हम।  
अंतर्यामी परमात्मा को नमन

कल्याण के हम सब, निमित्त बने ऐसे,
विश्व में शांति फैलाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन

पूर्ण रूप से हम खिलें, मुश्किलों से ना डरें... धर्मों के भेद मिटा दें जग में, ज्ञानदृष्टि को पाकर हम।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन

अभेद हो जाएँ, लघुतम में रहकर हम,
प्रेम स्वरूप बन जाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन

मंत्र:
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।।

अर्थः जो व्यक्ति अपने कर्मों का फल त्याग कर देता है, वह कर्मयोग में स्थित होता है। इस श्लोक में यह बताया गया है कि यदि हम अपने कर्मों के परिणाम को भगवान पर छोड़ देते हैं, तो हमें शांति मिलती है। यह शांति और संतुलन जीवन में मदद करती है, जैसे मातरुपा शक्ति भी समृद्धि और संतुलन लाती है।

गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! जीवन का सच्चा उद्देश्य आत्मा की शुद्धि है। हम जितने अधिक अच्छे कर्म करेंगे और भगवान से जुड़े रहेंगे, उतनी ही हमारी आत्मा शुद्ध होगी। जैसे पानी की धारा को साफ किया जाता है, वैसे ही हम अपनी आत्मा को भगवान के प्रेम और भक्ति से शुद्ध कर सकते हैं। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा अपनी आत्मा को शुद्ध करने का प्रयास करो, ताकि तुम जीवन में सच्चे सुख और शांति का अनुभव कर सको।”

पहेली:
पत्थर की नाव पर, 
बैठा सवार, 
चलती नहीं नाव, 
पर चलता सवार।

कहानी: सियार और अंगूर
किसी समय की बात है, एक घने जंगल में एक चालाक सियार रहता था। वह हमेशा भोजन की तलाश में इधर-उधर भटकता रहता था। वह ज्यादा मेहनत करने से बचता था और हमेशा आसान तरीके से भोजन पाने की कोशिश करता था। एक दिन, सियार बहुत भूखा था और उसे खाने के लिए कुछ नहीं मिल रहा था।

जंगल में भटकते हुए, सियार एक बगीचे के पास पहुंचा। बगीचे के अंदर अंगूरों की बेल लगी हुई थी और बेल पर रसीले अंगूर लटके हुए थे। सियार ने उन अंगूरों को देखा और उसका मुंह पानी से भर गया। उसने सोचा, “वाह! ये अंगूर तो बहुत स्वादिष्ट लग रहे हैं। अगर मैं इन्हें खा लूं, तो मेरा पेट भर जाएगा।”

लेकिन समस्या यह थी कि अंगूर बहुत ऊंचाई पर थे। सियार ने सोचा, “मैं चालाक हूं। थोड़ी कोशिश करूंगा तो इन अंगूरों तक पहुंच ही जाऊंगा।” वह अंगूरों तक पहुंचने के लिए उछलने लगा। उसने अपनी पूरी ताकत लगाई, लेकिन अंगूर उसकी पहुंच से बाहर थे।

सियार ने कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार नाकाम रहा। वह थककर जमीन पर बैठ गया और सोचने लगा, “अब क्या किया जाए? इतनी मेहनत करने के बाद भी मैं इन अंगूरों तक नहीं पहुंच पा रहा हूं। शायद मुझे किसी और तरीके से इन्हें पाने की कोशिश करनी चाहिए।”

फिर उसने एक बार और जोर लगाकर उछलने की कोशिश की, लेकिन वह फिर असफल रहा। अंत में सियार थक-हारकर बोला, “ये अंगूर तो खट्टे हैं। इन्हें खाने का कोई फायदा नहीं। मैं क्यों अपना समय बर्बाद करूं?” यह कहकर वह बगीचे से चला गया।

सियार ने भले ही खुद को संतुष्ट करने के लिए यह बहाना बना लिया, लेकिन असल में वह अपनी मेहनत और प्रयास में कमी के कारण असफल रहा। उसने बिना पूरी कोशिश किए यह मान लिया कि अंगूर खट्टे हैं।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए मेहनत और लगन से प्रयास करना जरूरी है। असफलता मिलने पर बहाने बनाने के बजाय, हमें अपनी कमियों को समझकर दोबारा कोशिश करनी चाहिए। अधूरी मेहनत और बहानों से कभी भी सफलता नहीं मिलती।

पहेली का उत्तर : सिल बट्टा
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प्रार्थना:
ॐ एकदन्ताय विद्महे 
वक्रतुंडाय धीमहि 
तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात॥

