सबने दुनिया नहीं देखी
उन लोगों ने भी नहीं जो अपने जीवन के अंतिम चरण में है या शायद मृत्यु शैया पर लेटे हुए है
ये लोग अपने समय की बाते बड़े गर्व से कह देते है
पर सच तो यही है न कि यही वो लोग थे जो समाज के डर से कभी आवाज उठा ही नहीं पाए
और न ही सुन पाए कभी अपने भीतर की आवाज़
ये लोग बड़ी आसानी से कह देते है कि हमने दुनियां देखी है
पर अपनी गांव की गलियों को तो दुनियां नहीं कहते न
हां ये हो सकता है कि उन्होंने उसी छोटी सी परिधि को अपनी दुनियां मान लिया हो
जो उन्हें ताउम्र गर्व करवाती रही हैं।