किसी मुश्किल मोड़ पर
तुम मेरा हाथ छोड़कर चली गई…
मैं उस पल टूटा नहीं था,
बस खामोशी से अंदर ही अंदर बिखर गया था।
बहुत कुछ कहना था,
चीखना था, रोकना था तुम्हें…
पर अजीब है ना—
मेरी आवाज़ भी तुम्हारे साथ ही चली गई।
तब समझ आया—
मोहब्बत में दरवाज़े हम खोलते हैं,
मगर उन्हें बंद करने वाले
वही होते हैं… जिन पर हम सबसे ज़्यादा यकीन करते हैं।
जिसे मैंने अपना सुकून समझा,
वही मेरी बेचैनी बन गया…
जिसे अपना घर कहा,
वही मुझे बेघर कर गया।
और आज भी…
उस दरवाज़े के बंद होने की आवाज़
मेरे अंदर गूंजती रहती है—
हर बार मुझे थोड़ा और तोड़ जाती है।
हाँ, एक खिड़की खुली थी कहीं…
मगर वहाँ से कोई उजाला नहीं आया,
बस मेरा अपना अकेलापन
मुझे घूरता रहा।
सच तो ये है—
तुम्हारा ना मिलना इतना दर्द नहीं देता,
जितना ये एहसास देता है कि
मैंने तुम्हें सच में अपना मान लिया था…
और मेरी गलती बस इतनी थी—
कि मैंने तुम्हें चाहा…
सिर्फ चाहा नहीं,
पूरी तरह से तुम्हारा हो गया था…
- beyond_word l✍️