Rooh se Rooh tak - 8 in Hindi Love Stories by IMoni books and stories PDF | रूह से रूह तक - चैप्टर 8

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रूह से रूह तक - चैप्टर 8

रात गहराती जा रही थी, लेकिन दादी और बाकी परिवार के लोगों ने अस्पताल में ही रुकने का फैसला किया। उन्होंने पहले ही वीआईपी वार्ड ले लिया था, जहाँ अटेंडेंट के लिए सोफा और बेड की व्यवस्था थी। माहौल पूरी तरह शांत था, बस बीच-बीच में मॉनिटर की बीप-बीप की आवाज़ गूंज रही थी।

दादी कुर्सी पर बैठी थीं, लेकिन उनकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। उनके ज़ेहन में बार-बार वही चेहरा उभर रहा था—सुबह वाली लड़की का।

"क्या सच में वह अर्निका त्रिपाठी थी?" उन्होंने खुद से सवाल किया।

थोड़ी देर बाद, उनकी बहू ने धीरे से कहा, "माँ, आपको थोड़ा आराम कर लेना चाहिए। हम यहाँ हैं, अगर कुछ ज़रूरत होगी तो आपको जगा देंगे।"

दादी ने सिर हिलाया, लेकिन उनकी आँखें अब भी अपने पोते के चेहरे पर टिकी थीं।

रात बीत गई।

सुबह की पहली किरण वॉर्ड की खिड़की से अंदर आई, और उसी समय बेड पर लेटा लड़का हल्का सा करवट लेते हुए धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलने लगा। उसने देखा कि उसके घरवाले वहीं कमरे में बैठे-बैठे सो रहे थे।

"दादी माँ..." उसने धीमी आवाज़ में कहा।

दादी तुरंत सतर्क हो गईं। "बेटा! तू ठीक है?"

लड़के ने अपनी माँ और दादी को देखा। उनके चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी।

"मैं ठीक हूँ, बस थोड़ा भारीपन महसूस हो रहा है..." उसने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया।

"अब सब ठीक हो जाएगा," दादी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

कुछ देर बाद, डॉक्टर अंदर आए और उसकी जाँच की। "अब यह खतरे से बाहर हैं। लेकिन इन्हें अभी पूरी तरह आराम की ज़रूरत है," डॉक्टर ने कहा।

"धन्यवाद, डॉक्टर साहब," दादी ने राहत की सांस लेते हुए कहा।

डॉक्टर जाते-जाते बोले, "थोड़ी देर में मैम इन्हें देखने आएँगी।" और फिर वह बाहर चले गए।

जैसे ही डॉक्टर बाहर गए, लड़के ने अचानक पूछा, "छोटू, वो तीनों लड़कियाँ कहाँ हैं?"

यह सुनते ही छोटू और बाकी घरवाले हैरान रह गए। दादी ने हैरानी से पूछा, "बेटा, तुम्हें उन लड़कियों की इतनी चिंता क्यों है?"

लड़के के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। "क्योंकि अगर वो न होतीं, तो शायद मैं आज यहाँ नहीं होता।"


दादी ने गहरी सांस ली और हल्की मुस्कान के साथ उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा। "बेटा, शायद भगवान ने किसी वजह से तुम्हें उनसे मिलवाया है..."

अब जानते हैं इन लोगों की कहानी

जिस लड़के को अभी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, वही हमारी कहानी का हीरो है—क्रेयांश सिंह राठौर (26 वर्ष)। आने वाले समय में वह अर्निका के लिए अपनी जान तक दांव पर लगाने वाला है।

क्रेयांश राठौर—भारत का सबसे सफल बिजनेसमैन, जिसे लोग "बिजनेस का किंग" कहते हैं। उसने बहुत कम उम्र में अपने करियर की शुरुआत की और आज सफलता की बुलंदियों पर खड़ा है। वह रॉयल राठौर फैमिली का मझला बेटा है और देखने में किसी राजकुमार से कम नहीं। उसकी परफेक्ट जॉलाइन, शार्प फीचर्स और दमदार पर्सनालिटी हर लड़की का दिल जीत सकती है। लेकिन असल में, बहुत कम लोग ही उसे करीब से जान पाए हैं।

