अब की बार बात करले बैठ कर
कूद जा भंवर में,खुदी को खोकर
मत डर , भरोसा कर अपनी लेखनी पर
तो कहानी मोड़ दे खुद को खोलकर
कितने भी किनारों पर रेत के घर बना ले
समय की लहर चूर कर देगी उसे तोड़कर
संभलने का आखिरी मौका दे दे खुद को
टुकड़े टुकड़े होजा अहम का आइना तोड़कर
कल था और कल भी होगा ,मत चुक पल को
तू भी खिलेगा, बाहर आजा ज़मी फाड़कर