ऋगुवेद सूक्ति-- (54)की व्याख्या
धियो यो न: प्रचोदयात।
ऋग्वेद-
3/62/10
अर्थ-- वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। यह प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र का अंतिम चरण है—
ऋग्वेद-- 3.62.10
मन्त्र (पूर्ण रूप):
ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
पद का अर्थ:
धियः = बुद्धियाँ (हमारी बुद्धि/विवेक)
यः = जो (ईश्वर)
नः = हमारी
प्रचोदयात् = प्रेरित करे, आगे बढ़ाए
भावार्थ:
“हम उस दिव्य परम तेजस्वी परमात्मा (सविता देव) का ध्यान करते हैं, वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे और उसे सत्य मार्ग की ओर अग्रसर करे। इसलिए ऊपर दिया हुआ अर्थ — “वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे” — बिल्कुल सही और सारगर्भित है।
ऋग्वेद में प्रमाण--
ऋग्वेद 3.62.10
मन्त्र:
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
यह वही गायत्री मन्त्र है, जिसमें “धियो यो नः प्रचोदयात्” पद आता है।
यजुर्वेद में प्रमाण
शुक्ल यजुर्वेद-- 36.3
मन्त्र:
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
यहाँ भी वही मन्त्र पुनः मिलता है, जिससे सिद्ध होता है कि यह वैदिक प्रार्थना अत्यंत महत्त्वपूर्ण और सार्वभौमिक है।
सामवेद में प्रमाण
सामवेद (उत्तारार्चिक -1462) (संख्या विभिन्न पाठों में बदल सकती है)
मन्त्र:
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
सामवेद में भी यह मन्त्र गेय (गाने योग्य) रूप में प्राप्त होता है।
निष्कर्ष--
वेदों में बार-बार इस मन्त्र का आना यह दर्शाता है कि—
ईश्वर से बुद्धि की शुद्धि और प्रेरणा माँगना वैदिक धर्म का मूल तत्व है।
यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण (inner awakening) की प्रार्थना है।
उपनिषदों में प्रमाण--
1. छान्दोग्य उपनिषद् (--3.12.1)
मन्त्र:
गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किं च।
अर्थ:
“यह सम्पूर्ण जगत् (जो कुछ भी है) गायत्री ही है।”
यहाँ गायत्री को सर्वव्यापक चेतना बताया गया है—जो बुद्धि को प्रकाशित करती है।
2. छान्दोग्य उपनिषद् (--3.12.5)
मन्त्र:
सा एषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री।
अर्थ:
“यह गायत्री चार पदों और छह प्रकारों वाली है।”
इससे स्पष्ट होता है कि गायत्री केवल मन्त्र नहीं, बल्कि चेतना और ज्ञान का व्यापक सिद्धान्त है।
3. बृहदारण्यक उपनिषद् (-5.14.4)
मन्त्र:
गायत्री वै इदं सर्वं भूतं...
अर्थ:
“यह सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है।”
यहाँ भी गायत्री को सर्वव्यापी ब्रह्म-चेतना कहा गया है।
4. प्रश्न उपनिषद् (--1.5)
मन्त्र (भाव):
सूर्य (सविता) ही प्राण और चेतना का स्रोत है।
गायत्री मन्त्र में “सविता” का जो उल्लेख है, उसका दार्शनिक आधार यहाँ मिलता है—
कि सूर्य ही बुद्धि और प्राणों को प्रेरित करता है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में “धियो यो नः प्रचोदयात्” शब्दशः नहीं,
परन्तु उसका मूल भाव (बुद्धि की प्रेरणा, चेतना का प्रकाश) स्पष्ट रूप से उपस्थित है।
गायत्री को ब्रह्म, चेतना और ज्ञान का स्रोत बताया गया है।
इसलिए यह मन्त्र केवल वैदिक स्तुति नहीं, बल्कि उपनिषदों के अद्वैत ज्ञान से भी जुड़ा हुआ है।
पुराणों में प्रमाण
1. पद्म पुराण
श्लोक:
गायत्री जपमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते।
इह लोके सुखं भुक्त्वा परत्र मोक्षमाप्नुयात्॥
अर्थ:
“केवल गायत्री मन्त्र के जप से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है,
इस लोक में सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।”
2. स्कन्द पुराण
श्लोक:
न गायत्र्याः परं मन्त्रं न मातुः परदैवतम्।
अर्थ:
“गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं, और माता से बढ़कर कोई देवता नहीं।”
3. अग्नि पुराण
श्लोक:
गायत्री छन्दसां माता ब्रह्मणो हृदयं स्मृता।
अर्थ:
“गायत्री छन्दों की माता है और ब्रह्म का हृदय मानी गई है।”
4. ब्रह्माण्ड पुराण
श्लोक (भाव):
“गायत्री मन्त्र का जप करने से बुद्धि शुद्ध होती है और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।”
यह सीधे “धियो यो नः प्रचोदयात्” (बुद्धि को प्रेरित करे) के भाव की पुष्टि करता है।
5. नारद पुराण
श्लोक:
सर्ववेदेषु या प्रोक्ता गायत्री परमाक्षरा।
सा जप्या सर्वदा विप्रैः सर्वपापप्रणाशिनी॥
अर्थ:
“जो गायत्री सभी वेदों में कही गई है, वह परम अक्षर है;
उसका जप सदा करना चाहिए, वह सभी पापों का नाश करने वाली है।”
निष्कर्ष-+
पुराणों में गायत्री को सर्वश्रेष्ठ मन्त्र, छन्दों की माता, बुद्धि-शुद्धि और मोक्ष देने वाली बताया गया है।
इससे यह सिद्ध होता है कि “धियो यो नः प्रचोदयात्” का भाव—
बुद्धि को प्रेरित करना और ज्ञान देना—
पुराणों में भी पूर्ण रूप से समर्थित है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण
अध्याय 10, श्लोक 11
श्लोक:
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
अर्थ:
“उन पर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अज्ञानरूपी अंधकार को
ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट करता हूँ।”
यह “बुद्धि का प्रकाश” ठीक वही भाव है जो गायत्री मन्त्र में है।
3. अध्याय 15, श्लोक 15
श्लोक:
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च॥
अर्थ:
“मैं सबके हृदय में स्थित हूँ; मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है।”
अर्थात् बुद्धि, ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत परमात्मा ही है।
निष्कर्ष--
गीता में “धियो यो नः प्रचोदयात्” शब्द तो नहीं,
लेकिन उसका पूर्ण भाव स्पष्ट रूप से मिलता है—
ईश्वर बुद्धि देता है -
अज्ञान को हटाकर ज्ञान का प्रकाश करके।
इस प्रकार गायत्री मन्त्र और गीता का संदेश एक ही है—
ईश्वर हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित करता है।
महाभारत में प्रमाण--
1. उद्योग पर्व (5.33.37) – विदुर नीति
श्लोक:
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।
न स धर्मो यत्र न सत्यमस्ति
न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम्॥
अर्थ:
“वह सभा नहीं जहाँ ज्ञानी (वृद्ध) न हों, वे वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न कहें…।”
यहाँ संकेत है कि सही बुद्धि (धर्मयुक्त विवेक) ही मनुष्य को मार्ग दिखाती है।
2. शान्ति पर्व (12.153.7)
श्लोक (भावार्थ सहित):
“मनुष्य की बुद्धि ही उसे धर्म और अधर्म का ज्ञान कराती है,
और वही उसे उचित मार्ग पर प्रेरित करती है।”
यह सीधे “बुद्धि को प्रेरित करने” (प्रचोदयात्) के भाव से मेल खाता है।
3. वन पर्व (3.313.117)
श्लोक:
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
अर्थ:
“इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है।”
ज्ञान (बुद्धि का प्रकाश) ही जीवन को दिशा देता है।
4. भीष्म द्वारा उपदेश (शान्ति पर्व)
भाव:
“ईश्वर ही जीवों के हृदय में स्थित होकर उन्हें प्रेरित करता है और उनके कर्मों का मार्गदर्शन करता है।”
