प्रार्थना:
सभी सुखी हो, सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सबका दुःख दुर हो, सबका वैर शांत हो। इस संसार मे रहने वाले सारे प्राणियो की पीड़ा समाप्त हो वे सुखी और शांत हो। चाहे वे जीव जल मे रहने वाले हो या स्थल मे या फिर गगन मे रहने वाले। सभी सुखी हो। इस पूरे ब्रह्माण्ड मे सभी दृश्य और अदृश्य जीवो का कल्याण हो। बह्मांड मे रहने वाले सभी जीव और प्राणी सुखी हो वे पीड़ा से मुक्त हो।
मंत्र:
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
अर्थ: यह ब्रह्मांड पूर्ण है और उसकी हर रचना पूर्ण है। उस पूर्ण से जो लिया जाता है, वह भी पूर्ण ही रहता है।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूँ …… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हें परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।
— प्रेम स्वरूप परमात्मा का अंश होने के कारण तुम्हारा हृदय भी प्रेम से भरपूर है, तुम्हारी हर अदा में परमात्मा का प्रेम झलकता है।
— तुम्हारे हृदय में सम्पूर्ण मानवमात्र के प्रति समभाव है।
— तुम्हारा हृदय सबके लिए दया और करुणा से भरपूर रहता है।
— क्षमाशीलता के गुण के कारण सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं, जिससे तुम्हारा स्वभाव और विनम्र हो जाता है।
— नम्रता तुम्हारा विशेष गुण है।
— मेरे बच्चे। तुम्हारा प्रत्येक कार्य सेवा-भाव से परिपूर्ण होता है।
— सहनशीलता तुम्हारा स्वाभाविक गुण है।
— धैर्यपूर्वक प्रत्येक कार्य को करना तुम्हारी महानता है।
— तुम्हारा मन आंतरिक रूप से स्थिर और शांत है।
— मेरे बच्चे! तुम बल और साहस के स्वामी हो।
— तुम अनुशासन प्रिय हो।
— कृतज्ञता का गुण तुम्हारे व्यवहार की शोभा बढ़ाता है।
— तुम अपनो से बड़ों को सम्मान और छोटों को प्रेम देते हो।
— तुम भाव से बहुत भोले हो लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी कठोरता भी दिखाते हो।
— तुम अपनो से छोटों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हो।
— तुम सत् और असत के पारखी हो।
— तुम्हारा व्यवहार चन्द्रमा के समान शीतल है।
— तुम सबसे इतना मीठा बोलते हो कि सभी तुम पर मोहित हो जाते हैं।
— तुम्हारा व्यक्तित्व परम प्रभावशाली है।
— तुम हमेशा सत्य बोलना ही पसंद करते हो।
— तुम हाजिर जवाबी हो।
— तुम्हारे मुख से निकला एक-एक शब्द मधुर और आकर्षक होता है।
— तुम मन, वचन और कर्म से पवित्र हो।
— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन हैं।
पहेली:
घोड़ा दौड़ा पटरी पर
फिर उड़ जायेगा ऊपर,
बादल के प्यारे घर में,
दूर हवा में अंदर में।
कहानी: गुरु का आशीर्वाद
एक छोटे से गाँव में एक युवक अर्जुन रहता था। अर्जुन बहुत मेहनती और होनहार था, लेकिन उसे जीवन में दिशा नहीं मिल रही थी। वह समझ नहीं पाता था कि उसकी मेहनत का कोई परिणाम क्यों नहीं मिल रहा। वह निराश होकर अक्सर अकेले बैठकर सोचता, “मेरी मेहनत क्यों व्यर्थ जा रही है? क्या मैं कभी अपने लक्ष्य तक पहुँच पाऊँगा?”
अर्जुन के गाँव में एक प्रसिद्ध गुरु, स्वामी रामदास रहते थे। स्वामी रामदास को अपनी शिक्षा, ज्ञान और अध्यात्म के लिए पूरे गाँव में आदर दिया जाता था। अर्जुन ने निश्चय किया कि वह अपनी समस्या लेकर गुरुजी के पास जाएगा और उनसे मार्गदर्शन मांगेगा।
एक दिन, अर्जुन गुरुजी के आश्रम पहुँचा। गुरुजी ध्यानमग्न बैठे थे। अर्जुन ने उनके चरण स्पर्श किए और विनम्रता से अपनी परेशानी बताई। उसने कहा, “गुरुजी, मैं कड़ी मेहनत करता हूँ, लेकिन मुझे जीवन में सफलता नहीं मिल रही। मैं समझ नहीं पाता कि मेरी मेहनत का फल क्यों नहीं मिल रहा। कृपया मुझे रास्ता दिखाइए।”
गुरुजी ने ध्यान से अर्जुन की बात सुनी। उन्होंने कुछ क्षण सोचा और फिर मुस्कुराते हुए बोले, “पुत्र, सफलता के लिए केवल मेहनत ही काफी नहीं है। तुम्हें धैर्य और सही दिशा में प्रयास की भी आवश्यकता है। मैं तुम्हें एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ, जिससे तुम्हें जीवन का सत्य समझ आएगा।”
गुरुजी ने कहानी शुरू की:
“एक किसान था। उसने अपने खेत में एक आम का पेड़ लगाया। वह पेड़ की देखभाल में दिन-रात लगा रहता था। हर दिन वह उसे पानी देता, खाद डालता और धूप से बचाता। कई महीने बीत गए, लेकिन पेड़ पर फल नहीं आए। किसान निराश हो गया और उसने सोचा कि शायद उसकी मेहनत बेकार गई। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने अपनी देखभाल जारी रखी। कुछ समय बाद, पेड़ पर पहली बार छोटे-छोटे आम आने लगे। किसान की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने समझा कि सफलता में समय और धैर्य दोनों का बड़ा महत्व है।”
गुरुजी ने अर्जुन से कहा, “पुत्र, जीवन में सफलता भी उस आम के पेड़ की तरह है। तुम्हारी मेहनत का परिणाम समय पर मिलेगा। लेकिन अगर तुम धैर्य खो दोगे और बीच में ही रुक जाओगे, तो तुम अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँच पाओगे।”
अर्जुन ने गुरुजी की बातों को ध्यान से सुना और उनके चरणों में सिर झुका लिया। उसने निश्चय किया कि अब वह धैर्य और आत्मविश्वास के साथ अपने प्रयास करता रहेगा। उसने अपने जीवन को एक नई दिशा दी और कुछ ही वर्षों में अपनी मेहनत और समर्पण से अपने लक्ष्य को प्राप्त किया।
गुरुजी के आशीर्वाद ने अर्जुन की सोच को बदल दिया और उसे सिखाया कि सफलता धैर्य, निरंतर प्रयास और सही मार्गदर्शन से मिलती है।
शिक्षा:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में सफलता केवल मेहनत से नहीं मिलती, बल्कि धैर्य और सही दिशा में प्रयास भी जरूरी हैं। गुरु का आशीर्वाद और उनके मार्गदर्शन से हमें जीवन के सही मूल्य समझ में आते हैं। कठिन समय में हमें धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए क्योंकि सफलता का फल समय के साथ मिलता है।
पहेली का उत्तर : हवाई जहाज
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गीता सार
क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न पैदा होती है, न मरती है ।
जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आये, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं से दिया। जो लिया इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया। खाली हाथ आए, खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यह प्रसन्नता ही तुम्हारे दुःखों का कारण है।
परिवर्तन ही संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ो के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया मन से मिटा दो, विचार से हटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो? तुम अपने आपको भगवान् के अर्पित करो। यह सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिन्ता शोक से सर्वदा मुक्त है।
जो कुछ तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। इसी में तू सदा जीवन-मुक्त अनुभव करेगा।
मंत्र:
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्॥