अर्थ: हम भगवान गणपति, जिनके हाथी के दांत हैं और जो सर्वव्यापी है, उनको नमन करते हैं। हम भगवान गणेश जी से प्रार्थना करते हैं कि हमें अधिक बुद्धि प्रदान करें और हमारे जीवन को ज्ञान से रोशन कर दें। हम आपके सामने नतमस्तक होते हैं। 

मंत्र:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।

अर्थः तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके परिणाम में नहीं। तुम कर्म के फल के कारण न बनो, और न ही कर्म से विमुख हो। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं कि कर्म करने में मन लगाओ, परिणाम पर ध्यान न दो। यह श्लोक हमें अपने कार्यों में पूरी तत्परता और समर्पण से लगे रहने की प्रेरणा देता है।

गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! सपने और लक्ष्य केवल मेहनत से ही पूरे होते हैं, और इसका रास्ता हमेशा कठिन होता है। सफलता पाने के लिए तुम्हें कई बाधाओं से गुजरना पड़ता है, लेकिन यही बाधाएं तुम्हें और मजबूत बनाती हैं। मैं चाहती हूं कि तुम कभी भी किसी कठिनाई से घबराओ नहीं, क्योंकि जो रास्ता कठिन होता है, वही रास्ता अंत में सफलता की ओर जाता है। इसलिए, मेहनत करो और चुनौतियों का सामना करो, क्योंकि यही तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक पहुंचाएगा।”

पहेली: 
न देखे न बोले, 
फिर भी भेद खोले।

कहानी: पारिवारिक एकता की जीत
बहुत समय पहले, एक बड़े परिवार में चार भाई रहते थे। उनके नाम थे रवि, सुमित, आकाश और विनोद। उनका परिवार गांव के सबसे आदर्श परिवारों में से एक था, क्योंकि वे एकता और सामंजस्य के साथ रहते थे। उनके पिता, रामप्रसाद, ने हमेशा उन्हें सिखाया था कि एकता में ताकत होती है।

रामप्रसाद उम्रदराज हो चुके थे और अब घर के सभी बड़े फैसले चारों भाइयों की सहमति से होते थे। एक दिन, गांव के एक बाहरी व्यक्ति महेश, ने उनकी जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की। महेश बहुत चालाक और धूर्त व्यक्ति था। उसने कागजों में हेरफेर कर दावा किया कि वह जमीन का असली मालिक है।

महेश ने कहा, “यह जमीन अब मेरी है। अगर तुम लोगों को इसे बचाना है, तो मुझे पैसे दो, वरना मैं तुम्हें यहां से बेदखल कर दूंगा।”

चारों भाई इस समस्या को सुनकर चिंता में पड़ गए। सबसे छोटे भाई विनोद ने गुस्से में कहा, “हम महेश से लड़ेंगे और उसे दिखा देंगे कि यह जमीन हमारी है।” लेकिन बड़े भाई रवि ने कहा, “हमें पहले शांत होकर इस समस्या का हल सोचना चाहिए। गुस्से से कोई हल नहीं निकलेगा।” चारों भाइयों ने मिलकर गांव के बुजुर्गों की मदद ली और कानूनी सलाह मांगी।

उन्होंने अपनी जमीन के पुराने कागजात निकाले और उन्हें अच्छे से तैयार किया। इसके बाद, उन्होंने मिलकर महेश के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई की योजना बनाई। महेश ने जब देखा कि पूरा परिवार एकजुट है और उसके खिलाफ कानूनी कदम उठा रहा है, तो वह डर गया। उसने महसूस किया कि उसकी चालाकी और झूठ के सामने इस परिवार की एकता काम कर रही है।

आखिरकार, चारों भाइयों ने अपनी जमीन को बचा लिया। पूरे गांव में उनकी तारीफ होने लगी। सबसे बड़े भाई रवि ने कहा, “हमारी जीत हमारी एकता की वजह से हुई है। अगर हम आपस में लड़ते, तो महेश का झूठ जीत जाता।”

उस दिन के बाद, चारों भाइयों ने यह ठान लिया कि वे हमेशा परिवार की एकता बनाए रखेंगे और किसी भी समस्या का सामना मिलकर करेंगे।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि परिवार में एकता और सहयोग से बड़ी से बड़ी समस्याओं को हल किया जा सकता है। जब लोग मिल-जुलकर काम करते हैं, तो वे हर मुश्किल का सामना कर सकते हैं।

पहेली का उत्तर : पत्र
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