मैं क्या हूँ?
कैसे कहूँ मैं क्या हूँ?
एक उम्मीद हूँ, जिसकी जड़ें आज भी मज़बूत हैं,
मगर जिसका पूरा पेड़ उजड़ चुका है।
साल बीतते हैं, दिन बीतते हैं, रातें भी गुज़र जाती हैं,
मगर वह पेड़ अब भी अपनी उम्मीद की जड़ों को थामे बैठा है।
दर्द के उस सैलाब को समय के साथ सहता बैठा है।
अब जड़ें और वक़्त—दोनों एक साथ इंतज़ार कर रहे हैं
कि शायद उम्मीद का मौसम फिर लौट आए।
मगर मौसम भी जाने किस बात पर मुँह फेरे बैठा है।
जड़ें अपनी मज़बूती की कहानी कह रही हैं
और वक़्त, उन जड़ों के साथ मिलकर
एक अलग ही दास्तान लिख रहा है।
लेकिन दास्तान लिखते-लिखते
जड़ों में नाउम्मीदी अपना घर बनाने लगी है,
और जड़ें पहले से कहीं ज़्यादा कोशिश करने लगी हैं—
शायद खुद को टूटने से बचाने की।
पर क्या करें?
न पेड़,
न जड़ें,
न वक़्त,
और न ही वह मज़बूती
मौसम को वापस ला पा रही है।
उम्मीद के इस घर में
अब उम्मीद ही मेहमान बन गई है।
और उम्मीद
अपने ही घर में
नाउम्मीदी की किरायेदार बन गई है।
वक़्त मानो उसके लिए थम गया है,
मज़बूती ने भी उसका हाथ छोड़ दिया है।
जिस मौसम का इंतज़ार था,
अब वहाँ केवल गरजते हुए बादल हैं।
उस सुनहरी वसंत की धूप का
जड़ों ने इंतज़ार करना छोड़ दिया है,
और वक़्त ने भी अपना रुख़ मोड़ लिया है।
अब बस कुछ ख़ाली जड़ें हैं—
जो अपने ईमान को बचाए बैठी हैं।
और उनके भीतर
नाउम्मीदी के ख़िलाफ़
एक आख़िरी जंग अभी बाकी है।
- Fictional world