"...ओ साजना..."
क्यों नहीं आए तुम पहले
जब शाम हो रही थी
सूरज टूट रहा था
बिखर रहा था
डूब रहा था बारिश में
क्या तभी तुम्हें दस्तक देनी थी?
प्रभात देखी है तुमने
मौसम कुछ अलग होता हैं
रौशनी पेड़ो के झुरमुट से
छलनी नहीं हो रही होती है
बल्कि आ रही होती है छलकर
आहिस्ता दबे पांव -
पिंजरे में कैद चिड़िया की तरह नहीं
वह गाती है मधुर विरह में गहराई से।
हां, तुम्हें उन दिनों ही आ जाना चाहिए था
जब उन्स की बूंदे बदन पर प्रेम लिखती थी।
पर आ ही गई हो न तुम
मैं तो अब भी तुम्हारे कूचे के
किसी किराना दुकान पर घंटों सिगरेट पीता
खड़ा रह सकता हु
उठे धुएं में तुम्हारे घर को उतनी ही देर निहार सकता हु
जितना उन दिनों देखा करता था
जब तुम थी; कही गई नहीं थी।
जामुनी सारी में किसी लकड़ी के ठेले पर
मुझे देखते हुए तुम
चाय का एक-एक घुट पीया करती थी।
क्या मेरी वह चूड़ियां
तुमने संभालकर रखी है
बैंक के किसी लॉकर में
या उन नजरों से छुपाकर
जो नजरे जानती थी
की तुम मुझे सिर्फ जानती नहीं हो जान।
और वह पायल?
अरे हां, कितनी मीठी याद है वो
जब तुम्हारे पैर मैले न हो
इसलिए तुमने मेरे हाथों पर
अपना मुलायम पांव रखा था
उसी दिन तो मैंने तुम्हें वह पायल पहनाई थी
अपने हाथों से।
ये वही मनहूस दिन था
तुम्हारे भाई ने मुझे देख लिया था
पायल पहनाते हुए,
और उसी दिन से
शाम होने लगी
सूरज टूटने लगा
बिखरने लगा ही था बारिश में -
के तुमने दस्तक दी
फिर एक बार
और मैं चल पड़ा
मचल पड़ा फिर एक बार।
अब तुम देखना प्रभात
ऊषा का मौसम ही कुछ अलग होता हैं
लेकिन अब पेड़ो के झुरमुट से नहीं
बल्कि आ रही है तुम्हारे हिस्से के हर रंध्र से।
मैं सतर्क हु
क्योंकि अब वे आंखे ज्यादा पैनी हो गई हैं
चुभने लगी है उनकी आंखों में तुम्हारी पायल।
आहिस्ता दबे पांव
कुछ भी हो सकता हैं
क्योंकि यहां लड़की के पैदा होते ही
उसके लिए सोने का पिंजरा तैयार किया जाता है।
कल तुमने मुझसे पूछा था कि
क्या मैं अब भी तुम्हारे साथ हु
और मैंने कुछ भी न सोचते हुए
हां, में सिर हिला दिया था
कुछ भी न सोचते हुए
अनकहे ही महसूस करते हुए
सामनेवाले को पढ़ लेना ही प्रेम है।