- लफ़्ज़ों की बंदिशों से परे -
लफ़्ज़ों की बंदिशों से परे एक राब्ता है तुमसे,
जैसे सदियों पुराना कोई वास्ता है तुमसे।
धुंधली सी इस दुनिया में जब खुद को खोता हूँ,
तेरी यादों के अक्स में ही तसल्ली पाता हूँ।
ज़िंदगी की इस मसरूफ़ियत में भी एक ठहराव हो तुम,
मेरी हर अनकही दुआ का खूबसूरत जवाब हो तुम।
वक्त भले ही रेत की तरह फिसल जाए हाथों से,
मगर तुम्हारा अहसास रूह में महकेगा सांसों से।
-MASHAALLHA