हृदय - परिवर्तन
किसी चेहरे पर छायी उदासी ने
मन को छुआ
द्रवित हो रहा था मन उसके दुःख में
पर, दूसरे ही पल
किसी चेहरे की चालाकी से
भर उठा मन घृणा से
एक ही पल में कहाँ गयी वो
हृदय की विशालता
कहाँ गया वो अपनापन
इतनी शीघ्र, अनायास ही
हृदय परिवर्तन
समझ में तो नहीं आया
लेकिन, दौड़ गया एक
सवाल मानस पर
क्यों कोई अपना लगता है
क्यों कोई अच्छा लगता है
किसी से कटा-कटा रहता है
ये मन कैसे रूप बदलता है
छाँव कहीं, कहीं धूप
कहीं मेघ बरसता है ।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली