बात जब जब चीख कर करता हूँ मैं,
तब बहुत छोटा नजर आता हूँ मैं ।।
मूढ़ सा मगरूर सा मजबूर सा,
आप ही में तो बड़ा बनता हूँ मैं ।।
बेवजह यूँ ही समय के चौक पर,
बस अकड़कर के खड़ा मिलता हूँ मैं ।।
सोच पर चिपकी हजारों चकतियां,
सोचता हूँ मैं बहुत उम्दा हूँ मैं ।।
यूँ उफनती हैं “विजय” की हसरतें,
खास से भी गैर सा लड़ता हूँ मैं ।।
“मैं” अरे मैं तो अहम् का बीज हूँ,
हर कहीं हर दौर में उगता हूँ मैं ।।
@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही
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