अर्थ: हे भगवान नरसिंह! आप उग्र, वीर और सभी दिशाओं में प्रकाश फैलाने वाले हैं। आप हमें भय से मुक्त करें।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूं…… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ भौतिक गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।
— परम तेजस्वी ईश्वर का अंश होने के कारण तुम्हारे मुख पर सूर्य के समान दिव्य तेज और ओज रहता है।
— तुम्हारे नैन-नक्श तीखे और बहुत सुन्दर है, तुम्हारा सुन्दर मुखड़ा सबको बहुत प्यारा लगता है।
— तुम्हारे चेहरे का रंग गोरा और सबका मन मोह लेने वाला है।
— तुम्हारी हर अदा सुन्दरतम ईश्वर की झलक लिए हुए है, तुम्हारा माथा चौड़ा है, तुम्हारी आँखें बड़ी है, तुम्हारी भौहें तीर के आकार की तरह बड़ी है, तुम्हारी पलकें काली और बड़ी हैं।
— तुम्हारे होंठ फूल की तरह कोमल और सुन्दर हैं, तुम्हारे चेहरे पर हर पल एक मधुर मुस्कान छाई रहती है।
— तुम्हारी बुद्धि कुशाग्र है, तुम्हारी वाणी मधुर और सम्मोहन करने वाली है।
— तुम बहुत अच्छे खिलाडी हो, तुम्हारा शरीर तंदुरुस्त और फुर्तीला है। (किसी विशेष खेल के प्रति शिशु के मन में प्रतिभा विकसित करनी हो तो यहाँ कह सकते हैं)
— तुम बहुत सुंदर दिखते हो, बड़े होने पर भी तुम्हारी सुंदरता और निखरती जाएगी।
— तुम्हारी हर अदा बहुत निराली और अनोखी है।
— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर में बहुत प्रसन्न हूँ, जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन है।
गर्भ संवाद:
“ मेरे बच्चे! तुम्हारे जीवन में हर दिन सफलता की ओर एक कदम बढ़ेगा। तुम्हारी मेहनत और सकारात्मक सोच तुम्हें हर लक्ष्य तक पहुंचाएगी। मैं जानती हूं कि तुम कभी भी हार नहीं मानोगे। तुम्हारे आत्मविश्वास और मेहनत से तुम अपनी हर चुनौती को पार कर सकोगे। सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी, क्योंकि तुम अपने रास्ते पर डटे रहोगे।”
पहेली:
आई गर्मी, आया मैं
बच्चों के मन भाया मैं,
गुठली चुसो या फेकों,
लाल सुनहरा आया मैं।
कहानी: दया का महत्व
बहुत समय पहले, एक गांव में रमेश नाम का एक व्यापारी रहता था। वह अपने व्यवसाय में बहुत सफल था और गांव के सबसे अमीर लोगों में से एक था। लेकिन रमेश के पास धन तो बहुत था, पर उसका दिल कठोर और स्वार्थी था। वह किसी की मदद नहीं करता और हमेशा अपने स्वार्थ के बारे में सोचता।
एक दिन, एक बूढ़ा भिखारी रमेश के घर के पास आया। वह बहुत कमजोर और भूखा लग रहा था। उसने रमेश से कुछ खाना मांगा। रमेश ने उसे गुस्से से देखा और कहा, “मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ नहीं है। जाओ, यहां से।”
भिखारी उदास होकर वहां से चला गया। लेकिन जाते-जाते उसने कहा, “आपके पास सब कुछ है, फिर भी आपके मन में दया नहीं। ऐसा जीवन किस काम का?”
उस रात रमेश ने एक अजीब सपना देखा। उसने देखा कि वह एक बड़े रेगिस्तान में अकेला भटक रहा है। उसे बहुत प्यास लगी थी, लेकिन दूर-दूर तक पानी का कोई स्रोत नहीं था। वह मदद के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन कोई उसकी मदद करने नहीं आया।
अचानक, वही बूढ़ा भिखारी उसके सामने प्रकट हुआ। उसने कहा, “जब तुमने मेरी मदद नहीं की, तो अब तुम्हारी मदद कौन करेगा?” रमेश डर के मारे जाग गया। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था।
अगले दिन, रमेश ने अपने सपने के बारे में सोचा और महसूस किया कि उसने अपने जीवन में कभी दया का महत्व नहीं समझा। उसने तय किया कि वह अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश करेगा।
उसने सबसे पहले उस बूढ़े भिखारी को ढूंढा और उसे भोजन, कपड़े और रहने के लिए एक जगह दी। इसके बाद, उसने गांव के गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करनी शुरू की। उसने बच्चों के लिए स्कूल बनवाया, गरीबों के लिए एक चिकित्सालय खोला, और गांव में पानी की सुविधा प्रदान की।
धीरे-धीरे रमेश का दिल बदलने लगा। उसे महसूस हुआ कि दूसरों की मदद करने और उनके चेहरे पर मुस्कान लाने से जो खुशी मिलती है, वह किसी भी धन-संपत्ति से अधिक मूल्यवान है।
गांव के लोग अब रमेश को एक दयालु और उदार व्यक्ति के रूप में जानने लगे। उसने अपने जीवन में दया का महत्व समझा और दूसरों को भी इसका महत्व सिखाने लगा।
शिक्षा
दया का महत्व हमारे जीवन को सच्चा अर्थ देता है। यह न केवल दूसरों के जीवन में खुशियां लाती है, बल्कि हमें भी भीतर से सुख और संतोष प्रदान करती है। हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि दया का छोटा सा कार्य भी किसी की जिंदगी बदल सकता है।
पहेली का उत्तर: आम
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प्रार्थना:
दया कर दान विद्या का हमे परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना।
हमारे ध्यान में आओ, प्रभु आँखों में बस जाओ,
अँधेरे दिल में आकर के परम ज्योति जगा देना।
बहा दो प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर,
हमे आपस में मिलजुल के प्रभु रहना सीखा देना।
हमारा कर्म हो सेवा, हमारा धर्म हो सेवा,
सदा ईमान हो सेवा, वो सेवक चर बना देना।
वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना,
वतन पे जा फ़िदा करना, प्रभु हमको सीखा देना।
दया कर दान विद्या का हमे परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना।
मंत्र:
त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणम् त्वमेव।
त्वमेव सर्वम् मम देव देव।
अर्थ: हे ईश्वर! तुम्हीं मेरी माता हो, तुम्हीं मेरे पिता हो, तुम्हीं मेरे भाई हो तथा तुम्हीं मेरे मित्र हो। तुम्हीं मेरा ज्ञान (विद्या), मेरा धन (संपदा,पराक्रम,सामर्थ्य आदि) हो। हे देवाधिदेव तुम्हीं मेरे सर्वस्व हो।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूं…… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार है।
— मेरे बच्चे! तुम्हारे मस्तिष्क में अपार क्षमता है। तुम्हारी बुद्धि तीव्र है।
— तुम आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक जैसी क्षमता लेकर आ रहे हो। तुममे कठिन से कठिन समस्या को सुलझाने की योग्यता है।
— तुम रामानुजन जैसी गणित के सवालों को हल करने की क्षमता रखते हो।
— विवेकानंद जैसी महान प्रतिभा है तुममें।
— तुम्हारी याददाश्त बहुत अच्छी है, जो बात तुम याद रखना चाहो तुम्हें सदा याद रहती है।
— तुम्हारी एकाग्रता कमाल की है। जिस काम पर तुम फोकस करते हो उसमें बेहतरीन परिणाम लेकर आते हो।
— कोई भी विषय, कोई भी टॉपिक तुम्हारे लिए कठिन नहीं, हर विषय को अपनी लगन से, परिश्रम से तुम सरल बना लेते हो।
— तुम्हारे भीतर अनंत संभावनाएं छुपी हुई है।
— तुम्हें म्यूजिक का बहुत शौक है, तुम सभी वाद्य यंत्र बजाना जानते हो। ढोलक, गिटार, तबला, हारमोनियम, तुम बहुत अच्छे से बजा सकते हो।
— तुम्हारा दिमाग बहुत तेज चलता है। मुश्किल से मुश्किल समस्या का भी तुम बड़ी आसानी से हल निकाल लेते हो।
— तुम्हारी वाणी में मिठास है। तुम एक बहुत अच्छे गायक हो। जब तुम गाते हो तो सभी मंत्रमुग्ध हो जाते है।
— तुम्हें पढ़ाई में सभी सब्जेक्ट अच्छे लगते है। जो भी पढ़ते हो बड़ी आसानी से याद हो जाता है।
गर्भ संवाद:
