अब एहसान भी एहसास पर भारी हो गए है,
लोग कहते हे हम आजकल अनाड़ी हो गए है।
कुछ तो बात रही होगी जो कभी बन नहीं सकी,
होश तब आया जबसे हम शराबी हो गए है।
रातों के ख्वाब मुक्कमल हो जरूरी नहीं अक्सर ,
हम भी पन्ने हरे रखने को स्याही उंडेल बैठे है।
आंखों के दरिया में कश्ती डाली बिना पतवार ,
हम भी अब से सांस रोकना सीख चुके है।
तू गर खुदा हो तेरा , तो हम भी अव्वल काफिर है,
दिल में काबा और ज़हन में गीता रखे हुए है।
मायूष हो या न हो अपनी ज़ुल्मियत से अपनी तुम ,
हम भी गिरेबान से तेरे सा शक्श मिटा चुके है।
आशियाने में फिर ना बस जाए और रोशन कर दे कोई,
इसलिए अब से हम हर दीवार हटाकर बैठे है।