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डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टिविवेक रंजन श्रीवास्तवधर्मवीर भारती...
संस्मरण 25 वें वैवाहिक वर्षगांठ का अनमोल उपहार --------------- 15 फरवरी &...
अगले कुछ हफ़्तों में दिव्या की जिंदगी में अजीब सा संतुलन आने लगा। कॉलेज के दिन स...
(जब बेटी ने प्यार को समझा)समय बीत गया।आर्या अब 22 साल की हो चुकी थी।कॉलेज खत्म ह...
बस कुछ ही दिन गुजरते है, कम्प्यूटर से एक दिन शेफाली को एक मैसेज आता है. " डिअर द...
अगली सुबह। घर में हल्का उजाला। Karan और Kabir उठते हैं, लेकिन उनके बीच वाली जगह…...
जानवी आदित्य की बात को पुरा होने से पहले ही बात को बिच मे काट देती है और जानवी च...
चंगुल कमल चोपड़ा लड़की का चेह...
बरगद का साया और वो अक्सकॉलेज के आर्ट्स ब्लॉक के पीछे वाला वो हिस्सा हमेशा से थोड़...
ट्रैक साँस रोके हुए था। सुपरकार वर्ल्ड चैंपियनशिप की आख़िरी रेस—जिस पर पूरी दुनि...
एक सभ्य समाज में पुरुष और महिला के बीच सुंदरता से भरे संबंधों के बारे में यदि कहां जाए तो ----उसे कामसूत्र कहते हैं (क्या है ,कामवासना )और (क्या है, प्रेम), कामसूत्र से संबंधित कई...
शाम का समय था । जानवी अपने पापा अशोक मुखर्जी से अपने पसंद के लड़के से शादी करने की जिद कर रही थी । जिस कारण से अशोक अपनी एकलौती बेटी जानवी को डांटता है । अशोक धनबाद शहर का एक जाना...
शहर की रफ़्तार थम चुकी थी, लेकिन आसमान अपनी पूरी ताकत से गरज रहा था। रात के 11 बज रहे थे। ऐशा अपने भारी बैग को कंधे पर टांगे, कॉलेज की एक्स्ट्रा क्लास खत्म कर घर की ओर तेज़ कदमों स...
एपिसोड 1: रिश्तों की नीलामीशहर की रफ़्तार शाम ढलते ही और तेज़ हो गई थी, लेकिन 'खन्ना मेंशन' के भीतर वक्त जैसे ठहर गया था। यह घर नहीं, संगमरमर से बना एक आलीशान ताबूत लगता था...
एक बड़े मेले के भीड़-भाड़ वाले प्रांगण के भीतर एक विशाल कक्ष सजा हुआ था। वहां बहुत सारे लोग मौजूद थे। सामने, एक सोने-ओसके सिंहासन पर लगभग सोलह–सत्रह वर्ष का एक लड़का बैठा था; जलालु...
इस तरह एक सदियां बीत गए।। लेकिन नैना वनवास खत्म नहीं हुआ था शायद वो अब जिंदगी को एक नया मोड़ पर समझना चाहती थी। और फिर नैना को अब सब कुछ अच्छा लगने लगा था क्या चल रहा था नैन...
मजबूरी की शादीबारिश की वो रात भूला न जाने वाली थी। पटना की तंग गलियों में पानी की धाराएँ तेज़ी से बह रही थीं, सड़कें नदियों में बदल चुकी थीं। मानो आसमान भी अनन्या मिश्रा के आँसुओं...
कुहासों की गलियों में से गुज़रते हुए जीवन की गठरी न जाने कितनी बार नीचे गिरी, कितनी बार खुली, कितनी बार बिखरी और समेटी गई लेकिन गठरी की गाँठ बड़ी कमज़ोर रही फिर चिंदी बनकर उड़ने से उसम...
दरिया, परिंदे और वो अजनबी अज़ीम …. वह ज़ोया को जाते हुए देखता है और सोचता है— "यह कैसी अजनबी थी जो आई तो एक शोर की तरह थी (महंगी गाड़ी, रुतबा), पर छोड़ एक खामोशी गई। क्या यह...
एक ही शहर, दो दुश्मन और वो पुरानी चोट दरभंगा की तपती दुपहरी में राजवीर राठौर और भानु प्रताप ठाकुर की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। दोनों का रसूख ऐसा कि परिंदा भी पर न मारे। राजवीर स...
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