“कैसे”
ये दिल के अरमान तुम तक पहुँचें,
राहों में बिखरे हैं, जुड़ें तो जुड़ें कैसे।
ये साँसें मेरी होकर भी तुम पर ही ठहरी हैं,
अब लौटकर मुझ तक मुड़ें तो मुड़ें कैसे।
तुम इश्क़ हो, धोखा हो, या मेरी ही दुआ हो,
हम तुमको बिना पढ़े समझें तो समझें कैसे।
हर रोज़ तुम्हारी याद का मौसम उतरता है,
हम अपने ही घर में ठहरें तो ठहरें कैसे।
तुम किसी और की दुनिया के चराग़ों में बसे हो,
हम अपने अँधेरों को भरें तो भरें कैसे।
हमने तो तुम्हें रूह की तरह अपने भीतर रखा,
अब ख़ुद से तुम्हें अलग करें तो करें कैसे।
तुम्हारे शहर से हर रोज़ गुज़रता है ख़याल मेरा,
मगर उन गलियों में उतरें तो उतरें कैसे।
तुम्हें पाने की दुआ भी अब लबों पर नहीं आती,
मगर दिल को ये बात कहें तो कहें कैसे।
तुम्हारे बाद भी धड़कन ने तुम्हारा नाम छोड़ा नहीं,
अब इन धड़कनों को बदलें तो बदलें कैसे।
लोग कहते हैं कि वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है,
जिस ज़ख़्म में तुम बसे हो, भरें तो भरें कैसे।
तुम किसी और के होकर भी मेरे ख़्वाबों में रहते हो,
हम इन ख़्वाबों से जागें तो जागें कैसे।
एक उम्र से हम तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़े हैं,
अब लौटकर अपनी ही तरफ़ चलें तो चलें कैसे।
प्राची गुर्जर….