क्रेयांश की दुनिया में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। उसके लिए बिजनेस, पॉवर और सफलता ही सबसे ऊपर है। लेकिन उसकी यह बेरंग ज़िंदगी तब बदलने वाली है, जब अर्निका त्रिपाठी उसकी दुनिया में कदम रखेगी…




राठौर परिवार के सदस्य

महेंद्र सिंह राठौर (76) – राठौर परिवार के गौरव

राठौर परिवार की रीढ़, एक ऐसा नाम जिसे पूरे बिजनेस और राजघराने की दुनिया में सम्मान से लिया जाता है। उनका कद ऊँचा, व्यक्तित्व राजसी और आँखों में बरसों का अनुभव झलकता था। अनुशासन, परंपरा और शौर्य के प्रतीक, महेंद्र सिंह राठौर ने राठौर ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज़ की नींव रखी और इसे भारत के सबसे बड़े बिजनेस एम्पायर्स में शामिल किया।
परिवार उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण था। सख्त ज़रूर थे, लेकिन उनके हर फैसले में अपनों की भलाई छिपी होती थी। वे क्रेयांश को अपना उत्तराधिकारी मानते थे और चाहते थे कि वह सिर्फ बिजनेस ही नहीं, बल्कि परिवार की विरासत भी संभाले। इसी वजह से उन्होंने बचपन से ही क्रेयांश की ट्रेनिंग शुरू कर दी थी।

वसुंधरा राठौर (72) – राठौर परिवार की शान और स्तंभ

महेंद्र सिंह राठौर की पत्नी, राठौर परिवार की असली ताकत। उनके नाम की तरह, वे धैर्य, शक्ति और ममता की प्रतिमूर्ति थीं। वे केवल इस परिवार की बहू नहीं, बल्कि उसकी नींव थीं, जिसने रिश्तों को मजबूती से जोड़े रखा। उनकी शांत, लेकिन दृढ़ शख्सियत ऐसी थी कि एक नज़र में ही लोग उनकी गरिमा को समझ जाते। जितनी सख्त, उतनी ही ममतामयी।
उनका मानना था कि परिवार की असली ताकत रिश्तों की डोर में छिपी होती है। उनके तीनों बेटे अपने पिता की तरह व्यापारिक दुनिया में सफल थे, लेकिन माँ के दिए हुए संस्कार भी उनमें गहरे बसे थे।


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राठौर परिवार की अगली पीढ़ी

1. अमरेश सिंह राठौर (55) – सबसे बड़े बेटे

बेहद जिम्मेदार और शांत स्वभाव के।

पारिवारिक बिजनेस को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

अपने पिता की छवि को बरकरार रखते हुए बिजनेस में अनुशासन और परंपराओं का पालन किया।


2. उदय प्रताप सिंह राठौर (52) – दूसरे बेटे

बिजनेस के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में रुचि रखते हैं।

परिवार की छवि को बनाए रखने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।

अपने काम के प्रति समर्पित और लोगों की मदद करने में विश्वास रखते हैं।


3. विक्रांत सिंह राठौर (49) – तीसरे बेटे

धैर्य, रणनीतिक सोच और साहसी व्यक्तित्व के लिए पहचाने जाते हैं।

बिजनेस के साथ-साथ एक जाने-माने डायरेक्टर भी हैं।

स्वभाव से मज़ाकिया, लेकिन परिवार और खासतौर पर घर के बच्चों से गहरा लगाव रखते हैं।


4. सुवर्णा राठौर (46) – इकलौती बेटी

शाही परंपराओं में पली-बढ़ी, लेकिन आत्मनिर्भरता और दृढ़ निश्चय की प्रतीक हैं।

अपनी सोच और नेतृत्व क्षमता के कारण परिवार की सबसे सशक्त सदस्य मानी जाती हैं।



राठौर परिवार की बहुएं और उनकी संतानें

राजलक्ष्मी राठौर (52) – राठौर परिवार की गरिमा

अमरेश सिंह राठौर की पत्नी और राठौर परिवार की बड़ी बहू, जो शालीनता, धैर्य और बुद्धिमत्ता की मिसाल हैं। वे न केवल पारिवारिक परंपराओं को संजोए रखती हैं, बल्कि बिजनेस में भी अमरेश का सहयोग करती हैं। उनकी गरिमा और निर्णय क्षमता के कारण पूरे परिवार में उनका सम्मान किया जाता है।

