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Anup Gajare

Anup Gajare

@anupgajare819691
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"....रकीब...."

अगर कभी
तुम्हें किसी रकीब की आहट भी न मिले,

समझना -
तुम मुझसे गुज़र आए हो
कई बरस पहले।

उसने मुझे सिखाना चाहा था
कि प्रेम
हमेशा एकतरफ़ा करना चाहिए।

मैंने उसके लिए
कोई विकल्प नहीं छोड़ा।

मैंने कभी
यह पाठ सीखा ही नहीं,
फिर भी
उम्र भर
एकतरफ़ा प्रेम करता रहा।

मैं चाहता था,
मेरे भीतर का अँधेरा
एक आख़िरी बार उठे,
और मृत्यु तक की इस यात्रा में
मैं बस
उसके रकीब का नाम
भूल सकूँ।

अब मेरे पास
न आँधियाँ हैं,
न बिजली,
न काला पानी।

आँखों में जो कुछ था,
वह टीस से भी पहले
सूख चुका है।

फिर भी
मैं क्या खोजता फिरता हूँ?

उसका बेतरतीब अक्स
अब भी टँगा है
भीतर की अँधेरी दीवारों पर।

उसने मुझे
पिछली सदी में ही
अलविदा कह दिया था।

तब मैं झूठ बोल सकता था।

मैंने भी मुस्कराकर कहा था -

अलविदा।

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।। …टूटने का स्थान… ।।

चलो फिर टूटते हैं-
वहीं,
जहाँ कोई नहीं होता
यह बताने के लिए
कि तुम कमज़ोर हो।

जहाँ शोर नहीं,
सिर्फ़ भीतर का सच होता है,
और हर दरार
अपनी कहानी खुद कहती है।

डर-
जो धीरे-धीरे
नसों में पनपता है,
वही एक दिन
हिम्मत में बदल जाता है।

और नफ़रत-
जो हर बीज में बोई जाती है,
वह भी
कभी न कभी
थक कर गिर जाती है।

फिर बचता है-
सिर्फ़ एक इंसान,
जो टूटा जरूर है,
पर खत्म नहीं हुआ।

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।। …सुगंध का इनकार… ।।

कभी-कभी
सुगंध भी
सीधी राह नहीं चलती—

वह आती है
धीमे-धीमे,
मानो कोई पुरानी स्मृति
अपने ही अस्तित्व पर
प्रश्न कर रही हो।

वह महकती नहीं—
टकराती है,
नाक से नहीं,
मन के उस गहरे कोने से
जहाँ सड़ांध ने
घर नहीं,
अधिकार जमा रखा है।

और तब
सुगंध
सांत्वना नहीं देती—
वह विचलित करती है।

जैसे
कोई शांत चेहरा
अचानक पूछ बैठे—
“क्या सचमुच सब ठीक है?”

हम पीछे हटते हैं—
उससे नहीं,
उसके भीतर छिपे सत्य से।

क्योंकि
सड़ांध में जीना सरल है,
वह हमें
हमारी आदतों की सीमा में
सुरक्षित रखती है—

पर
सुगंध…

वह उस सुरक्षा को
धीरे-धीरे तोड़ती है,
बिना किसी शोर के।

मानो
भीतर कहीं
एक दीवार ढह रही हो,
और उसकी ध्वनि
केवल हमें सुनाई दे रही हो।

तब
नेत्र सजल नहीं होते—
वे ठहर जाते हैं,
जैसे जल भी
निर्णय कर रहा हो
कि बहना उचित है या नहीं।

और तुम—
तुम खड़े रहते हो
दो गंधों के बीच—

एक
जो तुम्हें यथावत बनाए रखती है,
और एक
जो तुम्हें परिवर्तित करना चाहती है।

यही
सुगंध का प्रतिरोध है—

वह
महककर नहीं,
असहज कर
अपना कार्य पूर्ण करती है।

— Anup Ashok Gajare

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।। …सूखे की देह में बचा हुआ मनुष्य… ।।

तुम
जब भी आते हो—
अपने साथ महुआ नहीं,
सूखे की एक लंबी दरार ले आते हो।

तुम्हारी हथेलियों पर
इमली नहीं होती अब,
बस उसकी खटास बची होती है—
जैसे जीवन
धीरे-धीरे अपने ही स्वाद से कटता जा रहा हो।

तुम कहते हो—
मराठवाड़ा में इस बार
बारिश आई थी थोड़ी-सी…
पर उस “थोड़ी-सी” में ही
पूरा एक अधूरा सावन छिपा होता है।

यहाँ
धरती खेत नहीं रही,
एक फटी हुई हथेली है—
जिसमें बीज नहीं,
बस इंतज़ार बोया जाता है हर साल।

