आज फिर समझ नहीं आया कि क्या करूँ, क्या छोड़ दूँ।
ज़िंदगी बस चल रही है
कभी पाँव साथ नहीं देते,
कभी दिल आगे निकल जाता है।
अपने बारे में लिखूँ तो क्या लिखूँ?
मुझे ख़ुद नहीं पता मैं कौन-सा हिस्सा जी रही हूँ,
और कौन-सा बस निभा रही हूँ।
किस बात पर रोना है,
किस बात पर हँसना है
ये भी अब दिल तय नहीं कर पाता।
कभी हँसी बिना वजह आ जाती है,
कभी आँखें बिना इजाज़त भर जाती हैं।
लोग कहते हैं, “सब संभाल लेते हैं,”
पर मैं…
मैं सब थोड़ा-थोड़ा संभाल रही हूँ।
थोड़ा ख़ुद को,
थोड़ा ख़्वाबों को,
थोड़ा टूटे हुए हौसलों को।
पर सच ये है, Dear me
थोड़ा-थोड़ा काफी नहीं होता,
और पूरा होने की हिम्मत
अभी मुझमें बाकी है।
🥲☹️