Mera Pyar - 7 in Hindi Love Stories by mamta books and stories PDF | मेरा प्यार - 7

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मेरा प्यार - 7

​एपिसोड 7: गुज़ारिश और गूँजता सन्नाटा

​खन्ना मेंशन के भारी सागवान के दरवाज़े के बाहर दो गार्ड्स पत्थर की तरह खड़े थे। अंदर ज़ोया अपनी खिड़की की जाली को पकड़कर बाहर का मंज़र देख रही थी। उसे पता था कि बाहर बुलडोजर की गड़गड़ाहट शुरू होने वाली है। उसने भागकर दरवाज़ा पीटना शुरू किया।

​"खोलो! कोई दरवाज़ा खोलो! डैड... डैड, मेरी बात सुनिए!" ज़ोया की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी।

​कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला और मिस्टर खन्ना अपनी रईसाना चाल चलते हुए अंदर आए। उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, जैसे वह किसी बिजनेस डील को खत्म करके आए हों।

​ज़ोया उनके पैरों के पास गिर गई। "डैड, प्लीज... उसे मत रोकिए। उसकी दुकान मत तुड़वाइए। वह एक बहुत नेक इंसान है डैड।"

​मिस्टर खन्ना ने उसे ऊपर उठाया और सख्ती से कहा, "ज़ोया, तुम अपनी हदें भूल रही हो। एक मामूली दुकानदार के लिए खन्ना खानदान की बेटी रो रही है? शहर में लोग बातें कर रहे हैं कि तुम्हारा उसके साथ कोई 'चक्कर' है।"

​ज़ोया की आँखों में आँसू थे, पर उसने सिर उठाकर कहा, "नहीं डैड! मेरा कोई चक्कर नहीं है। वह सिर्फ मेरा दोस्त है। उसने मुझे तब सुकून दिया जब मैं आपकी दौलत के शोर में दम घुटने जैसा महसूस कर रही थी। वह मेरा दोस्त है डैड, और आज उसे मेरी ज़रूरत है। प्लीज मुझे जाने दीजिए... मैं आपसे भीख मांगती हूँ, उसकी दुकान को कुछ मत होने दीजिए।"

​मिस्टर खन्ना कड़वाहट से मुस्कुराए। "दोस्ती? ज़ोया, ये दुनिया सिर्फ ताकत और रुतबे को पहचानती है। आज अगर मैंने उसे छोड़ दिया, तो कल कोई भी ऐरा-गैरा तुम्हारी दोस्ती का फायदा उठाकर यहाँ तक पहुँच जाएगा। वह दुकान आज मिट्टी में मिलेगी, ताकि तुम्हें तुम्हारी सही जगह याद रहे।"

​"डैड, आप ऐसा नहीं कर सकते! वह बेगुनाह है!" ज़ोया चिल्लाई।

​मिस्टर खन्ना ने बिना पीछे मुड़े दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया और गार्ड्स को हुक्म दिया, "चाहे जो हो जाए, ज़ोया बाहर नहीं आनी चाहिए।"

​ज़ोया कमरे के फर्श पर बैठ गई। उसने अपने पिता की आँखों में अपने लिए प्यार नहीं, बल्कि सिर्फ अपने 'रुतबे' की फिक्र देखी। उसे अहसास हुआ कि मिन्नतें करने का वक्त खत्म हो गया है। उसने अपनी साड़ियों की तरफ देखा और अपनी आँखों के आँसू पोंछ लिए। अब वह गिड़गिड़ाने वाली बेटी नहीं, बल्कि हक के लिए लड़ने वाली एक 'बागी' बनने वाली थी।

​​ अंधेरे में दबे कदम और अचानक दस्तक

​मिस्टर खन्ना के कमरे से बाहर जाने के बाद, ज़ोया ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। उसने अपने कमरे की भारी सिल्क की साड़ियों को आपस में जोड़कर एक लंबी रस्सी तैयार की। उसका दिल किसी नगाड़े की तरह बज रहा था। उसने रस्सी का एक सिरा बेड के पाए से मजबूती से बाँधा और दूसरा खिड़की से नीचे लटका दिया।

​रात का घना अंधेरा और नीचे काँटेदार झाड़ियाँ... ज़ोया ने एक गहरी साँस ली और रस्सी पकड़कर धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी। उसके नाज़ुक हाथ रेशमी कपड़े की रगड़ से छिलने लगे थे, पर उसे उस दर्द का अहसास तक नहीं हो रहा था। जैसे ही उसके पैर ज़मीन पर टिके, उसने राहत की साँस ली।

​"बस थोड़ा और..." उसने खुद से फुसफुसाते हुए कहा।

​वह साये की तरह दीवारों से चिपककर पीछे वाले बगीचे की तरफ बढ़ने लगी। उसे पता था कि मुख्य द्वार पर कड़ा पहरा है, इसलिए उसने उस छोटे गेट की तरफ जाने का फैसला किया जहाँ से माली कूड़ा बाहर ले जाता था। वह दबे पाँव, झाड़ियों के पीछे छुपते-छुपाते आगे बढ़ रही थी। अचानक, एक सूखे पत्ते पर उसका पैर पड़ा—चरमराते पत्ते की आवाज़ सन्नाटे में गूँज गई।

​ज़ोया वहीं जम गई। दूर एक टॉर्च की रोशनी घूमी। उसने अपनी साँसें रोक लीं। वह माली के गेट के बिल्कुल करीब पहुँच चुकी थी। उसने गेट की कुंडी पर हाथ रखा ही था कि अचानक...

​पूरे बगीचे की फ्लड लाइट्स जल उठीं। रोशनी इतनी तेज़ थी कि ज़ोया की आँखें चुंधिया गईं।

​"इतनी जल्दी क्या है ज़ोया?" एक भारी और ठंडी आवाज़ उसके पीछे से आई।

​ज़ोया धीरे से मुड़ी। सामने मिस्टर खन्ना खड़े थे, उनके साथ चार बॉडीगार्ड्स और कुत्तों की डरावनी आवाज़ें थीं। उनके हाथ में वही सिल्क की रस्सी थी जो ज़ोया ने अपने कमरे से लटकाई थी।

​"डैड..." ज़ोया की आवाज़ गले में ही फंस गई।

​मिस्टर खन्ना आगे बढ़े और ज़ोया के धूल से सने चेहर को देखा। "मैंने सोचा था कि तुम समझदार हो, पर तुमने तो एक अपराधी की तरह अपने ही घर से भागने की कोशिश की। सिर्फ उस मामूली लड़के के लिए?"

​"वह मामूली नहीं है डैड! वह मेरा दोस्त है!" ज़ोया चिल्लाई, पर उसकी आवाज़ में अब सिर्फ बेबसी थी।

​मिस्टर खन्ना ने गार्ड्स की तरफ इशारा किया। "इसे वापस इसके कमरे में ले जाओ। और इस बार दरवाज़े के साथ-साथ खिड़कियों पर भी लोहे की जालियां लग जानी चाहिए। और हाँ..." उन्होंने अपने पीए की तरफ मुड़कर देखा, "बुलडोजर चलाने वाले से कहो, कि अब रुकने की ज़रूरत नहीं है। अज़ीम की दुकान को राख में मिला दो।"

​"नहीं! डैड! ऐसा मत कीजिए!" ज़ोया को दो गार्ड्स ने पकड़कर खींचना शुरू किया। वह ज़मीन पर पैर पटकती रही, चिल्लाती रही, पर उसके पिता के पत्थर जैसे दिल पर कोई असर नहीं हुआ।

​उसे वापस उसके कमरे में धकेल दिया गया और बाहर से ताला लगा दिया गया। 

​ज़ोया की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उसे लगा जैसे उसकी दोस्ती, उसका सुकून और अज़ीम की दुनिया—सब कुछ खत्म होने वाला है।