दरिया, परिंदे और वो अजनबी अज़ीम …. वह ज़ोया को जाते हुए देखता है और सोचता है— "यह कैसी अजनबी थी जो आई तो एक शोर की तरह थी (महंगी गाड़ी, रुतबा), पर छोड़ एक खामोशी गई। क्या यह बस एक इत्तेफाक था कि वह अपना पर्स भूल गई, या कुदरत मुझे कुछ और दिखाना चाहती है?" ज़ोया … गाड़ी में बैठते हुए वह पीछे मुड़कर उस दरिया और अज़ीम को देखती है। उसे लगता है जैसे कोई अदृश्य धागा उसे वहां खींच रहा है। "इतने बड़े शहर में, हज़ारों लोगों के बीच, मैं उसी की दुकान पर क्यों रुकी? क्या यह महज़ इत्तेफाक है या मेरी तकदीर का कोई नया मोड़?"
मेरा प्यार - 1
एपिसोड 1: दरिया, परिंदे और वो अजनबीअज़ीम …. वह ज़ोया को जाते हुए देखता है और सोचता है— "यह अजनबी थी जो आई तो एक शोर की तरह थी (महंगी गाड़ी, रुतबा), पर छोड़ एक खामोशी गई। क्या यह बस एक इत्तेफाक था कि वह अपना पर्स भूल गई, या कुदरत मुझे कुछ और दिखाना चाहती है?"ज़ोया … गाड़ी में बैठते हुए वह पीछे मुड़कर उस दरिया और अज़ीम को देखती है। उसे लगता है जैसे कोई अदृश्य धागा उसे वहां खींच रहा है। "इतने बड़े शहर में, हज़ारों लोगों के बीच, मैं उसी की दुकान पर क्यों रुकी? ...Read More
मेरा प्यार - 2
एपिसोड 2 खामोश दूरियाँ और बेनाम खटकज़ोया की गाड़ी जैसे-जैसे दरिया से दूर जा रही थी, उसे लग रहा जैसे वह खुद का एक हिस्सा वहीं छोड़ आई है। वह अपनी मखमली सीट पर पीछे झुककर बैठ गई और आँखें मूंद लीं। उसे रह-रहकर अज़ीम का वह चेहरा याद आ रहा था—सादा, पर बेहद गहरा।ज़ोया का घर: एक आलीशान कैदबंगले में कदम रखते ही नौकरों की कतार और "जी मैम, हाँ मैम" का शोर शुरू हो गया। ज़ोया ने बिना किसी की तरफ देखे सीधा अपने कमरे का रुख किया। उसने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया ...Read More
मेरा प्यार - 3
अध्याय 3: सुकून की कीमतज़ोया ने पैसे तो दे दिए थे, लेकिन उसके कदम अपनी गाड़ी की तरफ नहीं वह वहीं खड़ी रही, उस छोटी सी दुकान को देख रही थी जहाँ मिट्टी के दीये, पुराने ताले और कुछ पीतल के सामान सजे थे। वहां कोई एयर-कंडीशनर नहीं था, कोई मखमली कालीन नहीं था, फिर भी वहां की हवा में एक अजीब सी शांति थी।ज़ोया का सवाल..."अज़ीम," ज़ोया ने पहली बार उसका नाम लिया। "तुम बोर नहीं होते? यहाँ दिन भर बैठे रहना, वही पुराने सामान, वही परिंदे... क्या तुम्हें कभी नहीं लगता कि तुम किसी बड़ी जगह पर ...Read More
मेरा प्यार - 4
अध्याय 4: खामोशियाँ और कड़वा सचज़ोया के जाने के बाद, अज़ीम की दुकान पर सन्नाटा पसर गया। परिंदे अब आते थे, पर अज़ीम उन्हें दाना डालना भूल जाता। वह दिन भर दुकान के कोने में बैठा रहता, अपनी खाली हथेली को देखता जहाँ कभी ज़ोया की दी हुई चाय का प्याला होता था। उसे अपनी कड़वी बातों पर पछतावा था, पर उसकी 'खुद्दारी' उसे फोन करने या माफ़ी मांगने की इजाज़त नहीं दे रही थी। वह अंदर ही अंदर एक घुटन महसूस कर रहा था—ऐसी घुटन जो दुकान छिनने के डर से भी ज़्यादा गहरी थी।उधर ज़ोया ने खुद ...Read More
