झील से गहरे तुम्हारे दो नयन,
चाँदनी ओढ़े है सोने का बदन,
मैं तुम्हारे प्राण में हूँ इस तरह,
जैसे ही सुरभित चंदन का वन।
साँस मेरी तेरी साँसों से मिली,
ज्यूँ मिली फूलों से तितलियाँ,
मैं तुम्हारे रूप गंध में भींगा हुआ,
कर रहा भ्रमरों की तरह गुंजन ।
तुम बसी मेरे हृदय में इस तरह,
जैसे सागर में छिपी कोई लहर,
जैसे मोती हो छिपी हुई सीप में,
जैसे फूल पर बिखरी ओस कण।
प्रशस्त करती तुम मेरा पथ प्रिये,
प्राण को देती हो तुम आराम भी,
तुम मेरे दिल की हो धड़कन प्रिये,
तुम से ही विश्राम पाता मेरा मन ।
Das vijju,,,,,,,