कपास के फूल
अब सफ़ेद नहीं लगते,
वे किसी अधूरी चिट्ठी जैसे हैं—
जिसे किसान
हर मौसम में लिखता है
और हर बार
बिना जवाब के जला देता है।

तुम
जब ज्वार की बात करते हो,
तो लगता है—
हर दाने में
एक सूखी नदी की दरार है।

और उन दरारों के किनारे
बैठे हैं लोग—
जिन्होंने पानी से ज़्यादा
कर्ज़ का स्वाद चखा है।

फिर भी—
पोला आता है
तो बैल सजते हैं,
दीवाली आती है
तो मिट्टी के घरों में दीये जलते हैं।

जैसे
जीवन हार मानना नहीं जानता,
चाहे भीतर कितना भी सूखा क्यों न हो।

पर उसी रोशनी के पीछे
एक लंबी अँधेरी रात है—
जहाँ कई नाम
सुबह तक
ख़ामोश हो जाते हैं।

तुम कहते नहीं—
पर मैं जानती हूँ
कि अब
रस्सी और कीटनाशक
सिर्फ चीज़ें नहीं रहीं,
वे धीरे-धीरे
निर्णय बनती जा रही हैं।

और फिर
घोषित कर दी जाती है
“सामान्यता”—

जैसे
सब कुछ ठीक है,
जैसे
मरना भी
अब इस मिट्टी की आदत हो।

तुम लौटते हो—
खाली हाथ,
थकी हुई देह,
और आँखों में
उबलता हुआ पानी
जो बरस नहीं पाता।

तुम रोते नहीं—
क्योंकि यहाँ
आँसू भी
संभालकर रखने पड़ते हैं
अगले सूखे के लिए।

मैं तुम्हें रोकती नहीं—
बस इतना कहती हूँ—

उस सूखी धरती से कहना,
मैंने तुम्हें निहत्था भेजा है।

क्योंकि
यहाँ
हथियार सिर्फ बंदूक नहीं होते—

कभी-कभी
सूखा,
कर्ज़
और चुप्पी—
मिलकर
मनुष्य को
सबसे ख़तरनाक हथियार बना देते हैं।

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।। …समय के उस पार, जहाँ हम बचे रह जाते हैं… ।।

हम
अब भी मिलते हैं—
चाय के उन्हीं कपों के बीच,
जहाँ बातचीत नहीं,
आदतें बैठती हैं आमने-सामने।

तुम्हारे भीतर
अब भी एक ऋतु बची है—
हर साल
किसी नए नाम से लौट आती है,
जैसे मिट्टी
अपनी जली हुई स्मृतियों के बावजूद
बीज स्वीकार करना नहीं भूलती।

और मैं—
मैं उस मिट्टी का हिस्सा नहीं रहा,
मैं वह राख हूँ
जिसे हवा भी
छूने से पहले हिचकती है।

मेरे भीतर
उगने से पहले ही
हर संभावना
स्मृति बनकर जल उठती है।

तुम्हें वही जगहें प्रिय हैं—
वही मेज़,
वही पगडंडियाँ,
वही ठहरे हुए दृश्य—
जहाँ तुम हर बार बदलते हो,
पर दुनिया तुम्हें पहचानती रहती है।

और मैं…
मैं हर दृश्य से
थोड़ा-थोड़ा बाहर गिरता गया,
इतना कि अब
कोई भी जगह
मुझे पूरा स्वीकार नहीं करती।

हम फिर भी चलते हैं साथ—
घास के बीच,
उन पहाड़ियों की ओर
जहाँ हवा
पुराने शब्दों को भी
नई आवाज़ दे देती है।

तुम्हारा शरीर
अब भी पीड़ा से भरा है—
पर वह पीड़ा तुम्हें तोड़ती नहीं,
बस तुम्हारे भीतर
और गहरा फैल जाती है।

और मैं
धीरे-धीरे यह समझने लगा हूँ—

कि जीवन
सिर्फ जीने का नाम नहीं,
बल्कि बार-बार
मरकर लौट आने की एक आदत भी है।

कुछ लोग
हर बार जी उठते हैं—
सिर्फ फिर से मरने के लिए…

और कुछ—
एक ही बार मरकर
समय के उस पार
लंबे समय तक
चलते रहते हैं…
जैसे अपनी ही अनुपस्थिति को
जीते हुए।

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।। बचना ।।
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अब मेरे भीतर
कुछ भी हरा नहीं बचा,
तुम गए तो
जैसे सारी नदियाँ
रास्ता भूल गईं…
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|| यह सुंदर नहीं है — भीतर का तट ||
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ट्रेन
अब भी चल रही थी—
पर उस क्षण
कुछ मेरे भीतर उतर गया था,
जैसे कोई शब्द
अपना अर्थ बदल देता है
अचानक।