संतान:

1. अद्वैत सिंह राठौर (28) – बचपन से ही बिजनेस में रुचि नहीं थी, बल्कि वह एक जाने-माने आर्टिस्ट हैं। हालांकि, अपने भाइयों से गहरा लगाव रखते हैं।


2. आरिशा राठौर (24) – एक प्रसिद्ध ज्वेलरी डिजाइनर, जिसने अपनी कड़ी मेहनत से अपनी पहचान बनाई है।




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रिद्धिमा राठौर (47) – धैर्य और समर्पण की प्रतीक

उदय प्रताप सिंह राठौर की पत्नी, जो शालीनता, बुद्धिमानी और सहनशीलता की मिसाल हैं। वे सिर्फ परिवार की परंपराओं को नहीं निभातीं, बल्कि सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहती हैं। वे एक सफल सोशल वर्कर हैं और खुद की फूड कंपनी चलाती हैं, जहां कई महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है।

संतान:

क्रेयांश सिंह राठौर (26) – हमारी कहानी के नायक, जिनकी किस्मत अर्निका से जुड़ने वाली है। वे अपने परिवार और खासकर अपनी मां रिद्धिमा से बेहद जुड़े हुए हैं।
रिद्धिमा न केवल अपने बेटे को, बल्कि घर के सभी बच्चों को बराबर प्यार और मार्गदर्शन देती हैं।



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दिव्या राठौर (45) – शालीनता और सशक्तता की मिसाल

विक्रांत सिंह राठौर की पत्नी, जो बुद्धिमान, धैर्यवान और सशक्त महिला हैं। वे परिवार की रीढ़ हैं, लेकिन उनकी चुलबुली और मज़ाकिया प्रकृति उन्हें सबसे अलग बनाती है। उनकी हंसी और चुटकुले घर के माहौल को हल्का रखते हैं, लेकिन वे उतनी ही मुंहफट भी हैं—जो दिल में होता है, वही बेझिझक बोल देती हैं।
घर के सभी बच्चों के लिए वे सिर्फ एक मां नहीं, बल्कि एक दोस्त और मार्गदर्शक भी हैं।

संतान:

1. वामिका राठौर (22) – MBA की पढ़ाई कर रही हैं, क्योंकि उन्हें बिजनेस में रुचि है।


2. दर्शित सिंह राठौर (19) – मस्तीखोर और बिंदास, लेकिन साथ ही डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर रहे हैं।


3. अधिरा राठौर (15) – चुलबुली, स्मार्ट और सभी भाइयों की जान। वह 10वीं कक्षा की छात्रा है।



वीरेंद्र सक्सेना (48) – अनुशासन और सफलता की मिसाल

वीरेंद्र सक्सेना, सुवर्णा राठौर सक्सेना के पति और सक्सेना इंडस्ट्रीज के चेयरमैन, एक अनुशासनप्रिय, न्यायसंगत और दृढ़निश्चयी व्यक्ति हैं। वे अपने ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ स्वभाव के लिए पहचाने जाते हैं। व्यवसाय और समाज में उनकी एक अलग पहचान है, लेकिन उनके लिए सबसे पहले परिवार और मूल्यों की गरिमा है। वे सख्त होने के बावजूद अपने प्रियजनों के लिए बेहद जिम्मेदार और संवेदनशील हैं।

संतान:

1. दिव्यान्श सक्सेना (24) – जिम्मेदार और बिजनेस में रुचि रखने वाला।


2. ऋदान सक्सेना (19) – जिज्ञासु और आत्मविश्वासी, जो नई चीजें सीखने में रुचि रखता है। वह अपने चचेरे भाई दर्शित के साथ डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर रहा है। दोनों भाई होने के साथ-साथ अच्छे दोस्त भी हैं।




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अब कहानी की ओर चलते हैं…

राठौर परिवार में क्रेयांश को सब ‘प्रिंस’ कहकर पुकारते हैं। इसलिए अब हम भी उसे प्रिंस ही कहेंगे।

प्रिंस ने दादी की बात सुनी और तुरंत अपने छोटे भाई दर्शित की ओर देखा।
"छोटू, क्या तुमने कुशल को कॉल करके बुलाया?"

