रात की छत, और ये ठंडी हवा का शोर,
बादलों के पीछे छुपा है जैसे मेरा ही कोई और दौर।
मैं खड़ा रहा आसमान को यूँ ताकता हुआ,
जैसे हर बादल मेरे दर्द को साथ ले जाता हुआ।
खामोशी भी आज कुछ ज्यादा बोल रही है,
दिल के अंदर की बेचैनी जैसे मुझसे ही पूछ रही है।
न सितारे पास आए, न चाँद ने कुछ कहा,
बस मैं और मेरा अकेलापन, रात भर रहा।
जो दिल में था, वो बादलों में खो दिया मैंने,
और कुछ इस तरह खुद को थोड़ा रो दिया मैंने।