मेरे बगल में बैठा वह बच्चा
अब सिर्फ बच्चा नहीं था—
वह एक दर्पण था,
जिसमें
मैं पहली बार
अपनी आँखों की थकान देख रहा था।

समुद्र
बाहर फैला हुआ था—
अनंत, विशाल,
पर उसके “यह सुंदर नहीं है” के बाद
वह सिकुड़ गया
एक सवाल में।

कितनी बार
मैंने चीज़ों को सुंदर कहा है—
बिना देखे,
बिना महसूस किए,
सिर्फ इसलिए
क्योंकि शब्द तैयार थे
और मैं खाली।

वह बच्चा
अब खामोश था,
पर उसकी खामोशी
मेरे भीतर बोल रही थी—
जैसे कोई पुराना दरवाज़ा
धीरे-धीरे खुल रहा हो।

मैंने खिड़की से बाहर देखा—
पर इस बार
समुद्र नहीं दिखा,
दिखा
अपना ही प्रतिबिंब
जो हर लहर के साथ
टूट रहा था।

सुंदरता
शायद हमेशा से
वहाँ नहीं थी—
वह तो
हमारी सहमति में थी,
हमारे डर में,
हमारे उस आग्रह में
कि सब कुछ ठीक है।

और सच—
सच शायद उतना विशाल नहीं होता
जितना समुद्र,
पर वह गहरा होता है
इतना कि
एक छह साल का बच्चा
उसे बिना डरे कह देता है।

ट्रेन आगे बढ़ गई,
तट पीछे छूट गया,
पर वह वाक्य
अब भी मेरे साथ है—
जैसे कोई छाया
जो रोशनी से नहीं,
अंदर के अंधेरे से बनती है।

और अब
जब भी मैं कुछ देखता हूँ—
मैं ठहर जाता हूँ,
थोड़ा डरता हूँ,
और सोचता हूँ—

क्या यह सच में सुंदर है,
या
मैं फिर से
झूठ को नाम दे रहा हूँ।
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।। कोई आईना था? ।।
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मैंने कई बार
खुद को पुकारा—
नाम लेकर नहीं,
बस उस खालीपन से
जहाँ आवाज़ गिरकर
लौटती नहीं।

चेहरा
मेरे पास था शायद,
पर पहचान—
वह कहीं रास्ते में छूट गई,
जैसे भीड़ में
अपनी ही उँगली छोड़ देता है कोई बच्चा।

चाँद आज
फिर अलग-अलग जगहों पर टूटा पड़ा है—
कहीं बैंगनी सड़न की तरह,
कहीं पीला,
जैसे पुराने कागज़ पर पड़ी धूप,
और कहीं—
एक हरा,
जो आँखों में नहीं
सिर्फ डर में उगता है।

पर जो सफेद है—
वह कहीं नहीं दिखता।

शायद
सच्चाई हमेशा
दूर के छोटे कस्बों में मरती है,
जहाँ कब्रें
नाम नहीं रखतीं।

मैं
समय के अंदर चला गया था—
घड़ियाँ वहाँ पेड़ थीं,
और हर सेकंड
एक पत्ता बनकर
मेरे कंधों पर गिर रहा था।

मैंने एक घंटा सुना—
वह प्रेम नहीं था,
वह ठंड थी,
इतनी गहरी
कि धड़कन भी
अपने अर्थ भूल जाए।

हवा
आज कुछ लेकर नहीं आई—
वह गर्भवती थी
पर जन्म नहीं हुआ,
बस छायाएँ थीं
जो आधी बनीं
और वहीं सड़ गईं।

एक चिड़िया गा रही थी—
या शायद
वह सिर्फ
मेरे अंदर की गूँज थी,
जो बाहर आकर
अपने ही अस्तित्व पर शक कर रही थी।

मैंने आईने ढूँढे—
पर जो मिला
वह सिर्फ प्रतिबिंब का भ्रम था।

मेरी अंगूठी—
वह कभी थी ही नहीं,
फिर भी
उसका खोना
इतना सच्चा क्यों लगा?
क्या हम
सिर्फ उन्हीं चीज़ों के लिए रोते हैं
जो नहीं होतीं?
क्योंकि जो होती हैं—
वे सह ली जाती हैं।

तुम—
शायद मिली थी,
या मैं ही
तुम्हें गढ़ता रहा
अपने भीतर के खाली हिस्सों से।

तुम्हारे बाल
किसी समय-नदी की तरह थे,
और मैं
हर लहर में
अपनी ही डूबन देखता रहा।

हम
पास थे—
इतने कि साँसें टकराती थीं,
पर पहचान—
वह दोनों के बीच
मर चुकी थी।

मेरे भीतर
कुछ रेंगता है—
वह दर्द नहीं,
वह याद भी नहीं,
वह कुछ ऐसा है
जो हर पुराने स्पर्श पर
जाग जाता है।

और तुम कहती हो—
"हम अभी पैदा नहीं हुए।"
तो यह सब—
यह स्पंदन,
यह टूटना,
यह खोज—
किसकी है?