दर्शित ने तुरंत जवाब दिया, "हाँ भाई, मैंने उसे पहले ही कॉल कर दिया था।"

"वो क्या कह रहा है?"

"कुशल भाई इस समय इन्वेस्टिगेशन कर रहे हैं। वो पता लगा रहे हैं कि हम पर हमला किसने करवाया और किस गैंग को हमें मारने के लिए पैसे दिए गए। वो जल्द ही यहाँ पहुँचने वाले हैं।"

प्रिंस ने गहरी सांस ली और अपने घावों की परवाह किए बिना बैठने की कोशिश की। उसकी आँखों में अब दर्द की जगह गुस्सा और जिज्ञासा थी।



तभी कमरे का दरवाजा खुला, और एक लंबा, मजबूत कद-काठी वाला शख्स अंदर आया। उसकी पैनी निगाहें पूरे कमरे में घूमीं, फिर वह सीधा प्रिंस के पास पहुंचा।

"भाई!" उसकी आवाज़ गूंज उठी।

दर्शित तुरंत खड़ा हो गया, "कुशल भाई, क्या पता चला?"

कुशल ठाकुर (26) – प्रिंस का सबसे खास दोस्त, उसका पर्सनल असिस्टेंट और राठौर परिवार के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति का बेटा ।

कुशल ने पास की कुर्सी खींचकर बैठते हुए पूछा, "तू ठीक तो है ना?"

प्रिंस ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, "मैं ठीक हूं।" फिर वह दादी और बाकी परिवार की तरफ मुड़ा, "दादी, आप लोग होटल जाइए, फ्रेश होकर कुछ खा लीजिए। आप लोग रात से यहीं हैं।"

उसकी मां कुछ कहने ही वाली थीं कि प्रिंस ने अपनी रौबदार आवाज़ में कहा, "जो कहा है, वो करिए।"

फिर वह दर्शित की तरफ देखता हुआ बोला, "छोटू, गार्ड्स के साथ इन्हें होटल तक पहुंचा दो।"

दर्शित ने तुरंत सिर हिलाया और दादी की तरफ इशारा किया कि वे अभी चले जाएं। दादी समझ गईं कि प्रिंस उनके सामने कुछ नहीं कहना चाहता, इसलिए बिना कोई सवाल किए वे बाकी परिवार के साथ होटल के लिए निकल गईं।

जैसे ही वे गए, प्रिंस ने कुशल की तरफ देखा और कहा, "अब बोलो।"

कुशल ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "यह हमला कोई साधारण घटना नहीं थी, भाई... यह एक सोची-समझी साजिश थी। किसी ने इसे पहले से ही प्लान किया था।"

प्रिंस की आँखें सिकुड़ गईं, उसकी उंगलियां टेबल पर एक लय में चलने लगीं। "कौन था?"

कुशल थोड़ा रुका, फिर गंभीर लहजे में बोला, "दो नाम सामने आए हैं—राणा दुबे और शौर्य सिंह।"



दर्शित चौंककर बोला, "भाई, ये तो वही दो पार्टी हैं जो कल हमारे साथ थीं, जिन्हें प्रोजेक्ट नहीं मिला था, है ना?"

प्रिंस ने गहरी नजरों से उसे देखा, "मुझे शक तो पहले से था, लेकिन ये लोग इतनी जल्दी हमला करेंगे, ये नहीं सोचा था।"

कुशल गंभीर स्वर में बोला, "ये दोनों पहले से ही साजिश रच रहे थे। कल सुबह मंदिर में जो दादी और बाकी लोगों के साथ हुआ, वो भी इन दोनों की ही चाल थी, ताकि तुम मीटिंग तक न पहुंच सको।"

फिर वह थोड़ा रुका और मुस्कुराकर बोला, "भला हो उन लड़कियों का, जिन्होंने सही वक्त पर दादी और बाकियों की मदद कर दी, वरना हालात और बिगड़ सकते थे।"

दर्शित ने चिंतित स्वर में पूछा, "अब क्या करें, भाई?"