मेरा प्यार - 5
एपिसोड 4: बेनाम लगाव और ऊँची दीवारेंवक़्त पंख लगाकर उड़ रहा था। ज़ोया और अज़ीम के बीच अब वह खत्म हो चुकी थी। वे अब हर शाम मिलते—कभी दरिया के किनारे, तो कभी शहर की पुरानी गलियों में। उनके बीच जो था, उसे 'प्यार' का नाम देना शायद जल्दबाज़ी होती, पर वह दोस्ती से कहीं बढ़कर था। वह एक ऐसा 'लगाव' था जहाँ दो रूहें एक-दूसरे की खामोशी में भी बात कर लेती थीं।ज़ोया को अज़ीम की सादगी से लगाव था, और अज़ीम को ज़ोया की उस मासूमियत से, जो उसके रईसाना लिबास के पीछे छुपी थी।एक सुकून भरी ...Read More
मेरा प्यार - 6
ज़ोया और अज़ीम के बीच का वह बेनाम रिश्ता अब शहर की हवाओं में महसूस होने लगा था। वे अक्सर उन जगहों पर मिलते थे जहाँ कोई उन्हें पहचान न सके—कभी किसी पुराने मंदिर की सीढ़ियों पर, तो कभी शहर के आखिरी छोर पर बसे एक छोटे से पार्क में।एक कच्चा अहसास:एक शाम, अज़ीम ने ज़ोया को अपनी माँ की पुरानी डायरी से एक सूखा हुआ 'हरसिंगार' का फूल दिखाया।"साहिबा, ये फूल खिलते तो रात में हैं, पर अपनी खुशबू पूरे दिन के लिए छोड़ जाते हैं। हमारी दोस्ती भी वैसी ही है... शायद हम हमेशा साथ न रहें, ...Read More
मेरा प्यार - 7
एपिसोड 7: गुज़ारिश और गूँजता सन्नाटाखन्ना मेंशन के भारी सागवान के दरवाज़े के बाहर दो गार्ड्स पत्थर की तरह थे। अंदर ज़ोया अपनी खिड़की की जाली को पकड़कर बाहर का मंज़र देख रही थी। उसे पता था कि बाहर बुलडोजर की गड़गड़ाहट शुरू होने वाली है। उसने भागकर दरवाज़ा पीटना शुरू किया।"खोलो! कोई दरवाज़ा खोलो! डैड... डैड, मेरी बात सुनिए!" ज़ोया की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी।कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला और मिस्टर खन्ना अपनी रईसाना चाल चलते हुए अंदर आए। उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, जैसे वह किसी बिजनेस डील को खत्म करके आए ...Read More
मेरा प्यार - 8
एपिसोड 8: गिल्ट, घाव और अनसुनी चीखेंकमरे की खामोशी ज़ोया को काटने को दौड़ रही थी। बाहर पहरा था अंदर वह खुद के ही खयालों में कैद थी। ज़ोया ने खिड़की की उन लोहे की जालियों को छुआ जो अभी-अभी उसके पिता ने लगवाई थीं। उसे रह-रहकर अज़ीम का वह चेहरा याद आ रहा था जब बुलडोजर उसकी दुकान के सामने खड़ा था।"यह सब मेरी वजह से हुआ..." ज़ोया ने सिसकते हुए खुद से कहा। उसे एक गहरा गिल्ट (पछतावा) खाए जा रहा था। उसे लग रहा था कि अगर वह अज़ीम की ज़िंदगी में न आती, तो आज ...Read More