न्याय की ख़ोज 🥀
चल पड़ा हूँ एक सफ़र पर,
सच की ज्योति साथ लिए,
झूठ की गहरी परछाइयों में,
न्याय की उम्मीद हाथ लिए।
हर मोड़ पर प्रश्न खड़े हैं,
हर उत्तर थोड़ा मौन,
फिर भी मन कहता है मुझसे—
सच का होगा एक दिन कौन?
धन-दौलत की ऊँची दीवारें,
कब तक सच को रोकेंगी?
अंततः न्याय की किरणें,
हर अँधियारा चीरेंगी।
न्याय केवल फ़ैसला नहीं,
मानवता का सम्मान है,
जिस समाज में न्याय जीवित हो,
वहीं सच्चा संविधान है।
आओ मिलकर प्रण ये लें,
अन्याय कभी न सहेंगे हम,
सत्य, साहस और सद्भाव से,
न्याय का दीप जलाएँगे हम।
जब तक साँसों में विश्वास रहेगा,
सत्य का पथ न छूटेगा,
न्याय की यह अनवरत खोज,
एक दिन अवश्य सफल होगी।
मेरे एहसास 🥀