कुशल ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, "हमारे पास दो रास्ते हैं—या तो सीधे उन पर वार करें, या पहले पक्के सबूत इकट्ठा करके सही वक्त पर उन्हें गिराएं।"

प्रिंस ने उंगलियां आपस में जोड़ीं और सोच में डूब गया।

तभी दर्शित फिर बोल पड़ा, "भाई, ये तय है कि अगर उन्होंने एक बार हमला किया है, तो दोबारा भी करेंगे। हमें जल्द से जल्द कोई कदम उठाना होगा।"

प्रिंस हल्का मुस्कुराया, "बिल्कुल करेंगे, और इस बार... हम पूरी तैयारी के साथ।"

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर प्रिंस ने कुशल की तरफ देखते हुए आदेश दिया, "फिलहाल, सबूत जुटाओ और एक और जरूरी काम करो—अर्निका त्रिपाठी की पूरी जानकारी चाहिए। छोटी से छोटी बात भी छूटनी नहीं चाहिए।"

यह सुनकर कुशल और दर्शित एक-दूसरे की ओर देखने लगे। कुशल को हल्का झटका लगा, क्योंकि यह पहली बार था जब क्रेयांश ने किसी लड़की की जानकारी निकलवाने को कहा था।


दर्शित की आँखें हैरानी से फैल गईं।
"भाई, ये क्या हो रहा है? तुमने तो कभी किसी लड़की की डिटेल्स निकलवाने में दिलचस्पी नहीं ली, और आज... ऐसा क्या हो गया?" 

कुशल भी हल्का मुस्कुराया, "प्रिंस, तुम तो कभी किसी की परवाह नहीं करते थे। फिर ये अर्निका त्रिपाठी कौन है, जो पहली बार तुम्हारे दिमाग में जगह बना रही है?"

प्रिंस ने कुशल पर गहरी नजर डाली और ठंडी आवाज़ में कहा,
"ये सवाल पूछने का वक्त नहीं है, कुशल। मुझे बस अर्निका त्रिपाठी के बारे में सब कुछ चाहिए—उसका अतीत, परिवार, कहाँ रहती है, क्या करती है, और सबसे जरूरी बात... उस रात वो वहाँ कैसे पहुंची?"

कुशल ने सिर हिलाया, "ठीक है, 24 घंटे दो, मैं पूरी जानकारी निकाल लूंगा।"

प्रिंस ने बिना कोई भाव बदले कहा, "मुझे 12 घंटे में रिपोर्ट चाहिए।"

फिर वह दर्शित की तरफ मुड़ा, "और तुम, छोटू, तुम्हें ये जानने की जरूरत नहीं कि मैं क्या कर रहा हूँ। बस जाकर आराम करो।"

दर्शित ने मुंह फुलाते हुए कहा, "भाई, देखना... एक दिन जब आपकी गर्लफ्रेंड आएगी या आप जिससे शादी करोगे, तब मैं उनसे आपकी शिकायत करूंगी । लेकिन लगता है, मेरी ये ख्वाहिश पूरी नहीं होगी, क्योंकि आप जैसे सख्त इंसान को लड़की मिलना ही मुश्किल है!"

उसकी बात सुन कुशल को हंसी आ गई, लेकिन जैसे ही उसने प्रिंस की लाल आंखें देखीं, वो सीधा जाकर बेड पर लेट गया। "मुझे कमजोरी महसूस हो रही है, इसलिए थोड़ा आराम कर रहा हूँ," कहते हुए उसने नाटक किया।

प्रिंस ने हल्का सिर हिलाया और फिर कुशल की तरफ देखा, "तुम डॉक्टर से बात करो और यहाँ से निकलने की तैयारी करो।"

कुशल ने "ठीक है" कहा और वहाँ से चला गया।

जैसे ही कुशल बाहर निकला, प्रिंस अपनी बेड पर लेट गया। आँखें बंद कीं, तो सामने वही चेहरा उभर आया—अर्निका त्रिपाठी।

वो लड़की, जो बिना किसी डर के गुंडों से लड़ रही थी।

प्रिंस ने एक झटके में आँखें खोल दीं। "दिलचस्पी?"
वो खुद से बड़बड़ाया।

"ये शब्द मेरी दुनिया में मायने नहीं रखते। न ही किसी को अपनी ज़िंदगी में घुसने देना है।"