यह गीता के समान ही सिद्धान्त है—
ईश्वर बुद्धि को प्रेरित करता है।
निष्कर्ष--
महाभारत में “धियो यो नः प्रचोदयात्” शब्द नहीं,
लेकिन उसका भाव पूर्णतः विद्यमान है—
बुद्धि ही धर्म का मार्ग दिखाती है
ज्ञान सबसे पवित्र है
ईश्वर अन्तःकरण में स्थित होकर प्रेरणा देता है
इसलिए यह सिद्ध होता है कि गायत्री मन्त्र का “बुद्धि-प्रेरणा” सिद्धान्त महाभारत में भी समर्थित है।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण
1. मनुस्मृति (2.6)
श्लोक:
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥
अर्थ:
“वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मा को प्रिय लगने वाला (शुद्ध विवेक) — ये धर्म के चार लक्षण हैं।”
यहाँ आत्मा का प्रिय (अन्तःकरण की शुद्ध बुद्धि) ही निर्णय का आधार बताया गया है।
2. मनुस्मृति (12.4)
श्लोक:
बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
अर्थ:
“बुद्धि कर्मों के अनुसार (उन्हें दिशा देने वाली) होती है।”
यह दर्शाता है कि बुद्धि ही जीवन को मार्ग देती है।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.7)
श्लोक:
श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
सम्यक्संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम्॥
अर्थ:
“श्रुति, स्मृति, सदाचार और शुद्ध संकल्प से उत्पन्न इच्छा—ये धर्म के मूल हैं।”
“सम्यक् संकल्प” = शुद्ध, प्रेरित बुद्धि (प्रचोदयात् का भाव)
4. पराशर स्मृति (1.24)
भावार्थ:
“मनुष्य को अपने शुद्ध अन्तःकरण और बुद्धि से धर्म का निर्णय करना चाहिए।”
यहाँ स्पष्ट है कि अन्तःप्रेरणा (inner guidance) ही धर्म का मार्ग है।
निष्कर्ष
स्मृति ग्रन्थों में
बुद्धि (विवेक) को धर्म का आधार माना गया है
अन्तःकरण की प्रेरणा को सही मार्गदर्शक बताया गया है
यह ठीक वही सिद्धान्त है जो गायत्री मन्त्र में है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को प्रेरित करे
नीति ग्रन्थों में प्रमाण
1. चाणक्य नीति
श्लोक:
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।
वनं सिंहो मदोन्मत्तो शशकेन निपातितः॥
अर्थ:
“जिसके पास बुद्धि है, उसी के पास बल है; निर्बुद्धि के पास बल कहाँ? वन में मदमस्त सिंह को भी एक छोटे से खरगोश ने बुद्धि से पराजित कर दिया।”
यहाँ स्पष्ट है—बुद्धि ही वास्तविक शक्ति है (प्रेरित बुद्धि का महत्व)।
2. हितोपदेश
श्लोक:
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिः अशान्तस्य कुतः सुखम्॥
(यह श्लोक गीता में भी आता है)
अर्थ:
“जिसका मन संयमित नहीं, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती;
और जिसकी बुद्धि स्थिर नहीं, उसे शान्ति नहीं मिलती।”
यह दिखाता है कि सही बुद्धि ही जीवन को शान्ति और दिशा देती है।
3. पंचतंत्र
श्लोक (भाव):
“बुद्धिमान व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी उपाय निकाल लेता है।”
यह नीति का मूल सिद्धान्त है—
प्रेरित बुद्धि (प्रचोदयात्) ही समस्या का समाधान करती है।
4. भर्तृहरि नीति शतक
श्लोक:
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
अर्थ:
“विद्या (ज्ञान) मनुष्य का श्रेष्ठ रूप और गुप्त धन है;
यह सुख, यश और जीवन की उन्नति देती है।”
यहाँ ज्ञान और बुद्धि का महत्व बताया गया है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रन्थों में--
बुद्धि - सबसे बड़ी शक्ति।
विवेक =-सही मार्ग का साधन।
यह सीधे गायत्री मन्त्र के इस भाव को पुष्ट करता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को सही दिशा में प्रेरित करे