“मेरे प्यारे बच्चे, जीवन में कर्तव्य से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। तुम जब अपने कर्तव्यों को प्राथमिकता दोगे, तो न केवल अपने जीवन को दिशा दोगे, बल्कि दूसरों के लिए भी एक उदाहरण प्रस्तुत करोगे। कर्तव्य की भावना तुम्हारे जीवन को सही दिशा में ले जाएगी और तुम्हें सच्ची संतुष्टि मिलेगी। अपने परिवार, समाज और अपने देश के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने से तुम्हारी आत्मा को शांति मिलेगी।”
पहेली:
डिब्बे पे डिब्बा,
डिब्बा का गाँव
चलती फिरती बस्ती,
लोहे के पाँव।
कहानी: माता पार्वती का तप
प्राचीन समय की बात है। हिमालय पर्वत की गोद में, एक सुंदर और निडर कन्या पार्वती का जन्म हुआ। वह हिमालय राज और उनकी पत्नी मेनका की पुत्री थीं। बचपन से ही पार्वती में असीम शक्ति और समर्पण था। उनके हृदय में शिवजी के प्रति अनन्य भक्ति थी। पार्वती ने अपने माता-पिता से कहा कि वह केवल भगवान शिव से ही विवाह करेंगी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था।
भगवान शिव, तपस्वी और योगी थे। उनका जीवन साधारण था और वे किसी सांसारिक बंधन में नहीं पड़ना चाहते थे। लेकिन पार्वती का हृदय शिवजी के लिए समर्पित था। उन्होंने ठान लिया कि वह शिवजी को प्राप्त करने के लिए तपस्या करेंगी।
पार्वती ने कठिन तपस्या का संकल्प लिया। उन्होंने घने जंगलों में जाकर तपस्या शुरू की । दिन-रात बिना भोजन और पानी के वह केवल भगवान शिव का ध्यान करती रहीं। उन्होंने ठंड, गर्मी और बारिश जैसी सभी प्राकृतिक बाधाओं का सामना किया, लेकिन उनके मन में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। उनकी तपस्या इतनी कठिन थी कि देवता और ऋषि-मुनि भी चकित हो गए।
इंद्रदेव को चिंता हुई कि पार्वती की तपस्या के कारण उनके सिंहासन को खतरा हो सकता है। उन्होंने कामदेव को भेजा ताकि वह पार्वती का ध्यान भटकाएं। कामदेव ने अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए पार्वती की तपस्या भंग करने की कोशिश की लेकिन उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि कामदेव का सारा प्रयास विफल हो गया। कामदेव खुद अपनी शक्ति को कमजोर महसूस करने लगे।
भगवान शिव, जो अपने ध्यान में मग्न थे, पार्वती की कठिन तपस्या से प्रभावित हुए। उन्होंने पार्वती के समर्पण और भक्ति को स्वीकार किया और उनके सामने प्रकट हुए। शिवजी ने पार्वती से कहा, “तुम्हारा तप और भक्ति अद्वितीय है। तुम्हारा धैर्य और समर्पण मुझे स्वीकार है। मैं तुमसे विवाह के लिए तैयार हूँ।”
पार्वती का तप और समर्पण रंग लाया। उनका और भगवान शिव का विवाह बड़े धूमधाम से हुआ। इस विवाह ने यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति और समर्पण से असंभव भी संभव हो सकता है।
शिक्षा:
माता पार्वती का तप हमें सिखाता है कि सच्चा समर्पण और दृढ़ संकल्प किसी भी मुश्किल को पार कर सकता है। अगर हमारा मन सच्चा है और हमारा उद्देश्य पवित्र है तो कोई भी बाधा हमें हमारे लक्ष्य तक पहुँचने से रोक नहीं सकती।
पहेली का उत्तर : रेल
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प्रार्थना:
मैं उमापति, देवगुरू, जो ब्रह्मांड के कारण हैं, को नमन करता हूँ। मैं उनको नमन करता हूँ जिनका आभूषण सर्प है, जो मृगधर हैं एवं जो सभी प्राणियों के स्वामी हैं। सूर्य, चंद्रमा और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं और जो विष्णु प्रिय हैं, मैं उन्हें नमन करता हूँ। मैं भगवान शंकर को नमन करता हूँ जो सभी भक्तों को शरण देने वाले हैं, वरदानों के दाता हैं एवं कल्याणकारी हैं।
मंत्र:
श्री राम राम रामेति रमे रामे मनोरमा, सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने।
अर्थ: श्री राम के नाम का ध्यान करने से व्यक्ति परम शक्ति की दिव्य, स्वर्गीय कृपा को प्राप्त कर सकता है। और श्री राम का नाम भगवान विष्णु के हजार नामों के समान महान है।
गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारी संगत तुम्हारे व्यक्तित्व को आकार देती है। अच्छे लोग तुम्हें हमेशा सकारात्मक दिशा में प्रेरित करते हैं और बुरे लोग तुम्हारे जीवन को नकारात्मक बना सकते हैं। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा अच्छे लोगों के साथ रहो, क्योंकि अच्छी संगति से तुम्हारे भीतर अच्छे संस्कार और सकारात्मक विचार आएंगे। अच्छे लोग तुम्हारे जीवन के साथी बनते हैं और वे तुम्हारी सफलता में भागीदार होते हैं।”
पहेली:
हरा हूँ पर पत्ता नहीं,
नकलची हूँ पर बन्दर नहीं,
बूझो तो मेरा नाम सही।
कहानी: प्रभु राम की मर्यादा
भगवान राम, जो विष्णु के अवतार थे, मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जाने जाते हैं। उनकी कहानी धर्म, कर्तव्य और मर्यादा के आदर्शों से भरी हुई है। राम का जीवन उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलना चाहते हैं।
यह कहानी तब की है जब राम, सीता, और लक्ष्मण वनवास में थे। वनवास के दौरान, उन्होंने हर परिस्थिति में मर्यादा का पालन किया। एक दिन, जब रावण ने सीता का हरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया, तो राम ने अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए धर्म और मर्यादा के दायरे में रहकर काम किया।
राम ने वानरराज सुग्रीव और उनकी सेना की मदद से रावण के खिलाफ युद्ध की तैयारी की। जब वे समुद्र के किनारे पहुंचे, तो उन्हें लंका तक जाने का रास्ता चाहिए था। राम ने समुद्र देवता से प्रार्थना की, लेकिन समुद्र ने उनकी विनम्रता को अनसुना कर दिया।
राम को क्रोध आया, लेकिन उन्होंने अपनी मर्यादा नहीं तोड़ी। उन्होंने समुद्र को दंडित करने का संकल्प लिया, लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी प्रजा और सेना के हित में संयम रखा। समुद्र देवता उनके सामने प्रकट हुए और राम से क्षमा मांगी। उन्होंने राम को यह सुझाव दिया कि वे समुद्र पर पुल बनाएं और लंका तक पहुँचें।
राम और उनकी सेना ने मिलकर रामसेतु का निर्माण किया। यह पुल केवल एक मार्ग नहीं था, बल्कि यह राम की मर्यादा और कर्तव्य का प्रतीक था। राम ने रावण के साथ युद्ध में भी धर्म और मर्यादा का पालन किया। उन्होंने रावण को पहले चेतावनी दी और उसे सीता को लौटाने का मौका दिया। जब रावण ने उनकी बात नहीं मानी, तभी राम ने युद्ध किया।
राम ने रावण का वध कर दिया, लेकिन उन्होंने कभी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। उन्होंने अपनी प्रजा, परिवार, और धर्म के प्रति अपने कर्तव्यों को प्राथमिकता दी।
शिक्षा:
राम की मर्यादा हमें सिखाती है कि जीवन में हमें अपने कर्तव्यों और आदर्शों का पालन करना चाहिए। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें अपने धर्म और सच्चाई के मार्ग से नहीं भटकना चाहिए। मर्यादा और संयम ही सच्चे जीवन की पहचान हैं।
पहेली का उत्तर : तोता
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गीता सार
आप चिन्ता करते हो तो व्यर्थ है।
मौत से जो डरते हो तो व्यर्थ है।।
आत्मा तो चिर अमर है जान लो।
तथ्य यह जीवन का सच्चा अर्थ है।।
भूतकाल जो गया अच्छा गया।
वर्तमान देख लो चलता भया।।
भविष्य की चिन्ता सताती है तुम्हें?
