Hindi Quote in Poem by prachi Gurjar

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यदि सीता इस युग में होतीं
कभी सोचती हूँ
 यदि सीता इस युग में होतीं
 तो क्या करतीं
क्या फिर गौरी की वंदना करतीं
 राम जैसा वर पाने को
 या प्रेम को समझने से पहले
 पूछतीं
 क्या मिलेगा इसे निभाने को
क्या फिर राजमहल छोड़कर
 वन की धूल अपनातीं
 काँटों को पथ का साथी करतीं
 और प्रेम को
 जीवन से ऊपर रख पातीं
क्या फिर अग्नि के सम्मुख
 अपने सत्य की परीक्षा देतीं
 या इस बार
 अपनी मौन पीड़ा को
 शब्दों में कह देतीं
कभी सोचती हूँ
 प्रेम का अर्थ कितना बदल गया है
कभी प्रेम था
 तो वन भी घर था
 कभी साथ था
 तो दुःख भी सुंदर था
सीता ने प्रेम में
 सुख नहीं माँगा था
 उन्होंने तो
 साथ माँगा था
और शायद
 यही प्रेम की सबसे कठिन परिभाषा है
किसी को पा लेना प्रेम नहीं
 उसके कठिन समय में
 उसके साथ खड़े रहना प्रेम है
महल मिल जाए तो साथ चलना सरल है
 प्रेम तो तब है
 जब काँटों भरे पथ पर भी
 मन कहे
यही मेरा घर है यही मेरा अपना है।
प्राची गुर्जर…..

Hindi Poem by prachi Gurjar : 112034933
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