16: महा एपिसोड - रूह की पुकार
अस्पताल की छत पर आसमान अब साफ होने लगा था। बारिश थम चुकी थी, लेकिन हवा में अभी भी नमी और ठंडक थी। ज़ारा और अज़ीम अस्पताल के वेटिंग एरिया के एक कोने में बेंच पर बैठे थे। दोनों के चेहरों पर थकान थी, पर आँखों में एक सुकून था—उम्मीद का सुकून।
अज़ीम ने लंबी साँस लेते हुए कहा, "मैम, कादिर का खून शायद रंग लाएगा। पहली बार लग रहा है कि हारते-हारते हम जीत गए।"
ज़ारा ने धुंधली आँखों से अज़ीम की तरफ देखा, "अज़ीम, तुमने और तुम्हारे दोस्त ने आज जो किया है, उसने मेरी आँखों से रईसी का पर्दा हटा दिया है। ज़ोया खुशनसीब है कि उसे तुम जैसा..."
ज़ारा की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक आईसीयू (ICU) के अंदर से मशीनों के चीखने का शोर आने लगा। 'बीप-बीप-बीप' की आवाज़ इतनी तेज़ और डरावनी थी कि गलियारे में मौजूद हर शख्स के रोंगटे खड़े हो गए।
"ज़ोया!" ज़ारा पागलों की तरह शीशे की दीवार की तरफ झपटी। "डॉक्टर! जल्दी आइए! देखिए ज़ोया को क्या हो रहा है!"
गलियारे में अफरा-तफरी मच गई। नर्सें और डॉक्टर दौड़ते हुए अंदर घुसे। मशीनों पर लकीरें ऊपर-नीचे भाग रही थीं। अज़ीम की साँसें जैसे गले में अटक गईं। वह वहीं जम गया, उसके हाथ कांप रहे थे और दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। 'या खुदा, अब और इम्तिहान मत लेना,' उसने मन ही मन दुआ की।
करीब दस मिनट की उस खौफनाक हलचल के बाद, अंदर से एक डॉक्टर बाहर निकला। उसके चेहरे पर पसीना था, पर आँखों में एक चमक थी। "मिरैकल (चमत्कार)... ज़ोया मैम को होश आ रहा है!"
ज़ारा और अज़ीम बिना एक पल गंवाए अंदर दाखिल हुए। मिस्टर खन्ना भी पीछे-पीछे दौड़ते हुए आए।
ज़ोया की पलकें बहुत धीरे से हिलीं। उसकी आँखों में अभी भी धुंधलका था। उसने कमरे में मौजूद चेहरों को पहचानने की कोशिश की। ज़ारा ने उसका हाथ चूम लिया, "ज़ोया... देख मैं हूँ, तेरी दी।"
लेकिन ज़ोया के होंठ कुछ और ही ढूंढ रहे थे। उसकी कमज़ोर, कांपती हुई आवाज़ उस खामोश कमरे में गूँजी— "अ... अज़ीम... अज़ीम कहाँ है?"
अज़ीम, जो कोने में खड़ा खुद को छुपाने की कोशिश कर रहा था, उसके कदम खुद-ब-खुद बिस्तर की तरफ बढ़ गए।
"मैं यहीं हूँ साहिबा... मैं यहीं हूँ," अज़ीम ने उसका हाथ थाम लिया।
ज़ोया ने जैसे ही अज़ीम की आवाज़ सुनी, उसकी बंद होती आँखें पूरी तरह खुल गईं। उसमें एक अजीब सी तड़प और बेचैनी थी। वह बिस्तर पर ही उठने की कोशिश करने लगी और पागलों की तरह चिल्लाने लगी— "अज़ीम! अज़ीम! तुम ठीक तो हो ना? डैड ने तुम्हें... अज़ीम मुझे छोड़कर मत जाना!"
उसकी ये चीखें मिस्टर खन्ना के सीने में खंजर की तरह उतर रही थीं। ज़ोया को होश तो आया था, पर उसके होश में सिर्फ और सिर्फ अज़ीम का नाम था।
16: महा एपिसोड (भाग-2) - वादों की छाँव
ज़ोया की चीखें और उसकी बेचैनी पूरे आईसीयू में एक कोहराम मचा रही थी। वह अपनी कमज़ोर हालत के बावजूद बिस्तर से उठने की कोशिश कर रही थी, मानों उसे डर था कि अगर उसने पलक झपकाई तो अज़ीम फिर से उसकी पहुँच से दूर हो जाएगा।
अज़ीम ने बिना किसी झिझक के ज़ोया के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उसकी आँखों में बेइंतहा मोहब्बत और फिक्र थी।
"साहिबा! मेरी बात सुनिए... शांत हो जाइए," अज़ीम ने बहुत ही नरम आवाज़ में कहा, जैसे किसी बच्चे को सहला रहा हो। "मैं कहीं नहीं जा रहा। खुदा की कसम, मैं यहीं हूँ, आपके सामने। देखिए मुझे... मैं बिल्कुल ठीक हूँ।"
ज़ारा ने भी ज़ोया के माथे पर हाथ रखा और उसकी आँखों में झाँकते हुए बड़े प्यार से कहा, "ज़ोया, मेरी तरफ देख छोटी। अज़ीम यहीं है और मैं भी यहीं हूँ। अब तुझे किसी बात की फिक्र करने की ज़रूरत नहीं है। जब तक तू पूरी तरह ठीक होकर अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, हम में से कोई भी कहीं नहीं जा रहा।"
ज़ोया की उखड़ती साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। उसने नम आँखों से पहले ज़ारा को देखा और फिर अज़ीम को। "दी... सच कह रही हैं आप? डैड फिर से अज़ीम को..."
"कोई कुछ नहीं करेगा!" ज़ारा ने मिस्टर खन्ना की तरफ एक तीखी नज़र डालते हुए ज़ोया को यकीन दिलाया। "आज से वही होगा जो तू चाहेगी। मैं वादा करती हूँ तुझसे, अब तेरी मर्ज़ी के बिना इस कमरे की हवा भी नहीं बदलेगी। बस तू आराम कर, हमारे लिए... अज़ीम के लिए।"
अज़ीम ने ज़ोया के हाथ पर अपनी पकड़ थोड़ी और मज़बूत की, "जी साहिबा, अब सिर्फ सुकून होगा। आप बस आराम कीजिए, मैं यहीं बैठकर आपकी पहरेदारी करूँगा।"
अज़ीम और ज़ारा के इन शब्दों ने ज़ोया के दिल पर मरहम जैसा काम किया। उसकी आँखों में जो खौफ था, वह अब धीरे-धीरे नींद और सुकून में बदलने लगा। उसने अज़ीम का हाथ थामे-थामे ही धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं।
मिस्टर खन्ना दरवाज़े पर खड़े यह सब देख रहे थे। वह अपनी ही बेटी के लिए 'पराए' हो चुके थे। जिस ज़ोया को वह अपनी उंगलियों पर नचाना चाहते थे, आज उस पर सिर्फ ज़ारा का हक था और उसकी रूह पर अज़ीम का कब्ज़ा।
ज़ारा का बड़प्पन
ज़ोया अब गहरी और सुकून भरी नींद में थी। मशीनों की लय अब सामान्य थी और उसके चेहरे पर एक फीकी ही सही, पर चैन की मुस्कान थी। ज़ारा ने सुकून की एक लंबी साँस ली और कमरे के कोने में खड़े अज़ीम की तरफ देखा।
अज़ीम की हालत अभी भी वैसी ही थी—कीचड़ से सने कपड़े, नंगे पैर और चेहरे पर थकान की गहरी लकीरें। वह कल रात से भूखा-प्यासा ज़ोया के लिए मौत से लड़ रहा था।
ज़ारा उसके करीब आई और बहुत ही शालीनता से बोली, "अज़ीम... ज़ोया अब सो रही है। डॉक्टर ने कहा है कि वह अगले कुछ घंटों तक होश में नहीं आएगी। तुम एक काम करो, तुम पहले जाकर फ्रेश हो जाओ।"
अज़ीम ने मना करना चाहा, पर ज़ारा ने उसे बीच में ही रोक दिया। "नहीं अज़ीम, ज़िद मत करो। तुमने कल से बहुत तकलीफें झेली हैं। तुम्हारी हालत देखकर ज़ोया फिर से परेशान हो जाएगी। मैं अस्पताल के पास वाले गेस्ट हाउस में तुम्हारे रुकने और कपड़ों का इंतज़ाम करवाती हूँ। तुम नहा लो, कुछ खा-पी लो और थोड़ी देर आराम कर लो। अभी ज़ोया की देखभाल के लिए हमें तुम्हारी ताकत की ज़रूरत पड़ेगी। अगर तुम ही बीमार पड़ गए, तो उसे कौन संभालेगा?"
अज़ीम ने ज़ोया के सोते हुए चेहरे को देखा और फिर ज़ारा की ओर सिर झुकाकर बोला, "शुक्रिया मैम... मुझे खाने की भूख नहीं है, पर अगर आप कहती हैं तो मैं हाथ-मुँह धो लेता हूँ।"
"खाना तो तुम्हें खाना ही पड़ेगा अज़ीम," ज़ारा ने मुस्कुराते हुए कहा। "यह मेरा हुक्म है। जाओ अब।"
अज़ीम भारी कदमों से कमरे से बाहर निकला। मिस्टर खन्ना ने उसे गलियारे से गुज़रते देखा, पर इस बार उनकी ज़ुबान से एक लफ्ज़ भी नहीं निकला। ज़ारा का सख्त रवैया और ज़ोया की हालत ने उन्हें खामोश रहने पर मजबूर कर दिया था।
ज़ारा ने खिड़की से बाहर देखते हुए मन ही मन एक फैसला लिया। उसने समझ लिया था कि ज़ोया की ज़िंदगी की चाबी अज़ीम के पास है, और अब वह इन दोनों को अलग करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेगी।