जहां से बस लौट कर आती हो यादें
कविता
ऐ हमसफर मेरे
एसी जगह कभी मत जाना
जहां से बस लोट कर आती हो यादे
रासते कितनी भी कठिन क्यों ना हो
मंजिल कितने भी दूर क्यों ना हो
चाहे तो मुझसे दूर जाना
अपने मंजिल को पाने के लिए
और फिर लोट कर आ जाना
क्यों कि मैं इंतिजार करती रहूंगी तुम्हारी
जब तलक तुम लौट कर ना आ जाते तब तलक
ऐ हमसफर मेरे जाना मगर
कभी इतना दूर मत जाना टपक
जहा से बस लौटकर आती हो यादें
तुम बिना मेरे हाल देख
विदाई के बाद
कही ऐ अंतिम विदाई ना है
ऐ सोचकर मेरी होठों पर सवाल देख
ऐ हमसफ़र में
डर लग रहा है चूड़ियां तोड़ने से
डर लग रहा है
तुम बिन अकेली छोड़ जाने से
सिंगार उतरते ही
होंठ खामुस है
अंदर से मैं भी जल रही हूं चिताओं की तरह
बस जिंदा खड़ी हूं
तुम्हें जाते देखते हुए
ऐ मेरे हमसफ़र मेरे लौट आना
सफल के बाद फिर से पहले की तरह
कभी इतना दुर मत जा
जहा से बस लोट कर आती हो यादे
तुम कभी लौट कर आओगे
पहले की तरह मेरे साथ समय बिता होगे
इस वेकरारी मे मुझे तुमारा इतिजार रहे गा
ऐ मेरे हमसफ़र कुछ भी हो
फिर भी फिर लौटकर आना
ऑलविदा मुझे कभी मत कहना