एपिसोड 20: वक्त का पहिया और थमी हुई सांसें
तीन दिन बीत चुके थे, लेकिन ज़ोया की पलकों में कोई हलचल नहीं हुई। वह मशीनों के सहारे एक गहरी और खामोश नींद में सोई हुई थी। अस्पताल के बाहर मीडिया का जमावड़ा था, और अंदर मौत और ज़िंदगी के बीच एक अदृश्य जंग चल रही थी।
टॉप डॉक्टर्स की बेबसी:
अख्तर ने अमेरिका और जर्मनी से जो डॉक्टर्स बुलाए थे, वे कमरे से बाहर निकले। उनके चेहरों पर शिकन थी।
डॉ. मिलर (चीफ सर्जन): "मिस्टर अख्तर, हमने दुनिया की हर मुमकिन दवा और तकनीक का इस्तेमाल कर लिया है। मेडिकली उसकी हालत स्थिर (stable) है, लेकिन वह रिस्पॉन्ड नहीं कर रही है। ऐसा लग रहा है जैसे उसने खुद ही होश में आने की इच्छा छोड़ दी है। इसे हम 'कोमा' की शुरुआती स्टेज कह सकते हैं।"
यह सुनकर ज़ारा फूट-फूट कर रोने लगी। मिस्टर खन्ना एक कोने में फर्श पर बैठे थे, उनकी सारी अकड़, सारा पैसा धरा का धरा रह गया था। उनके पास दुनिया की हर चीज़ खरीदने की ताकत थी, पर अपनी बेटी की एक सांस नहीं खरीद पा रहे थे।
अज़ीम की तपस्या
इन तीन दिनों में अज़ीम ने न कुछ खाया था, न वह अपनी जगह से हिला था। वह ज़ोया के कमरे के कांच वाले दरवाज़े के बाहर ज़मीन पर बैठा रहता। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे, और वह लगातार तस्बीह (प्रार्थना) पढ़ रहा था।
अख्तर उसके पास आया और उसके पास नीचे ही बैठ गया।
अख्तर: "अज़ीम, डॉक्टर्स कह रहे हैं कि उसे अब दुआओं की और किसी अपने की आवाज़ की ज़रूरत है। साइंस थक चुकी है।"
अज़ीम ने भीगी आँखों से अख्तर को देखा। "साहब, क्या मैं अंदर जा सकता हूँ? सिर्फ एक बार?"
अख्तर ने बिना सोचे गार्ड्स को हटने का इशारा किया। "जाओ अज़ीम, शायद तुम्हारी आवाज़ उसे उस अंधेरे से खींच लाए।"
एक खामोश संवाद
अज़ीम लड़खड़ाते कदमों से अंदर गया। वहां सिर्फ मशीनों की 'बीप-बीप' आवाज़ आ रही थी। उसने ज़ोया का ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया।
अज़ीम: (धीमी आवाज़ में) "ज़ोया... देखो, मैं कहीं नहीं गया। तुमने कहा था न कि तुम्हें दरिया की लहरें देखनी हैं? मैंने तुम्हारे लिए एक छोटी सी कश्ती तैयार की है। तुम उठोगी नहीं तो उसे कौन चलाएगा? ज़ारा आपा रो रही हैं, और तुम्हारे 'जीजू' भी यहाँ हैं। सब इंतज़ार कर रहे हैं... बस एक बार अपनी आँखें खोल दो।"
अज़ीम की आँखों से एक आँसू गिरा और ज़ोया की हथेली पर जा टिका। उसी पल, मॉनिटर पर दिख रही दिल की धड़कन की लकीरें अचानक तेज़ होने लगीं।
बाहर खड़े अख्तर और ज़ारा की सांसें थम गईं। क्या अज़ीम की मोहब्बत वाकई दुनिया के टॉप डॉक्टर्स की हार को जीत में बदल देगी?