लेकिन फिर भी... उस लड़की में कुछ अलग था।

वो सिर्फ़ एक आम लड़की नहीं थी। उसकी आँखों में न डर था, न बनावटी नज़ाकत।
जिस तरह उसने उन गुंडों का सामना किया था, वो किसी भी आम लड़की से अलग था... बिल्कुल अलग।


"अर्निका त्रिपाठी…" प्रिंस ने हल्के से बुदबुदाया।

तभी उसके कानों में एक चंचल आवाज़ पड़ी, "भाई, लेकिन वो लड़की... मतलब अर्निका, सच में बहुत सुंदर है। उसे नैचुरल ब्यूटी भी कहा जा सकता है!"

प्रिंस ने घूरते हुए कहा, "चुपचाप सो जा, नहीं तो—"

छोटू ने तुरंत हाथ उठा लिया, "अरे भाई, गुस्सा क्यों कर रहे हो? मजाक ही तो किया था!"


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दूसरी तरफ, त्रिपाठी सदन में…

अर्निका, सान्या और ईनाया अभी भी सो रही थीं। नाश्ते की टेबल पर उनकी गैरमौजूदगी देखकर दादाजी ने सवाल किया, "अभी तक तीनों राजकुमारियाँ उठी नहीं?"

दादी हल्का मुस्कुराईं, "उठेंगी कैसे? कल रात घर लौटने में ही देरी हो गई थी।"

दादाजी ने चाय का घूंट लेते हुए कहा, "हम्म... लेकिन उन्हें देर तक सोने की आदत नहीं डालनी चाहिए। अनुशासन ज़रूरी है।"

तभी नौकरानी आकर बोली, "बिटिया रानी जाग गई हैं, बस फ्रेश होकर आ रही हैं।"

कुछ ही देर बाद, अर्निका, सान्या और ईनाया नाश्ते की टेबल पर आईं।

"गुड मॉर्निंग, दादाजी!" तीनों ने एक साथ कहा।

दादाजी हल्का मुस्कुराए, "गुड मॉर्निंग, राजकुमारियों। आओ, बैठो और नाश्ता करो।"

तीनों ने "ठीक है" कहते हुए अपनी कुर्सियाँ खींची और सभी को गुड मॉर्निंग विश कर नाश्ता करने लगीं।

अर्निका की नज़र अपनी माँ पर पड़ी। उसके मन में कल हॉस्पिटल में हुई घटना को लेकर कई सवाल थे, लेकिन सबके सामने कुछ भी पूछना ठीक नहीं था। नहीं तो पूरे घर को पता चल जाता।

इसलिए उसने चुपचाप नाश्ता करना ही बेहतर समझा।



सभी ने नाश्ता खत्म करने के बाद हॉल रूम में आकर बैठ गए। तभी दिलीप जी ने तीनों की तरफ देखा और पूछा,

"तो, सबकी पैकिंग हो गई?"

सान्या ने उत्साह से सिर हिलाया, "हाँ पापा, सब तैयार है। बस कुछ छोटी-मोटी चीज़ें रह गई हैं, वो भी अभी पैक कर लेंगे।"

ईनाया ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने तो कल ही सब कुछ तैयार कर लिया था, अब बस निकलने का इंतजार है!"

लेकिन अर्निका चुप रही। दिलीप जी ने उसकी ओर देखा, "और तुम, बेटा? तुम्हारी तैयारी हो गई?"

