मैं और मेरे अह्सास
इश्क
इश्क को सरे आम जताया ना कर l
अपने अपनों को यूँ बताया ना कर ll
दुनियावाले कातिल नजरों से देखते हैं l
नजर लगेगी ख़ुद को सजाया ना कर ll
खुद को खुद की नजर लगती है तो l
खुशी से छलक के मुस्कुराया ना कर ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह