एपिसोड 11: ज़ारा का हुक्म और अज़ीम की तलाश
ज़ोया की हालत और उसकी आखिरी वसीयत ने ज़ारा के अंदर के गुस्से को एक मिशन में बदल दिया था। उसने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और कमरे से बाहर निकलकर सीधे राणा (सिक्योरिटी हेड) को फोन लगाया।
राणा ने कांपते हाथों से फोन उठाया, "जी... ज़ारा मैम?"
"राणा, कान खोलकर सुन लो," ज़ारा की आवाज़ बर्फीली और घातक थी। "तुमने और मेरे डैड ने मिलकर जिस अज़ीम को तबाह किया है, जिसकी दुकान तुमने मिट्टी में मिला दी... मुझे वह लड़का हर हाल में चाहिए। अभी के अभी! शहर का कोना-कोना छान मारो, पर उसे ढूंढकर इसी वक्त अस्पताल लेकर आओ। मुझे उसकी यहाँ ज़रूरत है।"
राणा ने हकलाते हुए कहा, "पर मैम... साहब का हुक्म था कि उसे शहर से बाहर..."
"साहब का वक्त खत्म हो गया राणा! अब मेरा हुक्म चलेगा," ज़ारा ने उसे बीच में ही काट दिया। "अगर एक घंटे के अंदर अज़ीम यहाँ सही-सलामत नहीं पहुँचा, तो याद रखना कि तुम्हारी वर्दी और तुम्हारी ज़िंदगी, दोनों मैं नीलाम कर दूँगी। मुझे वह लड़का ज़िंदा चाहिए, समझ गए?"
फोन काटकर ज़ारा वापस मिस्टर खन्ना की तरफ मुड़ी, जो टूटे हुए इंसान की तरह बेंच पर बैठे थे। ज़ारा ने उनकी ओर देखा तक नहीं, उसकी नज़रों में अब सिर्फ और सिर्फ अज़ीम को ढूंढने और ज़ोया को दिया हुआ वादा निभाने की ज़िद थी।
उधर, राणा ने अपने सारे गार्ड्स और मुखबिरों को काम पर लगा दिया। पूरे शहर में अज़ीम की तलाश शुरू हो गई।
वही दूसरी ओर:
अज़ीम उस वक्त अपनी टूटी हुई दुकान के मलबे के पास बैठा था। बारिश तेज़ हो चुकी थी। उसके पास न रहने को छत थी, न खाने को रोटी। वह ज़ोया की दी हुई उस पुरानी चाबी को देख रहा था, बेखबर कि शहर की सबसे ताकतवर औरत उसे ढूंढ रही है और उसकी ज़िंदगी अब हमेशा के लिए बदलने वाली है।
स्वाभिमान का मलबे से उठा शोर
बारिश की बूंदें मलबे पर गिर रही थीं, जहाँ अज़ीम सिर झुकाए बैठा था। तभी वहां तीन-चार काली गाड़ियाँ आकर रुकीं। राणा अपनी छतरी लिए गाड़ी से उतरा और तेज़ कदमों से अज़ीम की तरफ बढ़ा।
"अज़ीम! चलो मेरे साथ, तुम्हें अभी इसी वक्त अस्पताल चलना होगा," राणा ने हक जताते हुए कहा।
अज़ीम ने धीरे से अपनी सर उठाई। उसकी आँखों में न खौफ था, न लालच। उसने एक ठंडी हंसी हँसते हुए कहा, "क्यों? मिस्टर खन्ना की किसी और बिल्डिंग की नींव में मेरी हड्डियों की ज़रूरत पड़ गई क्या? या फिर कोई और दुकान बाकी रह गई है जिसे गिराना भूल गए हो?"
राणा झुंझला गया, "बहस मत करो! तुम्हें बड़ी मैम, ज़ारा मैम ने बुलाया है। मामला बहुत गंभीर है, चलो हमारे साथ।"
अज़ीम मलबे से खड़ा हुआ और राणा की आँखों में आँखें डालकर बोला, "साफ कह दो राणा साहब, कि मिस्टर खन्ना को फिर से अपनी रईसी का तमाशा दिखाना है। जाकर कह दो अपने साहब से... जिसे ज़रूरत होगी, वह खुद यहाँ मलबे तक आएगा। अज़ीम तुम्हारे फेंके हुए टुकड़ों या हुक्म पर चलने वाला गुलाम नहीं । तुमने मेरी दुकान छीनी है, मेरा ईमान नहीं। मुझे तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है, और न ही मैं उस महल के किसी भी इंसान की शक्ल देखना चाहता हूँ।"
राणा ने उसे डराने की कोशिश की, "ज़िद मत करो अज़ीम, तुम जानते नहीं हो कि तुम किससे मना कर रहे हो।"
"मैं अच्छी तरह जानता हूँ!" अज़ीम दहाड़ा। "मैं उन लोगों को मना कर रहा हूँ जिनके पास पैसा तो बहुत है, पर कलेजा नहीं। अपनी ये गाड़ियाँ और ये रौब वापस ले जाओ। अगर ज़ोया के लिए मेरी जान भी माँगी जाती, तो मैं नंगे पैर दौड़ पड़ता... पर मिस्टर खन्ना के बुलावे पर मैं अपनी लाश भी उनके दरवाज़े तक न ले जाऊँ। जाओ यहाँ से!"
