पर्दा उठा प्रदर्श से, हुई तंद्रिका भंग ।
देख रंग बदरंग सब, विजय हो गए दंग ।।
राम तुम्हारे तीर्थ में, ये कैसा अपकर्म ।
दान - कोष को लूटते, मिले कई बेशर्म ।।
सबसे बड़े कुकर्म की, चर्चा चारो ओर ।
दान - सम्पदा राम की, रहे चुराते चोर ।।
करते थे जो आपकी, सेवकाई दिन - रात ।
भक्तों के विश्वास पर, किये कुठाराघात ।।
नैतिकता की आड़ में, हुआ अनैतिक कृत्य ।
गणना के गणितज्ञ थे, किये नग्नवत नृत्य ।।