एक दिन यूँ ही...
जवाब नहीं मिला, तो सवाल कम कर दिए...
बात नहीं हुई, तो ख़याल कम कर दिए...
वक़्त नहीं मिला, तो इंतज़ार कम कर दिया...
अपनापन कम लगा, तो अधिकार कम कर दिया...
और जब समझ आया कि जगह माँगने से नहीं मिलती-
तो चुपचाप अपना हिस्सा भी छोड़ दिया।
अजीब नहीं था ये सफ़र, बस एक बात समझ आ गई-
जहाँ अपनापन माँगना पड़े, वहाँ थोड़ा दूर हो जाना बेहतर है...
जहाँ खुद को साबित करना पड़े, वहाँ खुद में लौट आना बेहतर है।
-Riddhi gori:(