Hindi Quote in Poem by AbhiNisha

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बस जीते रहना गुनाह है
कविता; भाग 2


अगर वक्त कुछ नहीं करने की है
तो थोड़ा वक्त खुद को सोचने के लिए निकालो
क्या तुम्हारे पास खुद के लिए भी वक्त नहीं है


अगर तुम्हारे पास खुद के लिए भी वक्त नहीं है
तो जरा सोचो
तुम क्या हो


एक इंसान यहां एक मशीन
जिसके पास खुद की इच्छा ही नहीं है
खुद की जज्बात नहीं है
खुद की दुनिया नहीं है
खुद का ख्याल नहीं है


जरा सोचो तुम वो जो कहते हो
तुम खुद से और दूसरों से भी प्यार है
जरा सोचो तुम खुद से कितना प्यार करती हो

क्या इतना प्यार करती हो
जो खुला आसमान देखकर उड़ जाए
बिना कतराऐ बिना सोचे अंजाम का



या फिर वेरिया पहन लेती हो
यह सोचकर
की
तुम सुरक्षित हो
मंदिर जैसे मुर्दा घरो में



जरा सोचो जहां तुम रहती हो
क्या वह जगह सचमुच में स्वर्ग है

अगर वह स्वर्ग है तो
तुमने उस स्वर्ग में रहने के लिए कीमत क्या चुकाया है


जरा सोचो
संने जैसी वरिया पावं में होगा
जिम्मेदारी जैसे हतकीयां हाथों में होगा


जरा सोचो तुम जैसे मोहब्बत कहती हो
क्या वह तुम्हें खुद से मोहब्बत करने देता है


जरा सोचो जिसे तुम जिम्मेदारी कहती हो
क्या वह जिम्मेदारी सच में तुम्हारी है


जरा सोच के देखो
क्यों कि
बस मोहब्बत करते रहना गुनाह है
बस जिम्मेदारी निभाना गुनाह है



और यह गुनाह तुम हर रोज कर रही हो
क्या आगे भी करते रहना चाहती हो
अगर करते रहना चाहती हो

तो ठेहरो
और जरा सोचो

तुम्हारी बाद नई जिंदगी की
क्या तुम चाहती हो कि वह भी
जिंदगी को बोझ समझ कर इन्हें डोते रहे
जीने की वजह

जरा सोचो
अपनी भावनाओं को अनदेखा करना गुनाह है
और तुम हर बार यही करते हो


तुम हर वक्त सोचती रहती हो कि
तुम खुश हो
पर क्या तुम खुश हो
जरा सोचो


खुद से झूठी बातें करना गुनाह है

और यह गुनाह भी तुम हर रोज करते हो



तो अब समहलो और आओ बोलो बदलो
थोड़ी खुद के लिए
और ज्यादा आने वाली जिंदगी के लिए

अगर तुम सोचना शुरू करोगी तो
शुक्रगुजा होंगे तुम्हारे आने वाले पीढ़ियां


हां तुम्हें कोशने की वजह
तुम्हारे शुक्रगुजार रहेंगे तुम्हारी आने वाली पिड़या

Hindi Poem by AbhiNisha : 112025683
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