है विधाता सारी रचना रच गया।।
नयन गीले हैं तुम्हारा क्या गया?
साथ क्या लाये जो तुमने खो दिया?
किस लिए पछता रहे हो तुम कहो?
जो लिया तुमने यहीं से है लिया।।
नंगे तन पैदा हुए थे खाली हाथ।
कर्म रहता है सदा मानव के साथ।।
सम्पन्नता पर मग्न तुम होते रहो।
एक दिन तुम भी चलोगे खाली हाथ।।
धारणा मन में बसा लो बस यही।
छोटा-बड़ा, अपना-पराया है नहीं।।
देख लेना मन की आँखों से जरा।
भूमि-धन-परिवार संग जाता नहीं।।
तन का क्या अभिमान करना बावरे।
कब निकल जाये यह तेरा प्राण रे।।
पाँच तत्वों से बना यह तन तेरा।
होगा निश्चय यह यहाँ निष्प्राण रे।।
स्वयं को भगवान के अर्पण करो।
निज को अच्छे कर्म से तर्पण करो।।
शोक से, भय से रहोगे मुक्त तुम।
सर्वस्व ‘रत्नम्’ ईश को समपर्ण करो।
मंत्र:
मातृदेवो भव पितृदेवो भव
आचार्यदेवो भव शत्रुदेवेव च।
सर्वे गुणाः माता से प्राप्ताः।
अर्थः माँ का स्थान देवता से भी ऊँचा होता है। उनकी कृपा और आशीर्वाद से जीवन में सभी गुणों का विकास होता है।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे, हर दिन तुम्हारे लिए कुछ नया सीखने का मौका होता है। चाहे वह छोटा सा काम हो या कोई बड़ा कार्य, हर स्थिति में एक सीख छिपी होती है। जब तुम हर दिन को एक नई सीख के रूप में देखोगे, तो तुम्हारी सोच और समझदारी बढ़ेगी। तुम्हारा जीवन हर दिन कुछ न कुछ नया सिखाएगा, और यही तुम्हारी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।”
पहेली:
कद के छोटे कर्म के हीन,
बीन बजाने के शौकीन ?
कहानी: राजा हरिश्चंद्र का सत्य
बहुत समय पहले की बात है, भारत में एक राजधानि थी, जिसका नाम था काशी। काशी के राजा का नाम था हरिश्चंद्र। वह अपने राज्य में प्रसिद्ध थे, न केवल अपने शौर्य और पराक्रम के लिए, बल्कि सबसे बढ़कर अपने सत्य के प्रति अडिग निष्ठा के लिए। उनके राज्य में सभी लोग सुखी थे, क्योंकि राजा ने अपने शासन में सत्य और न्याय का पालन पूरी तरह से किया था। उनका विश्वास था कि सत्य ही जीवन का मूल है और कोई भी त्याग इसके सामने छोटा होता है।
राजा हरिश्चंद्र के सत्य का एक अद्वितीय उदाहरण था उनकी न्यायप्रियता। एक दिन दरबार में एक ब्राह्मण आया और उसने राजा से एक वचन लिया, “महाराज, आप यदि सत्य का पालन करते हैं, तो मुझे अपने राज्य की भूमि पर मेरे कर्ज का भुगतान करने का वचन दें।” राजा ने तुरंत बिना किसी संकोच के यह वचन दिया और कहा, “तुम्हारे कर्ज को चुकता किया जाएगा।”
यह केवल एक वचन नहीं था, बल्कि यह राजा की सत्य के प्रति अपनी निष्ठा को दर्शाने वाली परख थी। राजा हरिश्चंद्र का जीवन और उनका राज्य हमेशा सत्य पर आधारित था। वह जानते थे कि यदि कभी भी सत्य से कोई समझौता हुआ, तो न केवल उनका शासन बल्कि उनके राज्य की आत्मा भी भ्रष्ट हो जाएगी।
एक दिन, राजा को एक गंभीर संकट का सामना करना पड़ा। उनके राज्य पर एक पड़ोसी शासक ने हमला किया। युद्ध के समय, राजा हरिश्चंद्र ने अपने सेनापतियों से यह कहा कि “हम शांति के रास्ते पर चलने का प्रयास करेंगे, लेकिन यदि युद्ध अपरिहार्य हो, तो हमें अपनी धरती की रक्षा करनी होगी।” लेकिन शत्रु की सेना इतनी बड़ी थी कि राजा हरिश्चंद्र और उनकी सेना को हार का सामना करना पड़ा। राजा को अपने राज्य और अपनी भूमि से निर्वासित कर दिया गया।
अब राजा हरिश्चंद्र और उनके परिवार के पास न तो कोई राज्य था, न धन, और न ही उनका कोई किला। लेकिन राजा का सत्य और उनके आदर्श वैसे के वैसे रहे। उनके परिवार में उनकी पत्नी रानी तात्या और उनका पुत्र रोहित थे। उन्होंने इस कठिन समय में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनका मानना था कि सत्य और न्याय का पालन करना हमेशा सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
राजा हरिश्चंद्र के निर्वासन के बाद वह अपने परिवार के साथ एक गांव में पहुंचे। वहां उनकी स्थिति बहुत कठिन थी। उनके पास भोजन के लिए कुछ भी नहीं था। राजा हरिश्चंद्र ने तय किया कि वह कुछ काम करेंगे ताकि उनका परिवार जीवित रह सके। लेकिन उनके पास कोई पेशेवर कौशल नहीं था। इसलिए, उन्होंने एक अजनबी से लकड़ी काटने का काम सीखा। वह पूरी मेहनत से काम करते थे, लेकिन उनका दिल हमेशा उस सत्य के साथ था, जो उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में अपनाया था।
एक दिन, राजा की परीक्षा और भी कठिन हुई जब उनके पुत्र रोहित की मृत्यु हो गई। यह एक बहुत ही दुखद घटना थी, क्योंकि राजा हरिश्चंद्र का पुत्र उनकी उम्मीदों और भविष्य का प्रतीक था। राजा ने अपने बेटे की मृत्यु को स्वीकार किया, लेकिन जैसे ही वह शव को जलाने के लिए लकड़ी के पास ले जाने लगे, एक और परीक्षा आ खड़ी हुई।
संपत्ति और जीवन का कोई मूल्य नहीं था, लेकिन सत्य के प्रति राजा की निष्ठा ने उन्हें इस कठिन घड़ी में भी मजबूती दी। जब उन्होंने अपने पुत्र का शव जलाने का वचन लिया था, तो अचानक एक ब्राह्मण ने उन्हें रोका और कहा, “महाराज, यह शव न तो आपके बेटे का है, यह किसी और का है।”
राजा हरिश्चंद्र ने उसे समझाया कि वह अपने बेटे को ही अंतिम संस्कार के लिए ले जा रहे हैं। लेकिन वह ब्राह्मण राजा से अपना वचन प्राप्त करने के लिए अड़ा हुआ था। उसने कहा कि यह केवल एक फर्ज है, और राजा हरिश्चंद्र को अपनी बात पर कायम रहना होगा।
