Quotes by Anup Gajare in Bitesapp read free

Anup Gajare

Anup Gajare

@anupgajare819691
(2k)

"…होड़दार..."

और फिर तू छूट जायेंगी
इन्हीं गलियों से
आहिस्ता से फूलों सजी हुई कार
निकल पड़ेंगी
वेखूगा तुझे भीड़ के बीच खड़े-खड़े
न तब सिर्फ वेखने के सिवा कोई काम बचेगा।

और फिर तू छूट जाएंगी
होगे यार के कूचे खाली
गालियां दी सड़के उदास।

पता भी तो बदल जाएगा तेरा
फोन नंबर नहीं चलेगा जो मैंने
तुझे दिया था
तू नहीं होगी तब जलता सूरज
मुझे देगा खबर की आज वे फिर
एक बार धूप में चले थे,

चंदा अपनी नरम शीतलता
बिछाएंगा वहां भी जहां कभी
तुम्हारे कदम नदी की तरह मूड जायेंगे।

और फिर तू छूट जाएंगी
बालों में उंगलियां फेरते हुए
जब भी आयेंगी याद मेरी
उन क्षणों में
देखना तुम हवा में बसी सांसे मेरी
पहुंचे जाएंगी तुम तक
तुम्हारे लिया तुम्हारा हाथ थाम लूंगा मैं,

न जाने कितनी बातें करूंगा तुम से
तुम्हारी बातें जो कभी कर न पाए
गलियारे में खड़े रहकर।

देखा था सपना की
अपनी ही गली में रस्ते पर खड़े
देखूंगा तुम्हें मेरे घर की गैलरी में तुम्हें बाल सुखाते हुए,
बारिश होते हुए।

सोचा न था कि इस कदर
तू छूट जाएंगी
सजी हुई कार में तुम्हारा मृतदेह मैं देखूंगा भीड़ में खड़े रहते हुए।

इसी छूट जाने से मुझे अब ईर्ष्या हो रही है
यह जो छूटना है वह हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा
साथ रहेगा मेरा होड़दार बनकर।

Read More

"…ठहरी हुई सी..."

एक आसमान की छत नीली
एक तेरे बालों की छांव
क्या चाहिए पूछो मुझे।

जो भी मिला,
न मिला जो
उससे कहीं ज्यादा ही था।

यू ही सिर रखे
गोद में तेरी देखता रहूं
तुम्हें पढ़ते हुए
मेरी ही किसी किताब का पन्ना
यकीन मानो हर पन्ने में
तुम्हें ही बोया गया है
मतलब तुम मेरी किताब नही
बल्कि खुद को पढ़ रही हो।

कितनी किताबें पढ़ती हो तुम
फुर्सत मिली है
तो और खो जाना इन कागजों में
कोई शिकायत नहीं मेरी
मुझे क्या मैंने तो मुहब्बत की है
तुम्हारे हिस्से की तुम
मुझे जितनी मिली हो
उतनी काफी हो।

गार्डन ईडन में
भी बांध लेते हैं
शब्द तुम्हें अपने जंजाल में

हर अक्षर,मात्रा
लोम - विलोम बस तुम से ही शुरू होते है
मेरा कोई व्याकरण नहीं है
हो तुम
हैं ये पल इसलिए
बस इसीलिए ये प्रवाह ठीक है

जो तुम नहीं
तो हार से भी गहरा कुछ
उतर आता है भीतर
लिखने लगता हू मैं
उतारने लगता हु वाक्यों में तुम्हें ही।

ए....

कभी मुड़कर मत देखना मुझे
क्योंकि गार्डन का श्रापित हिस्सा
हम सब के भीतर सुलगता रहता है

यह ईडन गार्डन भार दिया गया है
मंत्रों से।

क्या कभी तुम किताब से परे
जो दुनिया है उसे देखोगी
मैं लेकर जाऊंगा कभी तुम्हें वहां

पर अब नहीं
अभी तो बहुत देर रुकना है हमें यही

तुम किताब पढ़ोगी
गोद का तेरे सिरहाना
मैं तकता रहूंगा
यू ही
बस यू ही।

पर नहीं रह सकते यहां ज्यादा देर तक
तुम्हें पहले जाना होगा
तब हाथ छूटेगा
या मैं पहले जाऊ
तब भी हाथ छूटेगा।

इसकी मिट्टी पर ईव्ह
के कीमती आंसू गिरे है
अदम करता है उन्हीं के भरोसे खेती यहां।

कोई नहीं रह सकता
इस जगह की तरह
बस जगह ही रह जाती है
एक जगह।

सोहनी ने इसी मिट्टी के घड़ों पर
उकेरे है न जाने कितने चित्र

मैं भी तुम्हें
देखता हु उसी किसी चित्र की तरह।

अब किताब रख दो
यहां के पेड़ काटकर ही तैयार किए है
उसके पन्ने।

प्रेम,
किताब,
गार्डन,
मैं,
और तुम हम सब एक ही
डोर से बंधे हैं।

क्या तुम जा रही हो
ओह...

मैं तो भूल ही गया था
की ईश्क में बस मृत्यु ही मिलती है
मोक्ष नहीं।

तो चली जाना
वहां किताबें नहीं होगी

मैं आऊंगा
और लिखूंगा
फिर से तुम्हें
और तुम तब पढ़ोगी

जन्म और मृत्यु के
बीच बनी ये जगह ही
हमेशा मेरा होड़दार बनी रहेंगी।

इससे ज्यादा मुहब्बत
में ठहरी हुई रकीबियत
कही भी न हो।

Read More

"...ओ साजना..."

क्यों नहीं आए तुम पहले
जब शाम हो रही थी
सूरज टूट रहा था
बिखर रहा था
डूब रहा था बारिश में

क्या तभी तुम्हें दस्तक देनी थी?

प्रभात देखी है तुमने
मौसम कुछ अलग होता हैं
रौशनी पेड़ो के झुरमुट से
छलनी नहीं हो रही होती है
बल्कि आ रही होती है छलकर
आहिस्ता दबे पांव -
पिंजरे में कैद चिड़िया की तरह नहीं
वह गाती है मधुर विरह में गहराई से।

हां, तुम्हें उन दिनों ही आ जाना चाहिए था
जब उन्स की बूंदे बदन पर प्रेम लिखती थी।

पर आ ही गई हो न तुम
मैं तो अब भी तुम्हारे कूचे के
किसी किराना दुकान पर घंटों सिगरेट पीता
खड़ा रह सकता हु
उठे धुएं में तुम्हारे घर को उतनी ही देर निहार सकता हु
जितना उन दिनों देखा करता था
जब तुम थी; कही गई नहीं थी।

जामुनी सारी में किसी लकड़ी के ठेले पर
मुझे देखते हुए तुम
चाय का एक-एक घुट पीया करती थी।

क्या मेरी वह चूड़ियां
तुमने संभालकर रखी है
बैंक के किसी लॉकर में
या उन नजरों से छुपाकर
जो नजरे जानती थी
की तुम मुझे सिर्फ जानती नहीं हो जान।

और वह पायल?
अरे हां, कितनी मीठी याद है वो
जब तुम्हारे पैर मैले न हो
इसलिए तुमने मेरे हाथों पर
अपना मुलायम पांव रखा था
उसी दिन तो मैंने तुम्हें वह पायल पहनाई थी
अपने हाथों से।

ये वही मनहूस दिन था
तुम्हारे भाई ने मुझे देख लिया था
पायल पहनाते हुए,

और उसी दिन से
शाम होने लगी
सूरज टूटने लगा
बिखरने लगा ही था बारिश में -

के तुमने दस्तक दी
फिर एक बार
और मैं चल पड़ा
मचल पड़ा फिर एक बार।

अब तुम देखना प्रभात
ऊषा का मौसम ही कुछ अलग होता हैं
लेकिन अब पेड़ो के झुरमुट से नहीं
बल्कि आ रही है तुम्हारे हिस्से के हर रंध्र से।

मैं सतर्क हु
क्योंकि अब वे आंखे ज्यादा पैनी हो गई हैं
चुभने लगी है उनकी आंखों में तुम्हारी पायल।

आहिस्ता दबे पांव
कुछ भी हो सकता हैं
क्योंकि यहां लड़की के पैदा होते ही
उसके लिए सोने का पिंजरा तैयार किया जाता है।

कल तुमने मुझसे पूछा था कि
क्या मैं अब भी तुम्हारे साथ हु
और मैंने कुछ भी न सोचते हुए
हां, में सिर हिला दिया था

कुछ भी न सोचते हुए
अनकहे ही महसूस करते हुए
सामनेवाले को पढ़ लेना ही प्रेम है।

Read More

"…दो महीने का रक़ीब..."

