कहानी पछतावा से भरी हुई
कविता
कहानी में एक कहानी है
एक पछतावे से भरी हुई व्यक्ति की
पछतावे से भरी हुई दोनों की
अकेलेपन से पैदा हुए हुए दर्द की
उन सपनों की जो कहानी पूरी नहीं हुई
कहानी में एक कहानी है एक हवा की
यादों की भूली हुई वादों की
उन दिनों की जब आंखें तुम्हें देखे हुए थकते नहीं थे
उस वक्त की जब तुम्हारे सिवा मुझे कोई और भाता नहीं था
पर कहानी एक कहानी ही बनकर रह गई
वक्त किसी का सगा नहीं होता
और यह वक्त कहानी की तरह बीत गई
बीते हुए वह दोनों में शायद कुछ नहीं चाहिए था
तुम्हारे सिवा
पर अब ऐसा नहीं है
मुझे सब कुछ चाहिए
मैं भूल गई तुम्हें देखना
और नजर फेर कर
तुमसे दूर कहीं देखा तो
देखा मैं तुम्हारे साथ भी तो पूरा नहीं हूं
और पूरी होने की तलाश में
मैं निकल परी अल्हार पुरवाई बनकर दौड़ते हुए
फूलों के बादियो से शहर की तरफ
जहां वह फूलों की वादियां नहीं है
वह एहसास नहीं है
वह सुकून नहीं है
यहां बस राहों पर बिखरे हुए कांटे हैं
दर्द है गम है अकेलापन है
और पछताते हुए मैं
अब सोचती काश रुक जाती
मैं वहां फिर से नजरे घूमते हुए तुम्हें देखती
और फूलों की तरफ मुस्कुराती
और तुम्हारे साथ ही मुकम्मल होने की कोशिश करती
पर मैं वहां तुझ में खुद को पा रही थी
मुझ में खुद को नहीं देख पाई
इसीलिए भागना पड़ा
फूलों के बादीयो से निकाल कर
कांटों से फस्ते पत्थरों से टकराते हुए
लाहु लुहान पैरों के साथ
तब तलक भागति रही
जब तलक मैं खुद को खुद में नहीं देखा
कहानी यही है
हम बीते दिनों के पछतावे में हमेशा कैद हो जाते हैं
और आखरी समय में हम खुद को दोख नहीं पाते
और यही तो पछतावा है
हम तब भी खुद के नहीं थे
और आखिरी समय पर भी खुद के नहीं हुए
बस आंखें बंद करते हुए
तुम्हारे चेहरा नजरों के सामने था