अस्पताल के उस आलीशान वीआईपी वेटिंग एरिया में, जहाँ हर चीज़ की कीमत अज़ीम की पूरी ज़िंदगी की कमाई से भी ज़्यादा थी, वह खुद को बहुत छोटा और लाचार महसूस करने लगा था। अख्तर और मिस्टर खन्ना की दुनिया और उसकी अपनी छोटी सी दुकान के बीच का फासला अब उसे काट रहा था।
स्वाभिमान और टूटी हुई उम्मीदें
अज़ीम कई दिनों से उसी फर्श पर बैठा था, लेकिन अब उसकी आँखों में सिर्फ दुख नहीं, बल्कि एक गहरी थकावट और हीन भावना (inferiority complex) घर करने लगी थी। उसने देखा कि कैसे अख्तर एक फोन कॉल पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा था, कैसे विदेशों से डॉक्टर्स आ रहे थे—यह सब उसकी दुनिया से बहुत परे था।
अज़ीम का टूटना:
ज़ारा जब अज़ीम के लिए महंगे होटल से खाना लाई, तो अज़ीम ने चुपचाप उसे किनारे रख दिया। उसका गला भर आया था। उसे लग रहा था कि वह यहाँ सिर्फ एक बोझ है।
अख्तर ने देखा कि अज़ीम का कंधा झुका हुआ है। वह उसके पास आया। "अज़ीम, कुछ खा लो। तुम कमज़ोर हो जाओगे तो ज़ोया का ख्याल कौन रखेगा?"
अज़ीम का फैसला:
अज़ीम धीरे से खड़ा हुआ। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी और टूटा हुआ स्वाभिमान था।
"अख्तर साहब," अज़ीम ने ज़मीन की तरफ देखते हुए कहा, "आपने और ज़ारा आपा ने जो कुछ भी किया, उसका एहसान मैं कभी नहीं उतार पाऊँगा। लेकिन... लेकिन यहाँ मेरा दम घुट रहा है। यह अमीरी, यह लाखों के खर्च, यह डॉक्टर्स की फौज... मुझे अहसास करा रहे हैं कि मैं ज़ोया की ज़िंदगी में कुछ भी नहीं हूँ। मैं एक मामूली इंसान हूँ जो अपनी पसंद की लड़की के इलाज के लिए एक सुई तक नहीं खरीद सकता।"
अख्तर कुछ कहना चाहता था, पर अज़ीम ने हाथ जोड़ लिए।
"आप लोगों ने मुझे इतना वक्त दिया, मुझे यहाँ रुकने दिया, वह आपकी बहुत बड़ी मेहरबानी थी। लेकिन अब मैं और बोझ नहीं बनना चाहता। मैं अपना इंतज़ाम खुद करूँगा। मैं बाहर किसी छोटी जगह पर रुकूँगा और वहीं से ज़ोया के लिए दुआ करूँगा। मेरी औकात इन आलीशान सोफों पर बैठने की नहीं है।"
अख्तर की खामोशी:
अख्तर, जो खुद एक बड़ा साम्राज्य चलाता था, अज़ीम की इस 'नफरत' को समझ पा रहा था—यह नफरत अमीरी-गरीबी के उस अंतर से थी जिसने अज़ीम के दिल को छलनी कर दिया था। अज़ीम को लग रहा था कि उसकी मोहब्बत इस पैसे के शोर में दब गई है।
अज़ीम ने अपना छोटा सा थैला उठाया और लड़खड़ाते कदमों से अस्पताल की उस चकाचौंध वाली रोशनी से दूर, अंधेरे गलियारे की तरफ चल दिया।
ज़ारा ने उसे रोकना चाहा, पर अख्तर ने उसे रोक दिया। "उसे जाने दो ज़ारा। एक मर्द के लिए उसकी इज़्ज़त-ए-नफ्स (Self-respect) से बढ़कर कुछ नहीं होता। वह टूट चुका है, और उसे खुद को समेटने के लिए अपनी ही ज़मीन की ज़रूरत है।