अर्निका हल्का सा मुस्कुराई, "जी बड़े पापा, सब तैयार है।"

दादी ने प्यार से अर्निका के सिर पर हाथ फेरा, "बिल्कुल, लेकिन वहाँ जाकर अपना ध्यान रखना, बेटा।"

दादाजी ने भी सहमति में सिर हिलाया, "और हाँ, पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना। मस्ती के साथ-साथ ज़िम्मेदारी भी ज़रूरी है।"

तीनों ने हाँ में सिर हिला दिया। तभी अनिरुद्ध बोले,

"तुम दोनों ने मुंबई वाली विला में रहने से मना कर दिया, इसलिए हमने तुम्हारी कॉलेज के पास एक पॉश इलाके में अपार्टमेंट ले लिया है। वहाँ एक मेड भी होगी, तो तुम्हें किसी चीज़ की दिक्कत नहीं होगी। अद्विक तुम दोनों को वहाँ छोड़ने जा रहा है।"

फूफा जी ने आगे कहा, "और हाँ, मैंने तुम्हारे लिए दो कारें भी ऑर्डर कर दी हैं, कल तक डिलीवर हो जाएंगी।"

अर्निका ने फूफा जी की तरफ देखा और कहा, "थैंक्यू, लेकिन इसकी ज़रूरत नहीं थी। वैसे भी हम किसी को ये नहीं बताएंगे कि हम अमीर परिवार से हैं, इसलिए कार लेना सही नहीं होगा।"

फूफा जी हल्का सा मुस्कुराए, "मुझे पता था कि तुम यही कहोगी, इसलिए मैंने कोई महंगी कार नहीं ली है।"

दादाजी बोले, "हम जानते हैं कि तुम अपनी मेहनत से सब कुछ हासिल करना चाहती हो, लेकिन हम भी तुम्हारी सुविधा के लिए ही कमाते हैं, तुम्हें तकलीफ में कैसे देख सकते हैं?"

तीनों ने मुस्कुरा कर हामी भर दी। तभी अद्विक बाहर से आता हुआ बोला,

"छोटी, फ्लाइट 3 बजे की है, इसलिए हमें 1:30 बजे तक निकलना होगा।" फिर उसने सान्या की ओर देखा, "तुम्हारी फ्लाइट हमसे एक घंटे बाद की है, क्या तुम हमारे साथ एयरपोर्ट चलोगी?"

सान्या ने तुरंत जवाब दिया, "हाँ, मैं तुम्हारे साथ ही एयरपोर्ट चलूँगी और वहाँ एक घंटे का इंतजार कर लूँगी।"

अद्विक ने सिर हिलाते हुए कहा, "ठीक है, तुम तीनों अपनी ज़रूरी तैयारियाँ पूरी कर लो, फिर समय पर निकलेंगे।"



अर्निका, सान्या और ईनाया ने सहमति में सिर हिलाया और अपने-अपने कमरों की ओर बढ़ गईं।

अर्निका ने अपना बैग खोला और एक बार फिर चेक किया कि सबकुछ सही से पैक हुआ है या नहीं—कपड़े, ज़रूरी दस्तावेज, किताबें… सब ठीक था। फिर भी, उसे ऐसा लग रहा था जैसे कुछ छूट रहा हो।

वह खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई और बाहर देखते हुए सोचने लगी, "नई जगह, नया सफर… लेकिन क्या सब कुछ सच में सामान्य रहेगा?"

उसके मन में अब भी कल रात की घटनाएँ घूम रही थीं। अनजाने में ही उसकी सोच फिर से प्रिंस की ओर चली गई—"आखिर वो कौन था? उसकी आँखों में ऐसा क्या था जो एक पल के लिए भी भुलाया नहीं जा रहा?"

तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई।

"गुड़िया, सब तैयारियाँ हो गईं?"

अर्निका ने पलटकर देखा, तो दरवाजे पर उसकी माँ माधवी खड़ी थीं।

वह हल्का मुस्कुराई, "हाँ माँ, सब तैयार है।"

माधवी ने उसके चेहरे पर हल्की चिंता देखी और बोलीं, "तू परेशान क्यों लग रही है? कुछ हुआ है क्या?"

अर्निका ने गहरी सांस ली और खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, "बस यही सोच रही थी कि वहाँ सब कैसा होगा… सब ठीक रहेगा ना?"

माधवी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा, "सब ठीक होगा, बेटा। और मुझे पूरा यकीन है कि मेरी बेटी अपना नाम जरूर रोशन करेगी।"

अर्निका हल्का मुस्कुराई, फिर उसने माँ की ओर देखा और पूछा, "कल रात वाला लड़का… वो अब कैसा है?"