नीचे वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से कुछ प्रमुख श्लोक उनके सरल अर्थ सहित दिए जा रहे हैं—
1. वाल्मीकि रामायण से श्लोक
(1) राम का धर्मस्वरूप--
श्लोक (अयोध्याकाण्ड 2.109.10)
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासवः॥
अर्थ:
श्रीराम स्वयं धर्म के साकार रूप हैं। वे सत्यवादी, पराक्रमी और सज्जन हैं। जैसे इन्द्र देवताओं के राजा हैं, वैसे ही राम समस्त लोक के राजा हैं।
(2) सत्य और वचन पालन
श्लोक (अयोध्याकाण्ड 2.18.30)
नाहं जीवितुमिच्छामि विना रामं महायशाः।
अर्थ:
(दशरथ का भाव) — मैं महान यशस्वी राम के बिना जीवित रहना नहीं चाहता।
यह श्लोक राम के प्रति प्रेम और सत्यप्रतिज्ञा का महत्व दर्शाता है।
(3) धर्म की रक्षा
श्लोक (अरण्यकाण्ड 3.37.13)
धर्मेण पालयिष्यामि प्रजाः सर्वाः समाहितः॥
अर्थ:
मैं एकाग्रचित्त होकर धर्म के द्वारा ही सभी प्रजाओं का पालन करूंगा।
2. अध्यात्म रामायण --
(1) राम का ब्रह्मस्वरूप
श्लोक (अध्यात्म रामायण, बालकाण्ड 1.10)
रामो न मानुषो देवः साक्षाद् ब्रह्म परं यतः॥
अर्थ:
राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे स्वयं परम ब्रह्म (ईश्वर) हैं।
(2) माया और आत्मज्ञान
श्लोक (अध्यात्म रामायण 1.2.20)
मम माया दुरत्यया संसारः स्वप्नवत् स्मृतः॥
अर्थ:
यह संसार मेरी माया से उत्पन्न है और स्वप्न के समान अस्थायी है।
(3) भक्ति का महत्व
श्लोक (अध्यात्म रामायण 6.2.45)
भक्तिरेव गरीयसी नान्यत् साधनमस्ति हि॥
अर्थ:
केवल भक्ति ही सर्वोत्तम साधन है, इसके अलावा कोई अन्य उपाय श्रेष्ठ नहीं है।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण --
1. गर्ग संहिता में प्रमाण--
(गोलोक खण्ड, अध्याय 2, श्लोक 28
ज्ञानं परं प्रकाशं च बुद्धेः स्रोतः सनातनम्।
येन मार्गः प्रदर्श्येत तं नमामि परं प्रभुम्॥
अर्थ:
“जो परम ज्ञान और प्रकाश का स्रोत है,
जो बुद्धि को सही मार्ग दिखाता है—उस परम प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।”
यहाँ स्पष्ट है—
ईश्वर ही बुद्धि को प्रेरित कर सही मार्ग दिखाता है (प्रचोदयात् भाव)
2. योग वशिष्ठ में प्रमाण--
(निर्वाण प्रकरण, उत्तरार्ध 2.18.32)
श्लोक:
बुद्धिरेव हि संसारः तया मुक्तं भवेद् मनः।
बुद्धिं शुद्धां समासाद्य मुक्तिर्भवति नान्यथा॥
अर्थ:
“बुद्धि ही संसार का कारण है;
उसी के शुद्ध होने पर मन मुक्त होता है।
शुद्ध बुद्धि से ही मुक्ति मिलती है, अन्यथा नहीं।”
यह सीधे बताता है—
बुद्धि की शुद्धि और प्रेरणा ही मुक्ति का मार्ग है
(उत्पत्ति प्रकरण 1.2.5)
श्लोक:
यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः बुद्धिरेव कारणम्।
शुद्धबुद्धेः प्रसादेन दृश्यते परमं पदम्॥
अर्थ:
“जैसी दृष्टि (बुद्धि), वैसी सृष्टि होती है;
शुद्ध बुद्धि के प्रसाद से परम पद (सत्य) का दर्शन होता है।”
यहाँ
बुद्धि का प्रकाश = सत्य का अनुभव
निष्कर्ष--
गर्ग संहिता → ईश्वर बुद्धि को मार्ग दिखाने वाला
योग वशिष्ठ → शुद्ध बुद्धि = मुक्ति का एक मात्र साधन।
दोनों ग्रन्थ एक ही सत्य कहते हैं
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को प्रकाशित और प्रेरित करो।
इस्लाम धर्म- में प्रमाण --
क़ुरआन में प्रमाण--
1. सूरह अल-फ़ातिहा (1:6)
आयत:
اِهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ
अर्थ:
“हमें सीधा रास्ता दिखा।”
यह ठीक “प्रचोदयात्” (प्रेरित करना / मार्ग दिखाना) के समान भाव है।
2. सूरह अल-बक़रह (2:269)
आयत:
يُؤْتِي الْحِكْمَةَ مَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ الْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِيَ خَيْرًا كَثِيرًا
अर्थ:
“अल्लाह जिसे चाहता है, उसे हिकमत (बुद्धि/ज्ञान) देता है;
और जिसे हिकमत मिली, उसे बहुत बड़ी भलाई मिली।”
यहाँ स्पष्ट है—बुद्धि (हिकमत) ईश्वर की देन है।
3. सूरह ताहा (20:114)
आयत:
رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا
अर्थ:
“हे मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।”
यह भी बुद्धि/ज्ञान की प्रेरणा की प्रार्थना है।
हदीस में प्रमाण--
1. दुआ (हदीस)
दुआ:
اللَّهُمَّ انْفَعْنِي بِمَا عَلَّمْتَنِي وَعَلِّمْنِي مَا يَنْفَعُنِي وَزِدْنِي عِلْمًا
अर्थ:
“हे अल्लाह! जो तूने मुझे सिखाया है उससे मुझे लाभ दे,
और मुझे वह सिखा जो मेरे लिए लाभदायक हो, और मेरे ज्ञान को बढ़ा।”
यहाँ भी ईश्वर से बुद्धि और सही ज्ञान की प्रेरणा माँगी जा रही है। निष्कर्ष--
इस्लाम में हिदायत (Guidance)
हिकमत (Wisdom)
इल्म (Knowledge)
— ये सब अल्लाह से माँगे जाते हैं।
यह ठीक गायत्री मन्त्र के इस भाव से मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हे परमात्मा! हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित कर।
सिख धर्म में प्रमाण --
गुरु ग्रंथ साहिब में प्रमाण--
ਮਤਿ ਵਿਚਿ ਰਤਨ ਜਵਾਹਰ ਮਾਣਿਕ ਜੇ ਇਕ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਖ ਸੁਣੀ॥
लिप्यंतरण:
Mat vich ratan javāhar māṇik je ik gur kī sikh suṇī
अर्थ:
“यदि गुरु की शिक्षा सुनी जाए, तो बुद्धि (मति) में ही रत्न, जवाहर और माणिक (अनमोल ज्ञान) प्राप्त होते हैं।”
यहाँ स्पष्ट है—गुरु (ईश्वर) बुद्धि को प्रकाशित करता है।
2.ਬੁਧਿ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਭਈ ਮਤਿ ਪੂਰੀ॥
लिप्यंतरण:
Budh pragās bhaī mat pūrī
अर्थ:
“बुद्धि में प्रकाश हुआ और मति पूर्ण हो गई।”
यह ठीक “बुद्धि को प्रेरित/प्रकाशित करना” (प्रचोदयात्) का भाव है।
3. ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੁਧਿ ਪਾਈਐ॥
लिप्यंतरण:
Gur parsādī budh pāīai
अर्थ:
“गुरु की कृपा से ही बुद्धि प्राप्त होती है।”
यहाँ भी बुद्धि को ईश्वर/गुरु की देन बताया गया है।
4.जपुजी साहिब (मूल मंत्र का भाव) ਪਉੜੀ:
ਹੁਕਮੀ ਹੋਵਨਿ ਆਕਾਰ ਹੁਕਮੁ ਨ ਕਹਿਆ ਜਾਈ॥
अर्थ:
“सब कुछ परमात्मा के हुक्म (आदेश/प्रेरणा) से होता है।”
यह दर्शाता है कि ईश्वर ही भीतर से मार्गदर्शन करता है।
निष्कर्ष--
सिख धर्म में मति (बुद्धि),
बुद्धि का प्रकाश (प्रगास),
गुरु की कृपा से ज्ञान
— ये मुख्य तत्त्व हैं।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हे परमात्मा! हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित कर।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
बाइबिल में प्रमाण
1. याकूब 1:5 (James 1:5)
वचन:
“If any of you lacks wisdom, you should ask God, who gives generously to all…”
हिन्दी अर्थ:
“यदि तुम में से किसी को बुद्धि की कमी हो, तो वह परमेश्वर से माँगे,
जो बिना दोष दिए सबको उदारता से देता है।”
यहाँ स्पष्ट है—बुद्धि (wisdom) परमेश्वर से माँगी जाती है।
2. नीतिवचन-- 3:5-6 (Proverbs 3:5–6)
वचन:
“Trust in the Lord with all your heart… and He will make your paths straight.”
हिन्दी अर्थ:
“अपने पूरे हृदय से प्रभु पर भरोसा रखो…
वह तुम्हारे मार्ग को सीधा करेगा।”
यह ठीक मार्गदर्शन (प्रचोदयात्) का भाव है।
3. भजन संहिता 119:105 (Psalm 119:105)
वचन:
“Your word is a lamp to my feet and a light to my path.”
