“यदि प्रेम को देखना हो…”
यदि कभी जानना हो कि प्रेम वास्तव में क्या होता है,
तो किसी वृद्ध, विवाहिता दंपत्ति को देख लेना
जिन्होंने साथ-साथ
60–65 वर्षों की लंबी उम्र गुज़ारी हो।
प्रेम देखना हो,
तो देखना वह वृद्ध पत्नी
जो शांति से कुर्सी पर बैठी है,
जिसके न स्वरूप में वही चमक बची है,
न शरीर में वही जवानी की शक्ति।
और फिर देखना उसके पति को
जिसका तन बुढ़ापे से झुक चुका है,
जिसके हाथ काँपते हैं,
पर फिर भी वह पूरे स्नेह से
अपनी पत्नी के बिखरे बालों को सँवारता है…
मानो उसकी हर उँगली से
अब भी वही पुराना प्यार टपक रहा हो।
यह रिश्ता सिखाता है
कि हर लड़ाई, हर दूरी,
हर शिक़ायत
आखिरकार थक कर
इनके प्रेम के आगे हार मान लेती है।
यह बताता है कि प्रेम
कभी युवावस्था का जुनून नहीं होता,
प्रेम तो बुढ़ापे का सहारा होता है…
जब रूप मिट जाता है,
पर साथ जीवनभर बना रहता है।
प्राची तंवर…