एपिसोड 12: मलबे से मोहब्बत तक
अस्पताल के मुख्य द्वार पर सुरक्षाकर्मियों ने एक फटे हाल, कीचड़ में सने और पागलों की तरह दौड़ते हुए लड़के को रोकने की कोशिश की, पर अज़ीम की आँखों में उस वक्त ऐसी आग थी कि कोई उसके सामने आने की हिम्मत नहीं कर सका। वह सीधे लिफ्ट की जगह सीढ़ियों से भागता हुआ तीसरी मंज़िल पर पहुँचा।
गलियारे में खड़े मिस्टर खन्ना और ज़ारा ने देखा कि एक लड़का, जिसके पैरों में चप्पल तक नहीं थी, सीधा आईसीयू (ICU) के दरवाज़े की तरफ बढ़ रहा है। गार्ड्स उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़े, पर ज़ारा ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया।
अज़ीम ने बिना किसी से कुछ पूछे, बिना किसी की इजाज़त लिए, आईसीयू का भारी दरवाज़ा धकेल दिया।
अंदर का सन्नाटा मशीनों की हल्की आवाज़ों से भरा था। बिस्तर पर ज़ोया बेजान पड़ी थी, उसके चेहरे का नूर जैसे गायब हो चुका था। अज़ीम उसके बिस्तर के पास जाकर रुक गया। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने धीरे से ज़ोया के उस हाथ को देखा जिस पर सफेद पट्टी बंधी थी, जो अब भी लाल हो रही थी।
"ज़ोया साहिबा..." अज़ीम की आवाज़ गले में ही फंस गई।
उसने घुटनों के बल बैठकर ज़ोया के हाथ को अपने माथे से लगा लिया। "ये क्या किया आपने? क्या आपको हमारी उस छोटी सी दुनिया का ज़रा भी ख्याल नहीं आया? क्या आपको उस दोस्ती की भी कद्र नहीं थी जिसके दम पर मैं इस ज़ालिम शहर में खड़ा था?"
अज़ीम की आँखों से आँसू गिरकर ज़ोया के हाथ पर पड़े। "आपने तो कहा था कि आप हार नहीं मानेंगी... फिर आज अपनी साँसों का सौदा क्यों कर लिया? उठिए साहिबा... देखिए, अज़ीम आ गया है। आपने मुझे बुलाया था न? अब आँखें खोलिए और मुझे डांटिए कि मैं देर से क्यों आया।"
बाहर खड़े मिस्टर खन्ना अपनी बेटी के लिए एक 'मामूली दुकानदार' की इस तड़प को देखकर अंदर तक हिल गए। उन्हें पहली बार अहसास हुआ कि जिस मोहब्बत को वह मिटाना चाहते थे, वह उस दौलत से कहीं ज़्यादा कीमती थी जिसे वह बचाना चाहते थे।
तभी, मशीनों की 'बीप' तेज़ हुई। ज़ोया की उंगलियों में हल्की सी हलचल हुई, जैसे अज़ीम के आँसुओं ने उसकी रूह को वापस पुकार लिया हो।
दौलत की जीत, ज़िंदगी की हार
अज़ीम पागलों की तरह ज़ोया के बिस्तर के चारों तरफ घूम रहा था। वह कभी मशीनों को देखता, कभी ज़ोया के चेहरे को सहलाता। उसका दिमाग यह मानने को तैयार ही नहीं था कि जो लड़की कल तक उसके साथ सुनहरे सपनों की बात कर रही थी, वह आज मौत की नींद सोने की तैयारी में है।
"डॉक्टर! कोई डॉक्टर कहाँ है?" अज़ीम चिल्लाया और कमरे की एक मेज़ को ज़ोर से धक्का दिया। "देखो इसे, इसे कुछ हो रहा है! ज़ोया... ज़ोया जवाब दो! क्या तकलीफ है तुम्हें? बताओ मुझे, मैं आ गया हूँ ना। तुम तो कहती थी कि अज़ीम के होते हुए तुम्हें कुछ नहीं हो सकता। फिर अब क्यों खामोश हो?"
अज़ीम की आँखों में एक अजीब सा पागलपन था। वह ज़ोया के हाथों को रगड़ने लगा जैसे अपनी गर्मी से उसे ज़िंदा कर देगा। वह कमरे में इधर से उधर दौड़ रहा था, मानों वह मौत से लड़कर उसे बाहर निकाल देगा।
तभी ज़ारा, जो अब तक दरवाज़े पर खड़ी यह मंज़र देख रही थी, भारी कदमों से अंदर आई। उसने आगे बढ़कर अज़ीम के कंधे पकड़े और उसे ज़ोर से झकझोर दिया।
"अज़ीम! रुक जाओ!" ज़ारा की आवाज़ कमरे में गूँज उठी।
अज़ीम रुका, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। "मैम, देखिए न... यह बोल नहीं रही। इसे कहिए न कि यह मुझसे मज़ाक न करे।"
ज़ारा की आँखों से एक आँसू टपक कर अज़ीम के हाथ पर गिरा। उसने कड़वाहट और गहरे दर्द के साथ कहा, "वह अब नहीं उठेगी अज़ीम। वह हार चुकी है... वह इस दौलत से, इस साख से और अपने ही पिता के अहंकार से हार चुकी है। उसने तुम्हें बचाने के लिए खुद को मिटा लिया, क्योंकि उसे पता था कि जब तक वह ज़िंदा रहेगी, ये लोग तुम्हें जीने नहीं देंगे।"
अज़ीम सुन्न पड़ गया। ज़ारा ने आईसीयू की खिड़की से बाहर खड़े मिस्टर खन्ना की तरफ इशारा किया और चीखते हुए बोली, "देखो उसे! वह है इस हार की वजह। ज़ोया ने अपनी जान देकर साबित कर दिया कि तुम्हारे प्यार की कीमत उसके पिता की पूरी जायदाद से बड़ी थी। वह चली गई अज़ीम... वह हमें इस ज़हरीली दुनिया में अकेला छोड़ गई।"
अज़ीम का शरीर ढीला पड़ गया। वह ज़ोया के पैरों के पास फर्श पर बैठ गया। कमरे में छाई वह खामोशी अब चीखने लगी थी। बाहर खड़े मिस्टर खन्ना ने जब ज़ारा की ये बातें सुनीं, तो उन्होंने अपना चेहरा हाथों से ढक लिया। उनकी करोड़ों की साख आज उनके अपने ही कमरे में दम तोड़ रही थी।