मैं
हर शाम
खुद को खत्म करता हूँ,
और हर सुबह
कोई और
मेरे भीतर जागता है।

लोग
मेरे सीने से गुजरते हैं—
जैसे मैं कोई रास्ता हूँ,
कोई ठहराव नहीं।

सब कुछ
फैल गया है—
दिशाएँ, अर्थ, स्मृतियाँ—
सब एक चौराहे में
घुल गए हैं।

और अंत में
कुछ भी नहीं बचा
सिवाय इस एहसास के—
कि
आईना न मिलना
एक हादसा नहीं था।

वह एक संकेत था—
कि
जो मैं ढूँढ रहा था,
वह देखने की चीज़ नहीं थी।
वह
शायद
कभी था ही नहीं।
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Anup Ashok Gajare

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|| बचा हुआ — विस्तार ||
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हम गहरे नीले रंग के उस कमरे में रहते हैं
जहाँ दीवारें सिर्फ दीवारें नहीं,
अंतर की नमी से भीगी हुई स्मृतियाँ हैं—
और छत पर टंगा सन्नाटा
धीरे-धीरे श्वास लेता है।

पुंज-पुंज आलोक
सरस्वती की ध्वनि की तरह नहीं,
बल्कि उस अधूरे उच्चार की तरह है
जो जन्म लेने से पहले ही
मन की शिराओं में बहने लगता है—
एक ऐसा संगीत
जिसे कोई सुनता नहीं,
फिर भी सब उसी में डूबे हैं।

बाहरी दुनिया और भीतरी दुनिया के बीच
अब कोई रेखा नहीं बची—
रेखाएँ थीं भी तो
हमने उन्हें छू-छूकर मिटा दिया,
या शायद वे खुद ही
हमारी उपस्थिति से लुप्त हो गईं।

सब अपने हैं—
पर यह अपनापन
भीड़ का नहीं,
एक गहरे अकेलेपन का विस्तार है,
जहाँ हर चेहरा
हमारी ही छाया का दूसरा रूप बन जाता है।

रोग, शोक, मृत्यु—
क्या वे सच में हमें छूते नहीं?
या हमने ही
अपने स्पर्श को इतना भीतर खींच लिया है
कि बाहरी आघात
अब सतह तक पहुँच ही नहीं पाते?
गुलाब की पंखुड़ियाँ
अब रंग नहीं छोड़तीं,
रजनीगंधा की खुशबू
सिर्फ एक स्मृति बनकर रह गई है—
जैसे किसी पुराने जन्म की
भूली हुई भाषा।

दर्द और खुशी—
ये दो नहीं,
एक ही वृत्त के
अलग-अलग बिंदु हैं
जो निरंतर घूमते हुए
हमारे भीतर
एक ही केंद्र की ओर लौटते रहते हैं।

हमारा मर्म—
कोई स्थिर सत्य नहीं,
बल्कि एक शिल्प है
जिसे हम हर क्षण
थोड़ा-थोड़ा काटते, घिसते, तराशते हैं—
और अंत में
वही हमें गढ़ देता है।

हमने यह तय किया था—
बिना किसी संवाद के,
बिना किसी साक्षी के—
कि जीवन को
ऐसे ही बहने देंगे,
जैसे एक नदी
अपना मार्ग खुद ही भूल जाए
और फिर भी
समुद्र तक पहुँच जाए।

किसी से पूछा नहीं—
क्योंकि प्रश्नों में
हमेशा एक बाहरी दृष्टि होती है,
और हमने
अपने भीतर की दृष्टि को ही
एकमात्र सत्य मान लिया।

यह सब लेकर
बीत जाएगा हमारा जीवन—
धीरे-धीरे,
बिना किसी उद्घोष के,
जैसे समय
अपने ही पदचिन्हों को
मिटाता हुआ चलता है।

गहरा नीला रंग—
अब एक रंग नहीं,
एक अवस्था है,
जहाँ प्रकाश भी
अंधकार के भीतर जन्म लेता है।

और सरस्वती का वह संगीत—
अब शब्दों में नहीं,
बल्कि उस मौन में बसता है
जहाँ कुछ भी कहा नहीं जाता,
पर सब कुछ
सदैव कहा जा चुका होता है।
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Anup Ashok Gajare

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