Hindi Quote in Story by Jeetendra

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शीर्षक: मखमली शिकन

शाम की रोशनी कमरे में इस तरह दाखिल हो रही थी जैसे कोई बिन बुलाया मेहमान दबे पाँव अंदर आ गया हो। हवा में मोगरे की महक और पुरानी किताबों की एक मिली-जुली गंध थी। देव ने खिड़की के पर्दे को थोड़ा और सरकाया, जिससे रोशनी की एक पतली लकीर प्रीति के चेहरे पर पड़ने लगी।
प्रीति ने अपनी पलकें झुका रखी थीं, जैसे वह रोशनी से नहीं, बल्कि देव की नज़रों से बच रही हो।
"तुम यहाँ क्यों हो, प्रीति?" देव की आवाज़ में एक अजीब सी खुरदराहट थी।
"शायद इसलिए क्योंकि मुझे कहीं और होने का बहाना नहीं मिला," प्रीति ने अपनी रेशमी साड़ी के पल्लू को उँगलियों में लपेटते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक कंपकंपी थी, जो शब्दों से कहीं ज़्यादा गहरा राज़ खोल रही थी।
"बहाने अक्सर सच को छुपाने के लिए बनाए जाते हैं, उसे ओढ़ने के लिए नहीं।" देव उसके करीब आया। उसके जूतों की आवाज़ लकड़ी के फर्श पर एक ताल पैदा कर रही थी।
प्रीति ने सिर उठाया। उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो राख होने से इनकार कर रही थी। "सच तो यह है कि तुम मुझसे डरते हो, देव। तुम्हें डर है कि अगर तुमने मुझे छुआ, तो तुम्हारी यह बनाई हुई संजीदगी बिखर जाएगी।"
देव मुस्कुराया, एक ठंडी और जानलेवा मुस्कान। "संजीदगी एक लिबास है, प्रीति। और लिबास उतारे जाने के लिए ही होते हैं।"
उसने अपना हाथ प्रीति के कंधे पर रखा। उसकी उँगलियों का स्पर्श प्रीति की त्वचा पर बिजली की तरह दौड़ा। प्रीति की सांसें तेज़ हो गईं, और उसने अपनी आँखें मूँद लीं।
"क्या तुम जानती हो कि तुम्हारी खामोशी कितनी शोर मचाती है?" देव ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया।
"तो फिर इसे चुप क्यों नहीं कर देते?" प्रीति ने पलटकर उसे चुनौती दी। उसकी साँसें देव के चेहरे से टकरा रही थीं।
देव ने अपनी पकड़ मज़बूत की और उसे दीवार से सटा दिया। "तुम शब्दों के जाल बुनना जानती हो, लेकिन शरीर झूठ नहीं बोलता।"
"तो फिर शरीर को ही बात करने दो," प्रीति ने धीरे से कहा, उसका हाथ देव की कमीज़ के बटनों पर ठहर गया था।
उस कमरे की शांति अब एक भारी तनाव में बदल चुकी थी। देव ने धीरे-धीरे प्रीति की साड़ी के पिन को ढीला किया। रेशमी कपड़ा सरक कर फर्श पर गिर गया, जैसे कोई रहस्य खुद-ब-खुद उजागर हो गया हो। प्रीति की त्वचा ढलती हुई धूप में सोने की तरह चमक रही थी।
"देव..." प्रीति के गले से एक दबी हुई आह निकली।
"शशश..." उसने उसकी बात को अपने होंठों से दबा दिया। यह चुंबन लंबा और प्यासा था, जिसमें बरसों की अधूरी इच्छाएं और सामाजिक बेड़ियाँ टूट रही थीं।
देव के हाथों ने प्रीति की कमर के घुमावों को इस तरह महसूस किया जैसे वह किसी कीमती नक्शे को पढ़ रहा हो। प्रीति ने अपनी उँगलियाँ देव के बालों में फँसा दीं, उसे और करीब खींचते हुए। कमरे की हवा गर्म हो गई थी, और हर स्पर्श एक नई कहानी लिख रहा था।
"तुम्हें लगता है कि यह सिर्फ एक रात की बात है?" प्रीति ने हाँफते हुए पूछा, जबकि देव के होंठ उसकी गर्दन के संवेदनशील हिस्से पर थे।
"यह रात की बात नहीं है, प्रीति। यह उस प्यास की बात है जो समंदर पीकर भी नहीं बुझती," देव ने उसे बाहों में भरकर बिस्तर की ओर ले जाते हुए कहा।
चादरों की सरसराहट और दोनों की मिली-जुली साँसों के बीच, वक्त जैसे ठहर गया था। देव का हर स्पर्श प्रीति के भीतर एक नया तूफान उठा रहा था। वह कोई साधारण मिलन नहीं था, बल्कि दो रूहों का एक-दूसरे में इस तरह घुल जाना था कि यह पहचानना मुश्किल हो जाए कि कौन कहाँ खत्म हो रहा है और कौन कहाँ से शुरू।
देव ने प्रीति के जिस्म पर उन जगहों को ढूँढा जिन्हें उसने खुद भी कभी नहीं छुआ था। प्रीति की सिसकारियां उस कमरे के सन्नाटे को तोड़ रही थीं, जो अब किसी संगीत की तरह लग रहा था।
"तुम... तुम बहुत बेरहम हो," प्रीति ने मदहोशी में कहा।
"और तुम बहुत खूबसूरत," देव ने उसके चेहरे को चूमते हुए जवाब दिया।
जैसे-जैसे रात गहराती गई, उनकी दूरियाँ मिटती गईं। पसीने की बूंदें उनकी त्वचा पर सितारों की तरह चमक रही थीं। हर हलचल में एक गहराई थी, हर हरकत में एक अर्थ। वे दोनों उस चरम सीमा की ओर बढ़ रहे थे जहाँ शब्द अर्थहीन हो जाते हैं और सिर्फ अहसास रह जाता है।
जब वह क्षण आया, तो कमरा एक गूँजती हुई खामोशी से भर गया। दोनों एक-दूसरे में लिपटे हुए, तेज़ साँसें लेते रहे, जैसे किसी लंबी दौड़ के बाद सुस्ता रहे हों।
अंधेरा अब पूरी तरह छा चुका था। प्रीति ने अपना सिर देव के सीने पर रख दिया। उसके दिल की धड़कन अभी भी तेज़ थी।
"अब क्या?" प्रीति ने धीरे से पूछा।
देव ने उसके माथे को चूमा और कहा, "अब बस यह शिकन है, प्रीति। जो चादर पर भी रहेगी, और शायद हमारी यादों पर भी।"
उसने प्रीति को अपने पास और सिकोड़ लिया। बाहर दुनिया वैसी ही थी, लेकिन उस कमरे के भीतर, एक पूरी कायनात बदल चुकी थी।

Hindi Story by Jeetendra : 112013427
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