ये जहां खत्म होने से पहले
मैं जाना चाहता हु वहां
उसी दुनिया के अंतिम छौर पर,

जिस कायनात में
थे पुराने ढर्रे के मंदिर
मुंह से बोले गए जुटे मंत्र

और तुम!

जीर्ण काले पत्थरों के घाट की
किसी पायदान पर बैठी
सामने बहती बेनाम सी नदी।

साथ हर तरफ लगे हुए
चातुर्मास के मेले,

आंगन में रंगोली बनाती तुम
बिखरे रंग सिमटकर उन्हें
अलग-अलग भाषाओं में
बुन देती आई हो हमेशा
जैसे बनाती हो दो दुनियाओं के
बीच कोई बेगाना सेतू।

फिर पूछती हो
रंगोली बनाते
या पत्थर पर बैठे हुए
की तुम कहानीकार हो
तो सुबह की हल्की बारिश में
छिड़क दो अपनी कहानियां,

सोनी महीवाल की
हिर रांझा की
लैला मजनू की
कोई भी कहानी सुना दो
जो हजार बार सुन चुकी हु
तुम्हारे मुंह से
लेकिन कितना भी सुनो कहानियां
कभी पुरानी या जुटी नहीं होती
मंदिरों या मंत्रों की तरह।

जितने भी नाम गिनाए
तुमने हर उस पन्ने पर औरत का नाम
पहले आता है

क्योंकि प्रेम ही औरत होना है
मर्द तो बस कर सकता है इबादत

जैसे अपनी ही लैला में
खोए हुए मजनू ने नमाज पढ़ते
लोगों के दिलों में चिल्लाते हुए डाली थी खलन

हां, यही कारण था
उसे पत्थरों से नवाजा गया

तो तब क्या कहा था उसने
उन नमाजियों को?

अपना हाथ ठूड्डी पर रखते हुए
सिर को हल्का सा झुकाकर
वह मेरी तरफ देखते हुए
व्याकुलता से पूछती है

तो तब मजनू ने क्या कहा था?

और मैं देखता हु
आसमान की तरफ जिसमें असंख्य छेद थे
हल्की बूंदे बारिशी शॉवर की तरह टपक रही थी
पायदान के काले पत्थर चमक रहे थे
शायद इन पत्थरों के ही पूर्वज
मजनू को किसी वास्तविकता की तरह
लगे हो जोर से।

तो मजनू के बदन से खून बहता रहा
उसके देह का हर एक कोना
कर दिया गया था छन्नी
फिर भी बहते हुए सुर्ख लहू में
बस दो ही अक्षर थे

लै... ला... लै... ला...
लै... ला... लै... ला...

चेहरे की हर सिलवट में जरा भी गुस्सा नहीं था
क्यों हो प्रेम का प्रतिशब्द नहीं होता है नफरत
या तिरस्कार...
प्रेम का विलोम होता है अहंकार
उसी अंह के गर्भ में दबा होता है गुस्सा

तो जहां प्रेम हो
वहां अंहकार ही नहीं
तो फिर कैसे आता मजनू को गुस्सा
उन नमाजियों पर

उसने बस उन्हें कहा इतना कि
मैं... मैं... तो अपने माशूक में खोया हुआ था
मुझे आप इबादत में गढ़े हुए दिखाई नहीं दिए
इस चिल्लाया
पर आप भी तो अपने माशूक में खोए हुए थे
फिर आपको मैं कैसे सुनाई दिया?

