चल यूँ करें कि दीपक बन जाएँ हम तुम
जल उठें और जहाँ को जगमगाएँ हम तुम
या फिर हरेभरे पेड़ बनकर खूब फलें फूलें
सबको जिंदगी देकर खिलखिलाएँ हम तुम
नदी होकर बहें पहाड़ों में, वनों में, नगरों में
इंसा की चिरसंचित प्यास बुझाएँ हम तुम
धूल बनें, सूर बनें, चूल्हा बनें, पुस्तक बनें
अन्न, संगीत, रोटी, ज्ञान उगाएँ हम तुम
कहने का मतलब बस इतना सा है ‘मधु’
जहाँ भी रहें अपना फर्ज निभाएँ हम तुम
-डॉ. मधुसूदन चौबे