हिन्दी अर्थ:
“तेरा वचन मेरे पैरों के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए प्रकाश है।”
यहाँ बुद्धि का प्रकाश और मार्गदर्शन दोनों स्पष्ट हैं।
4. इफिसियों 1:17 (Ephesians 1:17)
वचन:
“God… may give you the Spirit of wisdom and revelation…”
हिन्दी अर्थ:
“परमेश्वर तुम्हें ज्ञान और प्रकाश की आत्मा दे।”
👉 यह सीधे बुद्धि और ज्ञान की दिव्य प्रेरणा को दर्शाता है।
निष्कर्ष--
ईसाई धर्म में
बुद्धि (Wisdom), प्रकाश (Light), मार्गदर्शन (Guidance)
— ये सब परमेश्वर से प्राप्त माने गए हैं।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूरी तरह मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हे परमेश्वर! हमारी बुद्धि को सही मार्ग में प्रेरित कर।
जैन आगमों में प्रमाण --
1. णमोकार मंत्र
मंत्र:
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
भावार्थ:
“अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और सभी साधुओं को नमस्कार।”
इन महान आत्माओं का स्मरण करने से सम्यक् ज्ञान (शुद्ध बुद्धि) की प्रेरणा प्राप्त होती है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र (भाव)
णाणं तु सम्मं, दंसणं च सम्मं।
चरित्तं च सम्मं, एओ मग्गो विमुत्तिए॥
अर्थ:
“सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् आचरण—
यही मुक्ति का मार्ग है।”
यहाँ सम्यक् ज्ञान (शुद्ध बुद्धि) को प्रमुख स्थान दिया गया है।
3. तत्त्वार्थ सूत्र (1.1)
सम्यग्दंसण-णाण-चारित्ताणि मोक्खमग्गो॥
अर्थ:
“सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र—ये मोक्ष का मार्ग हैं।”
यह स्पष्ट करता है कि
सही ज्ञान (बुद्धि) ही मुक्ति का आधार है।
4. जैन आगम (भाव)
णाणेण विणा न होइ मोखो॥
अर्थ:
“ज्ञान (बुद्धि) के बिना मोक्ष नहीं होता।”
यह सीधे दर्शाता है—
प्रेरित और शुद्ध बुद्धि (प्रचोदयात्) ही जीवन का उद्धार करती है।
निष्कर्ष--
जैन धर्म में सम्यक् ज्ञान (Right Knowledge) सम्यक् दर्शन (Right Vision)
— को जीवन का मूल आधार माना गया है।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूरी तरह मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को सत्य और मोक्ष मार्ग में प्रेरित करे।
बौद्ध धर्म में प्रमाण ---
1. धम्मपद (श्लोक 1)
पाली (देवनागरी):
मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पसन्नेन भासति वा करोति वा॥
अर्थ:
“मन (बुद्धि) ही सभी कर्मों का अग्रदूत है;
यदि कोई शुद्ध मन से बोलता या कार्य करता है…”
यहाँ स्पष्ट है—मन/बुद्धि ही जीवन को दिशा देती है।
2. धम्मपद (श्लोक 282)
नत्थि पञ्ञा समा आभा॥
अर्थ:
“प्रज्ञा (बुद्धि) के समान कोई प्रकाश नहीं है।”
यह सीधे बुद्धि के प्रकाश (प्रचोदयात्) का भाव है।
3. मज्झिम निकाय (भाव)
सम्मा दिट्ठि, सम्मा सङ्कप्पो… (आर्य अष्टांगिक मार्ग)
अर्थ:
“सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प—ये मार्ग के प्रथम अंग हैं।”
यह दर्शाता है कि
सही बुद्धि (Right Understanding) ही मुक्ति का प्रारम्भ है।
4. संयुक्त निकाय (भाव)
पञ्ञा नाम उत्तमं बलं॥
अर्थ:
“प्रज्ञा (बुद्धि) ही सर्वोत्तम बल है।”
यह बताता है कि
प्रेरित बुद्धि ही जीवन का सर्वोच्च साधन है।
निष्कर्ष--
बौद्ध धर्म मेंप्रज्ञा (Wisdom)
सम्यक् दृष्टि (Right View)
सम्यक् संकल्प (Right Intention)
— को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को सत्य मार्ग में प्रेरित करे।
पारसी धर्म में प्रमाण--
अवेस्ता में प्रमाण--
1. यास्ना 28.5 (गाथा)
अवेस्तन (देवनागरी लिप्यंतरण):
अता ता वाहीष्टा मनंग्हा अहुरा मज़्दा…
अर्थ:
“हे अहुरा मज़्दा! मुझे श्रेष्ठ मन (वहु मनः) प्रदान करें…”
यहाँ वहु मनः = उत्तम बुद्धि / सद्बुद्धि, जो सीधे “प्रचोदयात्” (बुद्धि की प्रेरणा) के समान है।
2. यास्ना-- 30.2
अवेस्तन (देवनागरी लिप्यंतरण):
श्रुण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः…
(मूल अवेस्तन में भाव)
अर्थ:
“सभी लोग सुनें और अपनी बुद्धि से विचार करें,
फिर स्वयं सही मार्ग का चुनाव करें।”
यहाँ स्पष्ट है—
मनुष्य को बुद्धि से सत्य मार्ग चुनना चाहिए।
3. यास्ना --43.1
अवेस्तन यथा अहु वैर्यो… (प्रार्थना का भाव)
अर्थ:
“हे प्रभु! मुझे सत्य और धर्म के मार्ग में चलने की प्रेरणा दें।”
यह ईश्वर से मार्गदर्शन और बुद्धि की प्रार्थना है।
4. अवेस्ता (वहु मनः का सिद्धान्त)
भाव:
“वहु मनः (Good Mind) के द्वारा ही मनुष्य अहुरा मज़्दा के सत्य को समझता है।”
यह दर्शाता है—
सद्बुद्धि (Good Mind) ही ईश्वर तक पहुँचने का साधन है।
निष्कर्ष--
पारसी धर्म में वहु मनः (सद्बुद्धि / Good Mind)
अशा (सत्य, धर्म)
— मुख्य तत्त्व हैं।
यह गायत्री मन्त्र के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हे परमात्मा! हमारी बुद्धि को सत्य मार्ग में प्रेरित कर।
ताओ (Daoism) और कन्फ्यूशियस में प्रमाण--
ताओ धर्म में प्रमाण--
1. 道德经 (ताओ धर्म)
अध्याय 15
孰能浊以静之徐清?孰能安以动之徐生?
अर्थ:
“कौन है जो अशांत मन को शान्त कर धीरे-धीरे स्पष्टता (ज्ञान) प्राप्त कर सके?
और कौन है जो शान्ति से सही क्रिया उत्पन्न कर सके?”
यहाँ संकेत है—
मन की शुद्धि से बुद्धि स्पष्ट होती है और सही मार्ग मिलता है।
अध्याय 33
知人者智,自知者明。
अर्थ:
“जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है, और जो स्वयं को जानता है वह प्रबुद्ध (प्रकाशित बुद्धि वाला) है।”
यह बुद्धि के प्रकाश (प्रचोदयात्) का भाव है।
2. 论语 (कन्फ्यूशियस परम्परा)
अध्याय 2.15
学而不思则罔,思而不学则殆。
अर्थ:
“अध्ययन बिना विचार के व्यर्थ है,
और विचार बिना अध्ययन के खतरनाक है।”
यहाँ स्पष्ट है—
सही बुद्धि (सोच + ज्ञान) ही सही मार्ग देती है।
अध्याय (4.5):
君子喻于义,小人喻于利。
अर्थ:
“श्रेष्ठ पुरुष धर्म (सत्य) को समझता है,
जबकि साधारण व्यक्ति केवल लाभ को समझता है।”
यह विवेकपूर्ण बुद्धि (धर्म-बोध) का महत्व बताता है।
निष्कर्ष---
ताओ धर्म → मन की शुद्धि से बुद्धि का प्रकाश और सही मार्ग
कन्फ्यूशियस परम्परा → विचार, ज्ञान और विवेक का संतुलन।
दोनों परम्पराएँ यह सिद्ध करती हैं कि—
सच्ची बुद्धि और आन्तरिक स्पष्टता ही सही जीवन-पथ देती है
यही गायत्री मन्त्र का भाव है—
“धियो यो नः प्रचोदयात्” = हमारी बुद्धि को सत्य मार्ग में प्रेरित कर