ऋषभ परिचय
जाहि कृपा पिपीलिका पार जाई ।
महान समुन्द्र का थाह लगाई ॥
जाहि कृपा नापा धरती आकाशा ।
होवे पूरा सब मन अभिलाषा ॥१॥
जाहि कृपा जन्म जन्म तक ज्ञान ।
देई दर्शन सदैव भगवान ॥
मुरझाया सुमन खिल जाता है ।
गरल महाअमृत हो जाता है ॥२॥
जाहि कृपा भक्त सब ब्रह्माण्ड की ।
थाह लगा पातें धाम ईश्वर की ॥
दुःख कष्ट पीड़ा पाप दूर जाई ।
तीनऊँ ताप कबहूँ न सताई ॥३॥
जाहि कृपा मोह माया दूर जाई ।
भक्तन्ह पर बनी राम कृपाई ॥
ऐश्वर्य समृद्धि सुख शान्ति पाई ।
मुक्ति पाई रघुपति धाम जाई ॥४॥
जाहि कृपा दुष्ट सन्त मुक्ति पाई ।
कर्म रूपी जीवन से तर जाई ॥
जाहि सेवक करत सेवकाई ।
उत्तम पुण्य उत्तम फल पाई ॥५॥
धर्म कर्म काम मोक्ष राम दास ।
मैं ऋषभ विश्वकर्मा ताहि दास ॥
राम भजन कीर्तन गुण गान ।
कीन्ह मोहि जग नामी भगवान ॥६॥
राम की सेवा कर दास कहाई ।
सेवा से ऋषभदास नाम पाई ॥
उत्तम दीक्षा शिक्षा पिता नें दिया ।
भा गुरु मोर सर्व सम्पन्न किया ॥७॥
माता पिता प्रथम भगवान हैं ।
वही मोरे हेतु उत्तम गुरु हैं ॥
जनक का नाम राधेश्याम मोरे ।
जननी का नाम बाला देवी मोरे ॥८॥
कुल विश्वकर्मा ब्राह्मण वर्ण है ।
शाण्डिल्य गोत्र लौहकार कर्म है ॥
आराध्य देव प्रभु विश्वकर्मा हैं ।
विश्वकर्मा पुत्र मनु से जन्मे हैं ॥९॥
भक्ति रस का मैं कवि कहलाता ।
परमेश्वर की महिमा को गाता ॥
शारदा कृपा से रचना करता ।
महिमा गाकर पाप उतारता ॥१०॥
ब्रह्माण्ड वसुधालोक जम्बूद्वीपं ।
भरतखण्ड आर्यावर्त भारतं ॥
प्रसिद्ध आर्यमगढ़ नगरी है ।
अद्भुत सुन्दर ग्राम लहुआँ है ॥११॥
शङ्करपुर का गृहसमूह है ।
लौहकार वंश का लोहरान है ॥
जयराम नामक एक गृह है ।
राम कृपा से वही मेरा धाम है ॥१२॥
लहुआँ माटी से तिलक लगाता ।
लहुआँ की माटी का पुत्र कहाता ॥
लहुआँ की माटी में जन्म लिया हूँ ।
ता में राम गुण गाता मैं पला हूँ ॥१३॥
कवि - ऋषभ विश्वकर्मा (ऋषभदास)