राणा हक्का-बक्का रह गया। वह खाली हाथ वापस जाने से डर रहा था क्योंकि ज़ारा का गुस्सा उसे राख कर देता। पर अज़ीम के पत्थर जैसे इरादों को देखकर उसे समझ आ गया कि आज दौलत की हार हुई है।
एक आखिरी पुकार
अस्पताल के गलियारे में ज़ारा बेचैनी से चक्कर काट रही थी। तभी उसके फोन की घंटी बजी। राणा का फोन था।
"मैम... अज़ीम किसी भी कीमत पर आने को तैयार नहीं है। उसने साफ कह दिया है कि वह आपके फेंके हुए पैसों का गुलाम नहीं है और जिसे ज़रूरत है वह खुद उसके पास आए," राणा की आवाज़ में घबराहट थी।
यह सुनते ही ज़ारा गुस्से से लाल हो गई। उसका मन किया कि वह खुद जाकर अज़ीम को खींच कर लाए, पर तभी उसकी नज़र आईसीयू के कांच से ज़ोया पर पड़ी, जो ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रही थी। ज़ारा का सारा गुस्सा एक पल में आँसुओं में बदल गया। वह फोन पर ही सिसकते हुए चिल्लाई—
"पैसों की बात किसने की राणा? उसे बताओ कि यहाँ कोई रईसज़ादी हुक्म नहीं दे रही, बल्कि एक मरती हुई बहन की आखिरी ख्वाहिश उसे बुला रही है! राणा... मेरा बस एक काम कर दो... फोन ज़रा लाउडस्पीकर पर डालो, मुझे सिर्फ एक बार उससे बात करनी है। सिर्फ एक बार!"
राणा ने कांपते हाथों से अपना फोन अज़ीम की तरफ बढ़ाया, जो अभी भी मलबे पर बैठा था। "ज़ारा मैम बात करना चाहती हैं," राणा ने धीमी आवाज़ में कहा।
अज़ीम ने नफरत से फोन की तरफ देखा, पर जैसे ही लाउडस्पीकर से ज़ारा की रोती हुई आवाज़ आई, उसके पैर जम गए।
"अज़ीम..." ज़ारा की आवाज़ टूटी हुई थी। "मुझे नहीं पता तुम कौन हो और न ही मुझे डैड की रईसी से कोई मतलब है। मैं सिर्फ ज़ोया की बड़ी बहन हूँ। अज़ीम... ज़ोया जा रही है। उसने अभी-अभी होश में आते ही सिर्फ तुम्हारा नाम लिया है। वह मरते-मरते भी तुम्हारे लिए दुआ माँग रही है। वह कह रही है कि 'अज़ीम को संभाल लेना दी'... अज़ीम, वह पागल लड़की तुम्हारे इंतज़ार में अपनी साँसें रोक कर बैठी है। क्या तुम उसे आखिरी बार खुदा-हाफ़िज़ कहने भी नहीं आओगे? क्या तुम्हारी ये नफरत ज़ोया की आखिरी साँस से भी बड़ी है?"
अज़ीम के हाथ से वह पुरानी चाबी गिर गई। उसकी आँखों के सामने ज़ोया का वो मासूम चेहरा आ गया। उसका सारा स्वाभिमान, सारी नफरत ज़ोया के नाम पर एक पल में पिघल गई।
"ज़ोया साहिबा..." अज़ीम के गले से एक चीख निकली। उसने बिना कुछ सोचे, बिना राणा की गाड़ी का इंतज़ार किए, अस्पताल की तरफ दौड़ लगादी। उसके पीछे राणा की गाड़ियाँ धूल और पानी उड़ाती हुई दौड़ रही थीं, पर अज़ीम को सिर्फ ज़ोया की वो उखड़ती साँसें सुनाई दे रही थीं।