"दृढ़ संकल्प का सार"
मन की दुर्बलता छिद्रों भरी,
रोज उठते नए फैसले बार-बार।
रात भर कल्पनाओं में डूबे रहे,
सुबह खाली हुई फिर से धार-धार।
रोज बनते बिगड़ते हैं सारे नियम,
विश्वास खुद पर ही ढीला पड़े।
लगने लगता है व्यर्थ हर एक वचन,
जब इरादों के आगे तूफान खड़े।
मत करो कभी तुम बड़े संकल्प को,
जो टूटकर हीनता रोज़ लाए।
छोटे-छोटे नियमों को साधो जरा,
सफलता की सीढ़ी वही चढ़ाए।
जो हर बार की ठोकर से थक गया,
एक छोटे से प्रण पर अडिग रह गया।
मिटा के मन की सारी बेचैनियों को,
हारा हुआ इंसान फिर से उठ खड़ा हुआ।
- Rohit Kumar