🎇 " यादों का शहर " 🎇
वो ऐसे बिछड़े कि ख़्वाब में मिलते नहीं।
अब सूखे फूल भी किताब में मिलते नहीं।
ग़म-ए-यार कुछ इस तरह से छाया है कि,
ग़म भुलाने के रास्ते शराब में मिलते नहीं।
दिल में सदियों से छुपे कई सवाल हैं मगर,
उनके सवालात अब जवाब में मिलते नहीं।
दिलों में दर्द का दरिया उतर गया ऐसे कि,
खुशियों के निशान हिजाब में मिलते नहीं।
दिखावे की इस दुनिया में खो गए जो चेहरे,
वो सादगी वो अदब नक़ाब में मिलते नहीं।
बदल रहे हैं यहाँ यार, कपड़ों की तरह सब!
सच्ची वफ़ा के सलीके जनाब में मिलते नहीं।
चले हैं ढूंढने हम यादों के शहर में 'व्योम',
मगर बीते हुए दिन हिसाब में मिलते नहीं।
✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.