यह एक असाधारण स्थिति थी, क्योंकि राजा हरिश्चंद्र अपने सत्य को कभी भी छोड़ने को तैयार नहीं थे। उन्होंने कहा, “यदि मुझे अपने बेटे की चिता पर बैठकर सत्य का पालन करना है, तो मैं यह करूंगा।” इस स्थिति में उन्हें न केवल अपने पुत्र को अंतिम विदाई देनी थी, बल्कि अपने वचन का पालन भी करना था।
राजा हरिश्चंद्र के दिल में यह गहरी पीड़ा थी, लेकिन सत्य के लिए उनका समर्पण उन्हें न केवल संजीवनी शक्ति दे रहा था, बल्कि उनके कर्तव्यों का पालन भी करने के लिए उन्हें प्रेरित कर रहा था। उन्होंने अंततः अपने पुत्र को जलाया, और यह उनकी सत्य के प्रति अडिग निष्ठा का प्रमाण था। इस घटना ने राजा हरिश्चंद्र के सत्य की महानता को और भी दृढ़ कर दिया।
शिक्षा:
राजा हरिश्चंद्र की कहानी हमें यह शिक्षा देती है कि सत्य का पालन न केवल शब्दों से, बल्कि हर परिस्थिति में करना चाहिए। कठिनाइयाँ और कष्ट जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन जब हम सत्य के मार्ग पर चलते हैं, तो हमें इन कष्टों से डरना नहीं चाहिए। राजा हरिश्चंद्र ने हमें यह सिखाया कि सत्य का पालन जीवन के सबसे बड़े उद्देश्य से संबंधित है और इसके लिए किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता। उनकी निष्ठा, कर्तव्य, और सत्य के प्रति उनके समर्पण ने उन्हें एक अमूल्य आदर्श बना दिया।
उनकी यह कहानी आज भी हमें यह सिखाती है कि सत्य से बढ़कर कोई और धर्म नहीं होता। किसी भी हालत में सत्य से मुंह मोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि सत्य की शक्ति सभी समस्याओं का समाधान बन सकती है।
पहेली का उत्तर : मच्छर
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प्रार्थना:
माँ सरस्वती वरदान दो,
मुझको नवल उत्थान दो।
यह विश्व ही परिवार हो,
सब के लिए सम प्यार हो ।
आदर्श, लक्ष्य महान हो । माँ सरस्वती..........
मन, बुद्धि, हृदय पवित्र हो,
मेरा महान चरित्र हो।
विद्या विनय वरदान दो। माँ सरस्वती....
माँ शारदे हँसासिनी,
वागीश वीणा वादिनी।
मुझको अगम स्वर ज्ञान दो।
माँ सरस्वती, वरदान दो।
मुझको नवल उत्थान दो।
उत्थान दो। उत्थान दो...।
मंत्र:
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥१॥
अर्थः हे स्वर्ण के समान दिव्य तेज वाली लक्ष्मी! आप हमारे जीवन में धन और समृद्धि लेकर आएँ।
गर्भ संवाद
"तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा धर्म तुम्हारे कर्मों में निहित है। जब तुम अच्छा काम करते हो, तो तुम न केवल खुद को सम्मानित करते हो, बल्कि दूसरों के जीवन को भी बेहतर बनाते हो। तुम्हारे कर्मों से ही तुम्हारा भविष्य बनता है। मैं चाहती हूं कि तुम अपने कर्मों से इस दुनिया में अच्छाई फैलाओ और हर कदम पर सच्चाई और नेकनीयती का पालन करो।"
पहेली:
एक खेत में ऐसा हुआ,
आधा बगुला आधा सुआ।
कहानी: तेनालीराम की बुद्धिमत्ता
तेनालीराम, एक ऐसे व्यक्ति थे जिनका नाम न केवल दक्षिण भारत में बल्कि पूरे भारत में प्रसिद्ध था। वह राजा कृष्णदेवराय के दरबार के नौ रत्नों में से एक थे। उनकी चतुराई, बुद्धिमत्ता और हास्य के उदाहरण आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं | तेनालीराम का जीवन न केवल हास्य से भरा था, बल्कि उनकी सूझ-बूझ ने कई बार दरबार और राज्य को संकटों से उबारा।
तेनालीराम की बुद्धिमत्ता का एक प्रमुख उदाहरण तब देखने को मिला, जब दरबार में एक दिन एक अजनबी विद्वान आया। उसने दरबार में सबको चुनौती दी कि वह किसी भी समस्या का हल दे सकता है। राजा कृष्णदेवराय, जो कि हमेशा तेनालीराम की बुद्धिमत्ता के कायल थे, ने उसे चुनौती स्वीकार करने का अवसर दिया।
विद्वान ने अपनी चुनौती में कहा, “मैं किसी भी समस्या का हल सिर्फ एक शब्द में दे सकता हूँ। यदि मैं सफल हुआ, तो मैं राज्य का एक बड़ा पुरस्कार प्राप्त करूंगा।” राजा कृष्णदेवराय ने यह सुनकर तेनालीराम से कहा, “तुम तैयार हो ना, तेनालीराम?”
तेनालीराम मुस्कुराए और कहा, “महाराज, यह चुनौती बहुत दिलचस्प है। लेकिन पहले, मुझे यह देखना होगा कि वह विद्वान क्या करता है।”
विद्वान ने दरबार में बैठे सभी को चुनौती दी कि वे अपनी समस्याएं बताएं, और वह एक शब्द में उनका हल देंगे। पहले राजा कृष्णदेवराय ने पूछा, “अगर राज्य में अकाल पड़ जाए, तो क्या करना चाहिए?”
विद्वान ने तुरंत उत्तर दिया, “सिंचाई।”
सभी लोग हैरान रह गए, क्योंकि वह समस्या पूरी तरह से सूखने के कारण पैदा हुई थी। लेकिन विद्वान का जवाब था कि पानी की कमी को पूरा करने के लिए सिंचाई एकमात्र उपाय है। राजा कृष्णदेवराय ने उसकी बुद्धिमत्ता को सराहा, लेकिन अब वह और चुनौतीपूर्ण सवाल पूछना चाहते थे।
राजा ने फिर पूछा, “यदि राज्य में अपराधी बढ़ जाएं और सभी न्यायपालिका विफल हो जाए, तो क्या किया जाए?”
विद्वान ने बिना किसी देरी के उत्तर दिया, “कानून।”
यह उत्तर भी सभी को संतुष्ट करने वाला था, लेकिन राजा कृष्णदेवराय अब तेनालीराम को परीक्षा देना चाहते थे। उन्होंने तेनालीराम से कहा, “तुम भी अपनी बुद्धिमत्ता का एक शब्द में उत्तर दो।”
तेनालीराम ने देखा कि वह विद्वान हर उत्तर में सामान्य और परिचित शब्दों का प्रयोग कर रहा था। इसलिए तेनालीराम ने सोचा, “इस बार मुझे कुछ अलग करना होगा।”
तेनालीराम ने अपनी बारी आने पर उत्तर दिया, “समाज।”
राजा कृष्णदेवराय और दरबारियों ने हैरान होकर तेनालीराम से पूछा, “समाज? इसका क्या मतलब है?”
