एपिसोड 14: ज़मीर की कंगाली और लहू का दान
अस्पताल के गलियारे में अज़ीम और कादिर, डॉक्टर के पीछे-पीछे तेज़ी से ब्लड डोनेशन रूम की तरफ बढ़ रहे थे। अज़ीम का चेहरा उम्मीद से चमक रहा था, उसे लग रहा था कि अब ज़ोया साहिबा बच जाएंगी। लेकिन ठीक वहीं, गलियारे के दूसरे कोने में खड़े मिस्टर खन्ना के दिमाग में ज़हर अभी भी उबल रहा था।
मिस्टर खन्ना ने अपनी महंगी घड़ी की तरफ देखा और फिर नफरत भरी नज़रों से कादिर और अज़ीम को जाते हुए देखा। उनके मन में किसी के प्रति कृतज्ञता (gratitude) नहीं थी, बल्कि एक खौफनाक साजिश चल रही थी।
'ये सब एक नाटक है,' मिस्टर खन्ना ने मन ही मन सोचा। 'ये गरीब लोग अब इस अहसान का बिल फाड़ेंगे। अब ये मेरी दौलत को लूटने के लिए नया जाल बुनेंगे। खून देकर ये मेरी आधी जायदाद पर अपना हक जताएंगे। ये लोग मेरी मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। साख को बचाने के लिए अब मुझे इस दुकानदार के दोस्त के तलवे चाटने पड़ेंगे... यही इनकी चाल है।'
उनकी सोच इतनी गिर चुकी थी कि उन्हें अपनी बेटी की जान से ज़्यादा अपनी तिजोरी की फिक्र सता रही थी।
ज़ारा का विस्फोट:
मिस्टर खन्ना के चेहरे के इन कुटिल भावों को ज़ारा ने पढ़ लिया। वह अब गुस्से से पूरी तरह फट पड़ी। उसने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और अपने पिता के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई।
"अभी भी? अभी भी आप वही सोच रहे हैं न?" ज़ारा की आवाज़ पूरी शिद्दत के साथ गूँजी। "आप सोच रहे हैं कि ये लोग आपकी दौलत लूटने आए हैं? मिस्टर खन्ना, अपनी आँखों से ये रईसी का चश्मा उतार कर फेंक दीजिए! जिस इंसान को आपने 'सड़क का कचरा' समझा, आज वही अपनी रगों का खून निकालकर आपकी बेटी को दे रहा है।"
मिस्टर खन्ना ने कड़वाहट से कहा, "ये सब पैसों का खेल है ज़ारा, तुम अभी बच्ची हो।"
"मैं बच्ची नहीं हूँ, मैं आपकी असलियत देख रही हूँ!" ज़ारा दहाड़ी। "इतने पैसे, इतनी ताकत, इतना बड़ा साम्राज्य... क्या काम आया? देखिए मुझे! देखिए अपनी इस बड़ी बेटी को जो दुनिया भर के बिज़नेस संभालती है... और देखिए खुद को! हम दोनों मिलकर भी अपनी बहन को एक बूंद खून नहीं दे पा रहे। हमारी रगों में खून नहीं, शायद आपका ये काला अहंकार दौड़ रहा है। आज एक फकीर आपकी शहज़ादी को ज़िंदगी दान दे रहा है और आप अभी भी 'मुनाफे' का हिसाब लगा रहे हैं? मुझे शर्म आती है कि मैं आपकी बेटी हूँ!"
मिस्टर खन्ना खामोश हो गए, पर उनके चेहरे की अकड़ अभी भी कम नहीं हुई थी।
ब्लड बैंक के अंदर:
अज़ीम बाहर कांच से कादिर को देख रहा था, जिसकी रगों से खून उस थैली में जमा हो रहा था जो ज़ोया की रगों में जाने वाली थी। अज़ीम ने हाथ जोड़कर ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया, बेखबर कि बाहर बैठा शख्स अभी भी उसे 'लुटेरा' समझ रहा है।
दोस्ती का कर्ज और शराफत
ब्लड बैंक से बाहर निकलते ही कादिर के चेहरे पर थोड़ी कमजोरी थी, पर एक संतोष भी था। अज़ीम लपक कर उसके पास पहुँचा और उसे सहारा देकर एक कुर्सी पर बिठाया। अज़ीम की आँखों में नमी थी और गले में एक अजीब सी भारीपन।
उसने कादिर का हाथ थाम लिया और बहुत ही धीमी आवाज़ में बोला, "कादिर... भाई, आज तूने जो किया है, उसका हिसाब मैं ताउम्र नहीं चुका पाऊंगा। तू जानता है, अज़ीम ने आज तक कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया, कभी किसी से कोई मन्नत नहीं की। लेकिन आज... आज मेरी मजबूरी ने मुझे बेबस कर दिया था। तुझे इस मुसीबत में घसीटना पड़ा, मुझे माफ कर देना भाई।"
कादिर ने मुस्कुराते हुए अज़ीम के कंधे पर हाथ रखा, "पागल है क्या अज़ीम? तूने मुझे फोन किया, यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। दोस्त के काम नहीं आऊंगा तो ये ज़िंदगी किस काम की? और वैसे भी, ये खून मैंने तुझे नहीं, उस लड़की की बेगुनाही और तेरे प्यार को दिया है।"
अज़ीम की गर्दन झुक गई। "मुझे बस डर था कि कहीं देर न हो जाए। पर तूने आज साबित कर दिया कि दुनिया में सब कुछ पैसों से नहीं चलता। जो काम करोड़ों रुपये नहीं कर सके, वो तेरी दोस्ती ने कर दिखाया।"
तभी ज़ारा वहां आ पहुँची। उसने अज़ीम और कादिर की ये बातें सुनीं। उसकी नज़रों में अज़ीम के लिए सम्मान और भी बढ़ गया। उसने देखा कि जिस लड़के के पास अपनी दुकान तक नहीं बची, उसकी ज़ुबान पर अभी भी 'माफी' और 'शुक्रिया' जैसे लफ्ज़ हैं।
ज़ारा ने आगे बढ़कर कादिर के सामने हाथ जोड़े, "कादिर जी, शुक्रिया कहना बहुत छोटा शब्द होगा। आपने आज सिर्फ ज़ोया की जान नहीं बचाई, बल्कि इस बात का सबूत दिया है कि इंसानियत आज भी ज़िंदा है।"
मिस्टर खन्ना दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उनकी आँखों में जलन थी कि उनके अपने अस्पताल में, उनके ही सामने, उनकी बेटी एक मामूली इंसान के सामने झुक रही है। उनके लिए यह शुक्रिया और यह दोस्ती सिर्फ एक 'कमज़ोरी' थी।