___नए युग की स्त्रियाँ___
मस्तिष्क में द्वंद्व, हृदय में तूफ़ान लिए बैठे हैं,
हाँ—हाल तुमने पूछा तो
होठों पे मुस्कान लिए बैठे हैं।
स्त्री हैं जाति के,
काँधे पे किसी और का मकान लिए बैठे हैं,
हर क़दम पर देखो—
हम तुम्हारा अहसान लिए बैठे हैं।
गोरे हैं, काले हैं—ये भेद बाद की बात है,
हाँ, हम जब से जन्मे हैं
तुम्हारी जान लिए बैठे हैं।
बोझ कहो या रखो जूते की नोक पर,
स्त्री हैं जाति के—
तुम्हारे घर का सारा सम्मान लिए बैठे हैं।
सह कर ढेरों अपमान,
तुम्हारे सीने का गुमान लिए बैठे हैं।
नए युग की स्त्रियाँ हैं हम,
विद्रोह हमारी प्रवृत्ति है—
विश्वास नहीं होता तो आज़मा कर देख लो,
पार्वती के अंग में
काली की ज़ुबान लिए बैठे हैं।
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