माधवी ने जवाब दिया, "ठीक है, खतरे से बाहर है। बस उसे थोड़ा आराम करने की जरूरत है।"

अर्निका ने राहत की सांस ली और सिर हिला दिया।

माधवी ने थोड़ा गंभीर होकर पूछा, "बेटा, क्या तू बता सकती है कि वो घायल लड़का तुझे कहाँ और कैसे मिला?"

अर्निका कुछ पल चुप रही, फिर उसने कल रात की सारी बातें माँ को बता दीं। सब सुनने के बाद माधवी थोड़ा चिंतित हो गईं, "तुझे कहीं कुछ…?"

अर्निका ने तुरंत कहा, "माँ, मैं ठीक हूँ।"

माधवी ने उसकी बात पर भरोसा करते हुए हल्का मुस्कुराया, "ठीक है, लेकिन आगे से ध्यान रखना। लोगों की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन इस चक्कर में खुद को मुश्किल में मत डालना, समझी?"

अर्निका ने मुस्कुराकर हामी भर दी।



अर्निका ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया, "हाँ माँ, आगे से ध्यान रखूंगी।"

माधवी ने उसके माथे को चूमते हुए कहा, "अब ज़्यादा मत सोचो, खुश रहो और अपना सफर अच्छे से शुरू करो।"

तभी बाहर से अद्विक की आवाज़ आई, "कुकी, चलो! निकलने का वक्त हो गया है!"

अर्निका ने एक आखिरी बार अपने कमरे पर नज़र डाली—वही कमरा जहाँ उसने अपना बचपन बिताया था। अब यह कमरा कुछ सालों के लिए खाली रहने वाला था… या शायद हमेशा के लिए।

उसने अपना बैग उठाया और माँ को गले लगाते हुए कहा, "माँ, अपना ध्यान रखना। मैं जल्दी ही वापस आऊँगी।"

माधवी ने हल्के से उसकी पीठ थपथपाई, "मुझे तुम्हारी चिंता नहीं, क्योंकि मुझे पता है कि मेरी बेटी हर मुश्किल का सामना कर सकती है। लेकिन फिर भी, कुछ भी हो तो तुरंत बताना।"

अर्निका मुस्कुराई और "हाँ माँ" कहते हुए नीचे हॉल में आ गई।

नीचे आते ही उसने देखा कि सान्या और ईनाया पहले से ही वहाँ मौजूद थीं। अर्निका को आता देख दादी ने उसे प्यार से गले लगाया, "खुश रहो, और अपना ध्यान रखना बेटा।"

उनकी आँखों में आँसू देख तीनों ने उन्हें हग कर लिया और मज़ाक में बोले, "आप क्यों रो रही हैं, दादी? आपको तो खुश होना चाहिए कि अब आपको परेशान करने वाला कोई नहीं रहेगा!"

यह सुनकर दादी और भी ज़ोर से रोने लगीं, "मुझे अच्छा लगता है जब तुम लोग मुझे परेशान करते हो… लेकिन अब यह घर सूना हो जाएगा।"

तभी दादाजी ने कहा, "अरे, ऐसे कोई रोता है क्या? ये बस पढ़ाई के लिए जा रहे हैं और छुट्टियों में वापस आ जाएँगे!"

फिर उन्होंने तीनों को आशीर्वाद देते हुए कहा, "जाओ, अपनी मेहनत से नाम रोशन करो!"


अद्विक ने घड़ी की तरफ देखा और कहा, "चलो, अब निकलने का वक्त हो गया है।"

तीनों ने एक बार फिर घर के सभी सदस्यों को गले लगाया, आशीर्वाद लिया और फिर एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए। लेकिन अर्निका के मन में अब भी एक सवाल गूंज रहा था—"मुंबई में एक नई ज़िंदगी शुरू होने वाली है, लेकिन क्या यह सफर उतना आसान रहेगा, जितना हम सोच रहे हैं?"

गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी, और त्रिपाठी सदन पीछे छूटता जा रहा था… लेकिन क्या यह सच में सिर्फ एक नई शुरुआत थी, या किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही लिखा था?








आगे किया होगा जानने के लिये मेरी कहानी रूह से रूह तक पढ़ते रहिए 

अगर कहीं कोई गलती हो गई हो, तो मुझे माफ कर दीजिएगा।

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