खौफ़नाक मंजर...,,
तुफानी नदियां , दरकते पहाड़ नेपाल की धरती पर
वो मंजर नहीं खौफ़नाक तबाही का गहरा सदमा था |
क्षणभर में धरा ढह गई, मलबे के ढ़ेर में जीवन दब गया,
सदियों के सुंदर आशियानें तीनके के भांति बह गए |
हर तरफ़ बर्बादी के रूह कँपकँपाते करुण दृश्य थे |
बाहर पानी का जलजला था, भीतर गहरा सन्नाटा था |
हर एक दिलों में सिर्फ़ वो खौफ़ का काला पहरा था |
हर एक मासूम की पुकार में पीड़ा का गहरा घाव था |
पत्थर,पानी, माटी और टूटते पहाड़ने क्रूरता से प्रहार किया
सबकुछ सैकड़ोें ने ख़ूबसूरत सपनों को युंही उजाड़ दिया
न अब नींद का ठिकाना, बस आंखों में वही दृश्य का बसेरा ,
जाएं तो कहां जाएं कुदरत के आगे सब लाचार, बेबस थे |
अब पहाड़ खामोश हैं, नदियां अब भी सामने बहती हैं,
जो बरसों से जीवन की आधार थी, अब वह शून्य, स्तब्ध हैं।
बस वह गहन मंथन के लिए पीछे अनगिनत प्रश्न छोड़ गईं |
सर्वस्व विनाश करके इन्सान को भीतर से वो तोड़ गईं |
©®- शेखर खराड़ी
तिथि-३०/८/२०२६