—दिखावे का सफ़र—
अब हम वो पहले जैसे नहीं हैं,
घर में हैं मौजूद, पर घर में नहीं हैं।
हाथों में स्क्रीन है, नजरें झुकी हुई हैं,
अपनों के बीच भी बातें रुकी हुई हैं।
दुनियाभर की खबरों से जुड़े हैं हम मगर,
पास बैठे शख्स की कोई खबर नहीं है।
वर्चुअल दुनिया के रिश्तों में खो गए इस कदर,
कि अब असली रिश्तों की कोई कदर ही नहीं है।
दिखावे की दुनिया में हम सब तो बढ़ रहे हैं,
मगर अपनों से दूर होने का ये कैसा सफ़र है।
हम दुनिया को अपनी 'प्रोफ़ाइल' तो चमका कर दिखा रहे हैं,
पर अंदर झांकें, तो अपनी ही नज़र में धुंधले पड़ रहे हैं।
ये हम क्या कर रहे हैं, खुद को ही कुचल कर,
चंद झूठी तारीफों पर, खुद पर गर्व कर रहे हैं।
-MASHAALLHA