कहानी खत्म करते हुए
मैंने उसकी तरफ देखा
उसने मेरे लिए सप्तरंग में डूबा
छाता खोल दिया था

शॉवर से पानी के पत्थर
अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे

फिर उसने पूजा की थाल उठाई
जिसमें रंगोली भी थी
पुराने ढर्रे के मंदिरों के लिए
वह थाल समर्पित थी
साथ अर्पित थे चातुर्मास के ये उसके दो महीने भी

मैं खफा था कि
मुझे पूरे साल में उसके बस दस महीने मिलते है

पूरे दो मास
वह नहीं रहती मेरी कभी
वह सबकुछ भूल जाती है
जो आसमान में छेद करते हुए
शॉवर चालू करता है
ये दो महीने वह बस उसकी होती है

और मैं जलता
या ईर्ष्या नहीं करता हु उससे

इसीलिए ये जहां खत्म होने से पहले
मैं जाना चाहता हु वहां
उसी दुनिया के अंतिम छौर पर,

जहा दो मास मेरे महबूब को
उसके लिए मिले
मेरी कोई खलन ना हो

वह अपनी इबादत में डूबी रहे
और मैं बैठा रहूं तीसरी पायदान मुहब्बत पर ही
उसे पांचवीं पायदान पर बैठे बेनाम सी नदी को देखते हुए

मैं उस सेतु पर चलता जाऊ
जो उसने अपनी रंगोली में पिरोया था।

क्योंकि ये दो महीने
रब ही मेरा रकीब रहेगा

Read More

"…नहीं सुनती हो ना..."

सुनो...
इश्क बेपनाह है तुमसे
अपने होने का अहसास तक खो जाता हु
जब काले लहराते जंगल की गुत्थी सुलझाने
लग जाता हु

नहीं सुनती तुम
शर्मा के चेहरे पे हथेलियां रख देती हो
हाथों के उन मुलायम स्पर्श भरे तलुवु से
मुझे न जाने कितनी जलन महसूस होती है

सच में
रस्सी पर सूखते
पीले, लाल, गेरूए,
कपड़ो को,
या चूड़ियों की खनक को भी
मैं अपना रकीब समझ लेता हु
वे भी तो छू पाते है तुम्हें
जिसकी कल्पना में मैं डूब के पार हो जाता हु।

सुनती कहां हो तुम
मेरे रकीब न जाने कितने
देखो हंसों मत
कसम से कहता हु
उन रकीबी के नाम मैं सहता हु

ये बहती हवा
जो तुम्हें सुकून सा देती है
रकीब है मेरी,

आसपास फैली हरी घास
अपनी रकीबियत दिखाती हैं मुझे
क्या वे भी मुझसे उतनी ही ईर्ष्या करती होगी
जितनी मैं उससे करता हु,
जब मैं तुम्हारे केसों के वन में अपना रास्ता भूल जाता हु।

सुना न तुमने
अब छोड़ो मुझे ये बाल संवारने है
वही इश्क बेपनाह करते हुए
न जाने कितने जन्म आगे
लेने या अब मरने है

रात में बाल्कनी में आ जाना तुम
हिर की तरह न छोड़ जाना तुम
काजी क्या ही बिगाड़ लेगा
लेकिन एक दिन सबको पता चल ही जाएगा
की तुम सुनती नहीं हो
की मैं इश्क बेपनाह करता हु तुमसे
की इंतजार अब भी बाकी है
अब छोड़ो मुझे सवार दी है चोटी तुम्हारी
अपने हिस्से का उजास देकर
छिन लिया है इस जंगल का अंधकार

पक्का सुन लिया तुमने
और समझ भी गई तुम कि,
अब देर नहीं होगी
जाता हु मैं, बाल्कनी में राह तकना मेरी
जाना ही होगा मुझे
मेरा रकीब जो आता होगा।

Read More

"...शक..."


वह आज भी आई थी
गुलाबी फूलों का सलवार पहने।

हमेशा की तरह चलते हुए
भींची मुट्ठियां जिनमें
पता नहीं क्या भरा हुआ रहता है

डर?

नहीं, वह डरपोक नहीं है
पर लड़की है

लड़की जिसे मैं कबूल कर चुका हु
एक तरफा
उसने भी कबूल किया है
एक तरफा

हम बोलते नहीं
शब्द
बिना शब्द, अक्षर वाक्य बुने भी
बहती रहती है मुहब्बत हवा में।

तो आज उसे क्या हुआ
निगाहों में इतनी बेचैनी क्यों है?