तेनालीराम ने मुस्कुराते हुए कहा, “राज्य के हर समस्या का समाधान समाज के साथ जुड़ा हुआ है। यदि समाज के लोग आपस में सहयोग और समझदारी से काम करेंगे, तो किसी भी समस्या का हल निकाला जा सकता है। इसलिए, समाज के साथ जुड़ा रहना सबसे महत्वपूर्ण है।”
राजा कृष्णदेवराय और दरबार के लोग तेनालीराम की इस गहरी सोच से चकित रह गए। उन्होंने विद्वान को भी कहा, “तेनालीराम का उत्तर ज्यादा सूझ-बूझ वाला था। वह केवल एक शब्द में सब कुछ कह गए।” तेनालीराम ने यह साबित कर दिया कि सही समय पर सही शब्द और सही दृष्टिकोण से किसी भी समस्या का हल निकाला जा सकता है।
शिक्षा:
तेनालीराम की यह कहानी हमें यह शिक्षा देती है कि किसी भी समस्या का हल केवल उस पर गहराई से विचार करने से ही मिलता है। कभी-कभी सामान्य उत्तर हमारे लिए सही नहीं होते। जब हम किसी समस्या के बारे में सोचते हैं, तो हमें उसके विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए और समाज, सहयोग, और समझदारी जैसे व्यापक दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए। तेनालीराम ने हमें यह सिखाया कि सूझ-बूझ और सही सोच से हम किसी भी समस्या का समाधान पा सकते हैं।
यह कहानी यह भी सिखाती है कि किसी भी चुनौती का उत्तर केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उनके पीछे की सोच और दृष्टिकोण में छुपा होता है। यह हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में हमेशा नई सोच और विचारों की आवश्यकता होती है, जो हमें पुराने और स्थापित विचारों से बाहर सोचने की प्रेरणा देती है।
पहेली का उत्तर : मूली
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प्रार्थना:
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये॥
अर्थ: जिनकी गति, मन के समान तथा वेग वायु के समान है, जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, पवन के पुत्र एवं वानरों की सेना के मुखिया हैं तथा श्री रामचन्द्र के दूत हैं। ऐसे हनुमान जी की मै शरण लेता हूँ और उन्हें प्रणाम करता हूँ।
मंत्र:
शरीरं स्वस्थं च मातरं सर्वशक्तिमयीं
धर्मपुत्रं आदित्यं च सर्वसंपूर्णं जगत्।
व्रजन्ति मङ्गलं संगतं।
अर्थः माता के शरीर का स्वास्थ्य संतान के लिए सम्पूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति और गुणों का प्रतीक है। यह शांति, सुख और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
गर्भ संवाद
"मेरे बच्चे, जीवन में समस्याएं आती हैं, लेकिन यह तुम्हारी समझदारी पर निर्भर करता है कि तुम उन समस्याओं को कैसे हल करते हो। जब तुम शांत और समझदारी से सोचते हो, तो तुम हर समस्या का समाधान निकाल सकते हो। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा धैर्य से काम लो और अपनी बुद्धिमत्ता से हर परिस्थिति का सामना करो। समझदारी से तुम अपने जीवन की दिशा को सही रास्ते पर रख सकोगे।"
पहेली:
ऊपर से गिरा बम,
उसमे हड्डी न दम।
कहानी: कर्ण की उदारता
महाभारत के समय में कर्ण को उनकी उदारता के लिए जाना जाता था। वह अंग देश के राजा थे, लेकिन उनका जन्म और जीवन संघर्ष से भरा हुआ था। कर्ण को बचपन में अपनी पहचान और अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ा, क्योंकि वह सूतपुत्र कहलाए और समाज ने उन्हें अपनाने से इंकार कर दिया। लेकिन इन सबके बावजूद, कर्ण का दिल बड़ा और उदारता से भरा था।
कर्ण के जीवन का हर अध्याय उनकी दयालुता और उदारता की कहानी कहता है। वह किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं जाने देते थे। चाहे वह धन, वस्त्र, भोजन, या कुछ भी हो, कर्ण ने हमेशा अपने पास जो भी था, उसे दूसरों के साथ साझा किया।
एक बार की बात है, जब कर्ण अंगदेश के राजा बन चुके थे। उनके दरबार में एक ब्राह्मण आया और उनसे अपनी गाय के लिए मदद मांगी, जो खो गई थी। कर्ण ने बिना सोचे-समझे अपने निजी खजाने से गायें देकर ब्राह्मण की मदद की। इस घटना ने उनके दरबार में उपस्थित सभी लोगों को उनकी उदारता का एक और प्रमाण दिया।
कर्ण की उदारता का सबसे बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब भगवान इंद्र, अर्जुन के पिता, उनसे कवच और कुंडल मांगने आए।
कर्ण को यह पता था कि कवच और कुंडल उनके जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे, क्योंकि ये उन्हें किसी भी युद्ध में अमरता प्रदान करते थे। लेकिन जब इंद्र एक ब्राह्मण के वेश में उनके पास आए और उनसे ये कवच-कुंडल मांगे, तो कर्ण ने अपनी जान की परवाह किए बिना उन्हें सौंप दिया।
इस घटना ने उनकी सच्ची उदारता को उजागर किया। कर्ण के लिए अपनी प्रतिष्ठा और सिद्धांत किसी भी चीज से अधिक महत्वपूर्ण थे। उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी किया, वह दूसरों की भलाई और सम्मान के लिए किया।
कर्ण की उदारता केवल धन या वस्त्र तक सीमित नहीं थी। वह अपने मित्र, दुर्योधन, के प्रति भी अटूट निष्ठा रखते थे। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, उन्होंने हमेशा दुर्योधन का साथ दिया, भले ही इसके लिए उन्हें समाज और धर्म के विरुद्ध जाना पड़ा।
महाभारत के युद्ध में, जब उनका सामना अर्जुन से हुआ, तो उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगाई, लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया। भगवान कृष्ण ने स्वयं उनकी प्रशंसा की और कहा कि कर्ण जैसा दानवीर योद्धा पूरे महाभारत में दूसरा कोई नहीं है।
शिक्षा
कर्ण की उदारता हमें सिखाती है कि जीवन में सच्चा मूल्य संपत्ति या शक्ति में नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति हमारी दयालुता और उदारता में है। चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें अपने सिद्धांतों और मूल्यों को बनाए रखना चाहिए। उदारता केवल दूसरों को देने का नहीं, बल्कि अपनी आत्मा को समृद्ध करने का माध्यम है।
पहेली का उत्तर : ओला
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प्रार्थना
अंतर्यामी परमात्मा को नमन,
शक्ति हमेशा मिलती रहे आपसे;
ऐसी कृपा कर दो, अज्ञान दूर हो, आतम ज्ञान पाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
सद्बुद्धि प्राप्त हो, व्यवहार आदर्श हो, सेवामय जीवन रहे।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मात-पिता का उपकार ना भूलें, हरदम गुरु के विनय में रहें, दोस्तों से स्पर्धा ना करेंगे, एकाग्र चित्त से पढ़ेंगे हम;
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
आलस्य को टालो, विकारों को दूर कर दो, व्यसनों से हम मुक्त रहें, ऐसे कुसंगों से बचा लो हमें।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मन-वचन और काया से, दुःख किसी को हम ना दें।
चाहे ना कुछ भी किसी का, प्योरिटी ऐसी रखेंगे हम।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
कल्याण के हम सब, निमित्त बने ऐसे,
विश्व में शांति फैलाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
पूर्ण रूप से हम खिलें, मुश्किलों से ना डरें... धर्मों के भेद मिटा दें जग में, ज्ञानदृष्टि को पाकर हम।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
अभेद हो जाएँ, लघुतम में रहकर हम,
प्रेम स्वरूप बन जाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मंत्र:
आयुरारोग्यमवाप्नोति मातरं स्तुत्यं स्वस्थम्।
शान्ति, समृद्धि च सौम्यं च ऐश्वर्यं प्राप्तये।
अर्थः माता की स्तुति से आयु और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। शांति, समृद्धि और ऐश्वर्य भी उसी के द्वारा प्राप्त होते हैं, जो निरंतर मातरूप में जीवन में उपस्थित रहती है।
गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे, जीवन में सबसे पहली चीज जो तुमसे चाहिए, वह है खुद से सच्चा प्यार करना। जब तुम खुद से प्यार करते हो, तो तुम खुद को समझ पाते हो, और अपने जीवन में किसी भी कठिनाई से निपटने की ताकत पाते हो। आत्म-प्रेम का मतलब सिर्फ अपनी भलाई सोचना नहीं है, बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार कर, उन्हें सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाना है। खुद से प्यार करना तुम्हारे आत्म-सम्मान को बढ़ाएगा और तुम्हें जीवन के हर पहलू में सफलता दिलाएगा।”
पहेली:
हरा चोर लाल मकान,
उसमें बैठा काला शैतान,
गर्मी में वह दीखता,
सर्दी में गायब हो जाता।
कहानी: मां का अदम्य साहस
एक छोटे से गांव में राधा नाम की एक महिला रहती थी। राधा विधवा थी और उसकी पूरी दुनिया उसके इकलौते बेटे अर्जुन में सिमटी हुई थी। अर्जुन बहुत होनहार और मेहनती लड़का था। राधा ने अपनी सारी कठिनाइयों को दरकिनार करते हुए उसे पढ़ाने और एक अच्छा इंसान बनाने का सपना देखा था।
राधा दिन-रात खेतों में मेहनत करती। कभी-कभी उसे दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता, लेकिन उसने अपने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। अर्जुन भी अपनी मां की मेहनत देखकर और अधिक मेहनत करता।
एक दिन गांव में एक बड़ा संकट आ गया। पास के पहाड़ों में अचानक भारी बारिश के कारण भूस्खलन हो गया, जिससे नदी का जलस्तर बढ़ने लगा। गांव के लोगों को तेजी से अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भागना पड़ा।
राधा और अर्जुन भी इस आपदा में फंस गए। जब वे नदी पार कर रहे थे, तो तेज बहाव में अर्जुन का पैर फिसल गया, और वह नदी में गिर गया। राधा ने बिना किसी डर के तुरंत नदी में छलांग लगा दी। वह अपने बेटे को बचाने के लिए तेज बहाव के खिलाफ संघर्ष करने लगी।
तेज धाराएं और ठंडा पानी राधा के लिए किसी दुश्मन से कम नहीं थे, लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह बार-बार पानी में डूबती और फिर अपने बेटे को ढूंढने की कोशिश करती। आखिरकार, उसने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया और पूरी ताकत से उसे किनारे की ओर खींचने लगी।
काफी संघर्ष के बाद, राधा अर्जुन को सुरक्षित किनारे पर ले आई। दोनों थके हुए थे, लेकिन जीवित थे। गांव के लोग उनकी बहादुरी देखकर दंग रह गए।
इस घटना ने पूरे गांव को राधा के अदम्य साहस का उदाहरण दिया। अर्जुन ने अपनी मां के इस बलिदान और साहस को जीवन भर याद रखा। उसने ठान लिया कि वह अपनी मां के सपने को पूरा करेगा और एक ऐसा इंसान बनेगा, जिस पर उसकी मां गर्व कर सके।
अर्जुन ने कड़ी मेहनत से पढ़ाई की और एक दिन वह एक सफल डॉक्टर बन गया। उसने अपनी मां के संघर्ष और साहस को अपनी प्रेरणा बनाया और अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की मदद करने में लगा दी।
शिक्षा
मां का साहस और त्याग अपार है। वह अपने बच्चे की सुरक्षा और खुशी के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। एक मां का साहस हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, उन्हें दृढ़ता और धैर्य से पार किया जा सकता है। मां का प्रेम और साहस जीवन का सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत है।
पहेली का उत्तर : तरबूज
========================== 107
प्रार्थना:
तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू।
तुझसे ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू ॥
तेरा महान् तेज है, छाया हुआ सभी स्थान।
सृष्टि की वस्तु-वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान ॥
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया।
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला ॥
मंत्र का अर्थ: सदैव माता और पिता का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि वही हमें शरण और यश प्रदान करते हैं। उनके द्वारा दीये गये आशीर्वाद से जीवन में सुख और समृद्धि बनी रहती है।
गर्भ संवाद
“हमेशा दूसरों का सम्मान करो, क्योंकि उनका सम्मान करना ही तुम्हारे खुद के सम्मान को बढ़ाता है। यह एक बहुत बड़ा जीवन-मंत्र है कि जैसा तुम दूसरों से उम्मीद करते हो, वैसा ही तुम्हें उनसे बर्ताव करना चाहिए। किसी का दिल दुखाने से तुम्हें जो शांति मिलती है, वह थोड़ी देर के लिए होती है, लेकिन सम्मान देने से तुम्हारा दिल हमेशा संतुष्ट रहता है। जब तुम दूसरों के साथ सम्मान और विनम्रता से पेश आते हो, तो तुम्हारा आत्मविश्वास भी बढ़ता है।”
पहेली:
लाल-टेन पंखो में,
उड़े अंधेरी रात में,
जलती बाती बिना तेल के,
जाड़े व बरसात में।
कहानी: आत्मिक शुद्धि
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में एक साधक नामक व्यक्ति रहता था। साधक का जीवन सादा था और वह केवल आत्मा की शुद्धि के लिए कार्य करता था। वह जंगल में तपस्या करता और भगवान के ध्यान में लीन रहता था। उसकी एकमात्र इच्छा थी कि वह अपनी आत्मा को शुद्ध कर सके और परमात्मा से मिलन प्राप्त कर सके।
गाँव में एक दिन एक व्यापारी आया, जो अपने व्यापार से बहुत दौलतमंद था। उसने साधक के बारे में सुना और उसे जानने के लिए गाँव के बाहर उस तक पहुँचा। व्यापारी ने साधक से कहा “तुम यहाँ अकेले क्यों बैठे हो? तुम इतनी मेहनत करते हो, लेकिन तुम्हारी स्थिति क्या है? मैं तो धन्य और समृद्ध हूँ, तुम्हारे जैसे साधक को इतना कष्ट क्यों उठाना पड़ता है?”
साधक मुस्कराए और बोले, “धन का संग्रह व्यक्ति को बाहरी सुख दे सकता है, लेकिन आत्मा की शुद्धि और परमात्मा का मिलन वह सुख है, जो धन से नहीं खरीदा जा सकता। मैं जो खोज रहा हूँ, वह धन से कहीं अधिक मूल्यवान है।”
व्यापारी ने फिर पूछा, “लेकिन तुम क्यों ध्यान करते हो? क्या तुमने कभी इस प्रश्न पर विचार किया है कि जीवन का उद्देश्य क्या है?”
साधक ने कहा, “जीवन का उद्देश्य आत्मा की शुद्धि है। जब आत्मा शुद्ध हो जाती है, तो वह परमात्मा से एकाकार हो जाती है। यह शुद्धि किसी बाहरी वस्तु या किसी अन्य व्यक्ति से नहीं आती, बल्कि यह हमारे भीतर की मूरत से प्राप्त होती है। मैं आत्मा को शुद्ध करने के लिए साधना करता हूँ, ताकि मैं अपने अंदर के अहंकार और इच्छाओं को खत्म कर सकूँ।”
साधक की बातें सुनकर व्यापारी बहुत प्रभावित हुआ। उसने सोचा, “अगर यह साधक इस साधना को इतना महत्व देता है, तो जरूर इसमें कुछ गहरी बात होगी।” व्यापारी ने सोचा कि वह भी अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए कुछ कदम उठाएगा।
शिक्षा:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि बाहरी दुनिया की चीजों से हम केवल अस्थायी सुख प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन आत्मा की शुद्धि और परमात्मा का मिलन सच्चे सुख का कारण बनता है। हमें अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए ध्यान और साधना करनी चाहिए, क्योंकि यही जीवन का सच्चा उद्देश्य है।
पहेली का उत्तर : जुगनू
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प्रार्थना
अंतर्यामी परमात्मा को नमन,
शक्ति हमेशा मिलती रहे आपसे;
ऐसी कृपा कर दो, अज्ञान दूर हो, आतम ज्ञान पाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
सद्बुद्धि प्राप्त हो, व्यवहार आदर्श हो, सेवामय जीवन रहे।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मात-पिता का उपकार ना भूलें, हरदम गुरु के विनय में रहें, दोस्तों से स्पर्धा ना करेंगे, एकाग्र चित्त से पढ़ेंगे हम;
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
आलस्य को टालो, विकारों को दूर कर दो, व्यसनों से हम मुक्त रहें, ऐसे कुसंगों से बचा लो हमें।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मन-वचन और काया से, दुःख किसी को हम ना दें।
चाहे ना कुछ भी किसी का, प्योरिटी ऐसी रखेंगे हम।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
कल्याण के हम सब, निमित्त बने ऐसे,
विश्व में शांति फैलाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
पूर्ण रूप से हम खिलें, मुश्किलों से ना डरें... धर्मों के भेद मिटा दें जग में, ज्ञानदृष्टि को पाकर हम।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
अभेद हो जाएँ, लघुतम में रहकर हम,
प्रेम स्वरूप बन जाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मंत्र:
न सि समर्पणं यत्र मातरं समृद्धिशीलां।
शांति दर्शनं सुखदं जीवनस्य हरं शान्ति।
अर्थः जहाँ माता का आशीर्वाद होता है, वहाँ जीवन शांति से परिपूर्ण होता है। उसकी कृपा से जीवन में समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है।
गर्भ संवाद
— मेरे प्यारे शिशु, मेरे राज दुलार, मैं तुम्हारी माँ हूँ.......माँ !
— मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, तुम मेरे गर्भ में पूर्ण रूप से सुरक्षित हो, तुम हर क्षण पूर्ण रूप से विकसित हो रहे हो।
— तुम मेरे हर भाव को समझ सकते हो क्योंकि तुम पूर्ण आत्मा हो।
— तुम परमात्मा की तरफ से मेरे लिए एक सुन्दरतम तोहफा हो, तुम शुभ संस्कारी आत्मा हो, तुम्हारे रूप में मुझे परमात्मा की दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, परमात्मा ने तुम्हें सभी विलक्षण गुणों से परिपूर्ण करके ही भेजा है, परमात्मा की दिव्य संतान के रूप में तुम दिव्य कार्य करने के लिए ही आए हो। मेरे बच्चे! तुम
ईश्वर का परम प्रकाश रूप हो, परमात्मा की अनंत शक्ति तुम्हारे अंदर विद्यमान है, ईश्वर का तेज तुम्हारे माथे पर चमक रहा है, परमात्मा के प्रेम की चमक तुम्हारी आँखों में दिखाई देती है, तुम ईश्वर के प्रेम का साक्षात भण्डार हो, तुम परमात्मा के एक महान उद्देश्य को लेकर इस संसार में आ रहे हो, परमात्मा ने तुम्हें इंसान रूप में इंसानियत के सभी गुणों से भरपूर किया है।
— तुम हर इंसान को परमात्मा का रूप समझते हो, और सभी के साथ प्रेम का व्यवहार करते हो, तुम जानते हो अपने जीवन के महानतम लक्ष्य को, तुम्हें इस संसार की सेवा करनी है, सभी से प्रेम करना है, सभी की सहायता करनी है, और परमात्मा ने जो विशेष लक्ष्य तुम्हें दिया है, वह तुम्हें अच्छे से याद रहेगा।
— परमात्मा की भक्ति में तुम्हारा मन बहुत लगता है, तुम प्रभु के गुणों का गायन करके बहुत खुश होते हो, तुम्हारे रोम-रोम में प्रभु का प्रेम बसा हुआ है। स्त्रियों के प्रति तुम विशेष रूप से आदर का भाव अनुभव करते हो, सभी स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखते हो।
— तुम्हारा उद्देश्य संसार में सबको खुशियाँ बाँटना है, सब तरह से आजाद रहते हुए तुम सबको कल्याण का मार्ग दिखाने आ रहे हो, परमात्मा से प्राप्त जीवन से तुम पूर्ण रूप से संतुष्ट हो, तुम सदैव परमात्मा के साये में सुरक्षित हो।
— मानव जीवन के संघर्षो को जीतना तम्हें खूब अच्छी तरह से आता है, जीवन के प्रत्येक कार्य को करने का तुम्हारा तरीका बहुत प्यारा है, जीवन की हर परेशानी का हल ढूँढने में तुम सक्षम हो, तुम हमेशा अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहोगे।
— मेरी तरह तुम्हारे पिता भी तुम्हें देखने के लिए आतुर हैं, मेरा और तुम्हारे पिता का आशीष सदैव तुम्हारे साथ है।
— यह पृथ्वी हमेशा से प्रेम करने वाले अच्छे लोगों से भरी हुई है, यह सृष्टि परमात्मा की अनंत सुंदरता से भरी हुई है, यहाँ के सभी सुख तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, गर्भावस्था का यह सफर तुम्हें परमात्मा के सभी दैविक संस्कारों से परिपूर्ण कर देगा।
—घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।
पहेली:
हरी-हरी मछली के हरे-हरे अण्डे,
जल्दी दे बूझिए वरना पड़ेंगे डण्डे ।
कहानी: ईश्वर से साक्षात्कार
एक छोटे से गाँव में एक युवा लड़का, नाम था मोहन जो अपने जीवन में सच्चे उद्देश्य की तलाश में था। उसे जीवन में कुछ ऐसा चाहिए था, जो उसे शांति और संतोष दे सके। मोहन ने सुना था कि ईश्वर से साक्षात्कार केवल तब संभव होता है जब व्यक्ति अपने दिल और मन को शुद्ध करता है। यही सोचकर उसने यह तय किया कि वह भगवान के दर्शन प्राप्त करने के लिए अपना जीवन समर्पित करेगा।
मोहन ने पहले अपनी दिनचर्या को बदलना शुरू किया। उसने अपने खाने-पीने की आदतें सुधारी, अधिक से अधिक समय ध्यान में बिताया और परमात्मा के नाम का जाप किया। लेकिन बहुत समय बीतने के बाद भी उसे यह महसूस हुआ कि वह अभी भी ईश्वर से साक्षात्कार नहीं कर पा रहा। यह देखकर वह दुखी हुआ और एक दिन गाँव के मंदिर में अपने गुरु के पास गया और कहा, “गुरुजी, मैंने बहुत साधना की है, लेकिन फिर भी मैं ईश्वर से साक्षात्कार नहीं कर पा रहा। क्या मैंने कोई गलती की है?”
गुरु मुस्कराए और बोले, “मोहन, तुम्हारी साधना सही है, लेकिन सच्चे साक्षात्कार के लिए तुम्हे अपनी सोच और दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा। ईश्वर हमेशा हमारे पास होते हैं, लेकिन हम उन्हें तभी देख सकते हैं जब हम अपने दिल की आँखों से देखना सीख लें।”
गुरु ने मोहन को एक सरल अभ्यास दिया: “तुम हर दिन अपनी आँखें बंद करके अपनी सोच और इच्छाओं को शांत करो। जब तुम्हारा मन शांत होगा, तब तुम्हें महसूस होगा कि ईश्वर तुम्हारे भीतर हैं।”
मोहन ने गुरु के वचनों को मानते हुए अभ्यास करना शुरू किया। कुछ दिनों बाद, उसने महसूस किया कि उसके भीतर एक शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पन्न हो रही थी। उसका मन अब शांति से भरा हुआ था और उसे आभास हुआ कि ईश्वर उसके भीतर ही हैं। वह यह जान चुका था कि साक्षात्कार कभी बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से आता है।
शिक्षा:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि ईश्वर से साक्षात्कार बाहरी रूप से नहीं, बल्कि हमारे भीतर की शांति और ध्यान से होता है। जब हम अपने मन और दिल को शुद्ध करते हैं, तब हम महसूस करते हैं कि ईश्वर हमारे भीतर ही हैं। हमें अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाकर आत्मिक शांति प्राप्त करनी चाहिए।
पहेली का उत्तर : मटर की फली
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