कही किसी नुक्कड़ पर
या चाय के ठेले से
सिसकती गलियों में दुबके हुए
कोई दूसरा उसे चाह तो नहीं रहा
एक तरफा....

*****

Read More

"....रकीब...."

अगर कभी
तुम्हें किसी रकीब की आहट भी न मिले,

समझना -
तुम मुझसे गुज़र आए हो
कई बरस पहले।

उसने मुझे सिखाना चाहा था
कि प्रेम
हमेशा एकतरफ़ा करना चाहिए।

मैंने उसके लिए
कोई विकल्प नहीं छोड़ा।

मैंने कभी
यह पाठ सीखा ही नहीं,
फिर भी
उम्र भर
एकतरफ़ा प्रेम करता रहा।

मैं चाहता था,
मेरे भीतर का अँधेरा
एक आख़िरी बार उठे,
और मृत्यु तक की इस यात्रा में
मैं बस
उसके रकीब का नाम
भूल सकूँ।

अब मेरे पास
न आँधियाँ हैं,
न बिजली,
न काला पानी।

आँखों में जो कुछ था,
वह टीस से भी पहले
सूख चुका है।

फिर भी
मैं क्या खोजता फिरता हूँ?

उसका बेतरतीब अक्स
अब भी टँगा है
भीतर की अँधेरी दीवारों पर।

उसने मुझे
पिछली सदी में ही
अलविदा कह दिया था।

तब मैं झूठ बोल सकता था।

मैंने भी मुस्कराकर कहा था -

अलविदा।

Read More

।। …टूटने का स्थान… ।।

चलो फिर टूटते हैं-
वहीं,
जहाँ कोई नहीं होता
यह बताने के लिए
कि तुम कमज़ोर हो।

जहाँ शोर नहीं,
सिर्फ़ भीतर का सच होता है,
और हर दरार
अपनी कहानी खुद कहती है।

डर-
जो धीरे-धीरे
नसों में पनपता है,
वही एक दिन
हिम्मत में बदल जाता है।

और नफ़रत-
जो हर बीज में बोई जाती है,
वह भी
कभी न कभी
थक कर गिर जाती है।

फिर बचता है-
सिर्फ़ एक इंसान,
जो टूटा जरूर है,
पर खत्म नहीं हुआ।

Read More

।। …सुगंध का इनकार… ।।

कभी-कभी
सुगंध भी
सीधी राह नहीं चलती—

वह आती है
धीमे-धीमे,
मानो कोई पुरानी स्मृति
अपने ही अस्तित्व पर
प्रश्न कर रही हो।

वह महकती नहीं—
टकराती है,
नाक से नहीं,
मन के उस गहरे कोने से
जहाँ सड़ांध ने
घर नहीं,
अधिकार जमा रखा है।

और तब
सुगंध
सांत्वना नहीं देती—
वह विचलित करती है।

जैसे
कोई शांत चेहरा
अचानक पूछ बैठे—
“क्या सचमुच सब ठीक है?”

हम पीछे हटते हैं—
उससे नहीं,
उसके भीतर छिपे सत्य से।

क्योंकि
सड़ांध में जीना सरल है,
वह हमें
हमारी आदतों की सीमा में
सुरक्षित रखती है—

पर
सुगंध…

वह उस सुरक्षा को
धीरे-धीरे तोड़ती है,
बिना किसी शोर के।

मानो
भीतर कहीं
एक दीवार ढह रही हो,
और उसकी ध्वनि
केवल हमें सुनाई दे रही हो।

तब
नेत्र सजल नहीं होते—
वे ठहर जाते हैं,
जैसे जल भी
निर्णय कर रहा हो
कि बहना उचित है या नहीं।

और तुम—
तुम खड़े रहते हो
दो गंधों के बीच—

एक
जो तुम्हें यथावत बनाए रखती है,
और एक
जो तुम्हें परिवर्तित करना चाहती है।

यही
सुगंध का प्रतिरोध है—

वह
महककर नहीं,
असहज कर
अपना कार्य पूर्ण करती है।

— Anup Ashok Gajare

Read More